संपादकीय : नोटबंदी का जिन्न

सर्वोच्च अदालत में पांच न्यायाधीशों की एक संविधान पीठ द्वारा नोटबंदी के भारत सरकार के फैसले में हस्तक्षेप करने और तत्संबंधी अधिसूचना को अवैध करार देने के निर्णय के बाद एक बार फिर नोटबंदी का जिन्न बोतल से बाहर आया है, जो केन्द्र सरकार क़ो परेशानी में डाल सकता है। उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई से इंकार भले कर दिया हो लेकिन उसने नोटबंदी से जुड़े अधिकारियों की, एक स्वतंत्र एजेंसी से जांच की याचिका के साथ, अन्य विसंगतियों को लेकर याचिकाकर्ता को बंबई उच्च न्यायालय जाने को कहा है। याचिका के माध्यम से 2000 रुपए और 200 रुपए के नोटों से जुड़ी अनेक विसंगतियों को लेकर सवाल खडे किये गये हैं। सुप्रीम कोर्ट ने प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से तो इस पर इंकार कर दिया, लेकिन लिखित रूप में निर्णय अभी सामने आना है। अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणि ने सरकार की तरफ से कोर्ट में कहा कि अदालत नोटबंदी के संदर्भ में कोई आदेश नहीं दे सकती। नोटबंदी के बाद 500 और 1000 रुपए के नोट बदलने का पर्याप्त समय दिया गया था।

लोग इसका फायदा नहीं उठा सके, इसमें सरकार क्या कर सकती है? संविधान पीठ के सामने आरटीआई कार्यकर्ता मनोरंजन रॉय की याचिका पर सुनवाई के वक़्त यह वाद विवाद हुए हैं। अधिवक्ता अजय मारवाह ने संविधान पीठ के सामने इस मामले में जिरह कर अनेक बुनियादी सवाल दागे, जिनमें एक यह भी था, कि अप्रैल 2000 से 2018 के बीच रिजर्व बैंक की सालाना रिपोर्ट्स और सूचना के अधिकार कानून के तहत प्राप्त जानकारी के मुताबिक, 500 और 1000 रुपए के 14 ट्रिलियन से अधिक मूल्य के नोट चलन में थे। प्रधानमंत्री मोदी ने 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी की घोषणा कर 500 तथा 1000 रुपए के मुद्रा नोटों को अवैध घोषित कर दिया था। देश में नकली नोटों की समस्या और आतंकवाद का वित्त-पोषण रोकने के लिए नोटबंदी करना, कारण बताया गया।

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नोटबंदी की घोषणा के तीन दिनों के अंतराल में ही रिजर्व बैंक ने 15 ट्रिलियन रुपए के नोट जमा किए। जो नोट चलन में बताए जा रहे थे, उनका मूल्य 14 ट्रिलियन से कुछ ज्यादा था और नोटबंदी के बाद 1 ट्रिलियन रुपए बैंकों में इकट्ठा किए गए। यह एक ट्रिलियन रुपए के नोट कहां से आए? क्या अर्थव्यवस्था में नकली मुद्रा चलन में रही? क्या ऐसी मुद्रा इससे भी ज्यादा मूल्य की हो सकती है? सवाल संविधान पीठ के सामने भी उठे। जो दस्तावेज पीठ के सामने पेश किए गए हैं और रिजर्व बैंक की रिपोर्ट्स में भी दर्ज हैं, उनके मुताबिक नोटबंदी से कुछ माह पहले मई, 2016 में रिजर्व बैंक के सेंट्रल बोर्ड की बैठक हुई। उसके एजेंडा-16 के तहत बोर्ड ने 500 रुपए के नए नोट के डिज़ाइन, प्रारूप आदि को मंज़ूरी देकर, भारत सरकार को अनुशंसा भेज दी।

सूचना के अधिकार कानून के तहत जो जानकारी प्राप्त की गई है, उसके मुताबिक सरकारी प्रिंटिंग प्रेस का कहना है कि 500 रुपए के नए नोट उसने 2015 में ही छापने शुरू कर दिए थे। छपाई के बाद 345 मिलियन नोट रिजर्व बैंक को भेज भी दिए गए थे। सवाल है कि जब डिज़ाइन और प्रारूप आदि को स्वीकृति ही नहीं दी गई थी, तो 2015 में ही नोटबंदी से करीब एक साल पहले, यह मुद्रा कैसे छाप दी गई? ऐसा ही मामला 200 और 2000 रुपए के नए नोटों का है। फिर से सवाल उठता है कि यह घपला कैसा है? इसका खुलासा अब बंबई हाईकोर्ट में हो सकता है। यह मामला बहुत लंबा और बेहद संवेदनशील है, क्योंकि देशहित भी इससे जुड़ा है। पूरे मामले पर बंबई उच्च न्यायालय में बहस तक अंतिम न्यायिक निर्णय की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।