भारतीय लोकतंत्र के समक्ष महत्वपूर्ण चुनौतियां विद्यमान : प्रो. फूल बदन

‘भारतीय संघीय लोकतंत्र में निर्वाचन : मुद्दे और चुनौतियां’ पर संगोष्ठी

भारतीय लोकतंत्र के समक्ष महत्वपूर्ण चुनौतियां विद्यमान : प्रो. फूल बदन

प्रयागराज। निर्वाचन को लोकतंत्र की नींव माना जाता है, परंतु निर्वाचन स्वतंत्र और पारदर्शी होना अपेक्षित है। वर्तमान भारतीय लोकतंत्र के समक्ष राजनीति का अपराधीकरण, अनैतिक इलेक्ट्रॉरल बॉण्ड फण्डिंग, जातिगत राजनीति, अस्वीकरण के अधिकार का अभाव, महिलाओं का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व जैसी महत्वपूर्ण चुनौतियां विद्यमान हैं।यह बातें जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के सेण्टर फॉर रशियन एण्ड सेन्ट्रल एशियन स्टडीज के प्रो. फूल बदन ने ईश्वर शरण महाविद्यालय में शुक्रवार को ‘भारतीय संघीय लोकतंत्र में निर्वाचन : मुद्दे और चुनौतियां’ विषयक दो

दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में कही। आईसीएसएसआर, नई दिल्ली और महाविद्यालय के राजनीति विज्ञान के संयुक्त तत्वावधान में संगोष्ठी में उन्होंने कहा कि वर्तमान राजनीतिक विमर्श के केन्द्र में एक राष्ट्र एक निर्वाचन की अवधारणा कोई नवीन अवधारणा नहीं है। सन् 1967 के पूर्व भारतीय राजनीति में प्रायः एक राष्ट्र एक निर्वाचन पद्धति ही प्रचलित थी। परन्तु एक राष्ट्र एक निर्वाचन पद्धति में एक ही दल के वर्चस्व की सम्भावना होती है, जो स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्परा के प्रतिकूल है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक लोकतंत्र का प्रारम्भ 1215 ई. के मैग्नाकार्टा से माना जाता है। आजादी के अमृतकाल में यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या आज हम आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना करने में सफल हुए हैं ? क्या हमारे संविधान निर्माताओं ने इसी लोकतंत्र का स्वप्न देखा था ? सूक्ष्मतः विचार करें तो हमारा समाज जो ऊर्ध्वाधर रूप से जातियों में अंतः विभाजित है, इसका स्वरूप ही अलोकतांत्रिक है।इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता प्रो.पंकज कुमार ने कहा कि लोकतंत्र में चुनाव नींव के पत्थर के समान है। भारतीय लोकतंत्र में धनबल, बाहुबल और आपराधिक प्रवृत्तियों का प्रभाव 80 के दशक से बढ़ा,

परन्तु इन दुष्प्रवृत्तियों से मुक्ति का श्रेय निर्वाचन आयुक्त टी.एन शेषन को जाता है। परन्तु जब तक देश के नागरिकों को अपने उत्तरदायित्व का बोध नहीं होगा तब तक निर्वाचन सुधार निरर्थक है।इलाहाबाद विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो वी.के राय ने कहा कि भारत में संघीय लोकतांत्रिक व्यवस्था है। परन्तु यह चिंता का विषय है कि क्या यह लोकतंत्र वास्तविक लोकतंत्र है? किसी भी सरकार में लोकतंत्र में किसी भी प्रकार के सुधार की क्षमता नहीं है। क्योंकि वास्तविक लोकतंत्र व्यक्ति अथवा नागरिक स्तर पर ही सम्भव है। उत्तरदायित्व पूर्ण नागरिकों के अभाव में सुन्दर लोकतंत्र की निर्मिति असम्भव है।

अध्यक्षता कर रहे महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. आनंद शंकर सिंह ने कहा कि प्राचीन इतिहास के भारतीय गणराज्यों और ग्रीक गणराज्य की तुलना आधुनिक लोकतंत्र से नहीं की जा सकती। भारतीय बौद्ध ग्रन्थों से स्पष्ट है कि ग्रीक गणराज्य की तुलना में भारतीय गणराज्यों में लोकतंत्र के तत्व अधिक उन्नत अवस्था में थे। निर्वाचन सदैव लोकतंत्र को निर्धारित करे यह आवश्यक नहीं, परन्तु निर्वाचन और लोकतंत्र परस्पर पर्याय हैं।
संयोजक डॉ शिवहर्ष सिंह ने कहा कि लोकतंत्र मानवीय गोचर स्वर्ग है। भारतीय लोकतंत्र की मूल समस्या भारतीय राजनीतिक संरचना और भारतीय राजनीतिक शैली में भिन्नता है।

धनबल, बाहुबल, आपराधिक प्रवृत्तियों का बढ़ता प्रभाव, अपर्याप्त मतदान और दोषपूर्ण मतदान व्यवहार भारतीय लोकतंत्र की मुख्य समस्यायें एवं चुनौतियां हैं। वर्तमान में प्रचलित एक देश, एक निर्वाचन का विचार श्रमलाघव एवं धनलाघव युक्त प्रतीत होता है, परन्तु इसके प्रवर्तन में विधिक एवं व्यावहारिक समस्यायें लक्षित होती हैं।प्रो. मनोज कुमार दूबे ने बताया कि उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय, संघटक महाविद्यालयों के शिक्षकों, विद्वजनों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और देश-देशांतर के विविध राज्यों के प्रतिभागियों ने सहभागिता की। संगोष्ठी की रूपरेखा संगोष्ठी संयोजक डॉ अखिलेश पाल एवं संचालन डॉ. अखिलेश त्रिपाठी और धन्यवाद ज्ञापन आईक्यूएसी की संयोजिका डॉ. अनुजा सलूजा ने किया।

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