उद्देश्य से भटकता जा रहा राष्ट्रीय लोक अदालत, लोगों की नहीं सुनी जा रही फरियाद

न्यायपालिका या कार्यपालिका से सबंधित विभिन्न मामलों में उलझे पीड़ितों की सहायता एवं आपसी सुलह समझौता के आधार पर सुलहनीय मामलों के निपटारे के लिए विधिक सेवा प्राधिकार निरंतर राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन व्यवहार न्यायालय के न्यायिक परिसर में करता रहा है। कई बेंचों का गठन कर विभिन्न वादों का निपटारा भी किया जाता रहा है। लेकिन इस दौरान राष्ट्रीय लोक अदालत में ऐसा गठित कोई बात बेंच देखने को नही मिलता जहां दो पक्षों के बीच आपसी सहमति नहीं बनने के उपरांत तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से फरियादियों के फरियाद सुन निष्पादित कराया जा सके। ऐसा ही नजारा बिक्रमगंज व्यवहार न्यायालय के न्यायिक परिसर में 9 दिसंबर को आयोजित राष्ट्रीय लोक अदालत में भी देखने को मिला। जहां कार्यपालिका के अधीनस्थ आने वाले बैंक के ऋण, बिजली बिल आदि से संबंधित आवेदनों की लंबी फेहरिस्त लिए फरियादियों ने न्याय की आस उम्मीद पर दिन भर न्यायालय परिसर में भटकते रहे। जब शिविर में  कोई फरियाद सुनने वाला नहीं दिखा तो वे अपने हाथो में आवेदन थामे बैरंग मायूस होकर वापस लौट गए। एक पीड़ित पक्ष ने बताया कि एक बैंक द्वारा केसीसी ऋण के संबंध में कई बार नोटिस भेजा जा रहा है। उक्त बैंक के शाखा प्रबंधक से लिखित आवेदन के साथ मुलाकात कर मामले से अवगत कराते हुए निदान करने की गुहार लगाई गई। लेकिन उक्त बैंककर्मी अपनी मनमानी करते हुए ऋण भुगतान के लिए दबिश बनाने के साथ ही तरह तरह की धमकियां भी दे रहे हैं। बात नहीं बनने पर पुनः नोटिस किया गया है इसलिए न्याय की फरियाद लिए राष्ट्रीय लोक अदालत में आया था। ताकि तीसरा पक्ष मेरी बात सुन अग्रेतर करवाई सुनिश्चित करें। लेकिन लोक अदालत में बताया गया कि किसी भी मामले का समाधान उक्त विभाग के पदाधिकारी हीं करेंगे और उनके रजामंदी के बाद हीं सुलह समझौता का अंतिम मोहर लगेगा। कोई भी बेंच इस मामले में मदद नही करेगी। ऐसे में आम फरियादियों के बीच कई तरह के सवाल उभरने लगे है। कुछ लोगो का मानना है कि जब आपसी सहमति के आधार पर हीं किसी मामले का निष्पादन किया जायेगा तो फिर लोक अदालत का औचित्य क्या है। क्यों इसके प्रचार प्रसार पर लाखो रुपए खर्च किए जाते हैं। कोई भी विवाद को सुलझाने के लिए दोनो पक्षों की रजामंदी अत्यंत जरूरी है तो यह कार्य न्यायपालिका या कार्यपालिका के अंदर कभी भी किया जा सकता है या पीड़ित पक्ष अधिकारी के मनमानी पूर्ण रवैया के आगे घुटने टेक तथा स्वयं पहल कर ऋण की कमोवेश अदायगी कर निपटारा कर सकता है। लोक अदालत शिविर को लेकर नाराजगी व्यक्त करते हुए फरियादियों ने विधिक सेवा प्राधिकार के सचिव से मांग किया कि जब भी लोक अदालत का आयोजन हो उसमे एक बेंच शिकायतकर्ताओं का होना चाहिए। जहां सुलहनीय आवेदन को स्वीकृत किया जाए या फिर दोनो पक्षों में सहमति नहीं बनने पर आवेदन को अस्वीकृत करार दे दिया जाए। उधर सिविल कोर्ट बिक्रमगंज के वरीय अधिवक्ता उमेश प्रसाद मिश्रा का मानना है कि विधिक  सेवा प्राधिकार अधिनियम जिसके तहत लोक अदालत लगता है, के अनुसार जिस बेंच का गठन होता है उसका कार्य यही होता है कि दोनों पक्षों की बात सुनकर और दोनों पक्षों को किसी बिन्दु पर सुलह समझौता के लिए तैयार करना। परन्तु वास्तव में ऐसा होता नहीं है। जिस वजह से लोक अदालत में आम जन को जो सुविधा या लाभ मिलनी चाहिए वह नहीं मिलती है। लोक अदालत की अवधारणा वैसी नहीं है जैसी दिखाई पड़ती है।जिस वजह से लोक अदालत अपने उद्देश्यों को पुरा करने में 100 % विफल है। प्रतिवर्ष लोक अदालत पर बेकार मे करोड़ों रूपया खर्च होता है। इसका लाभ किसी फरीयादी को नहीं मिलता है।अधिनियम के प्रावधानों के  अनुसार कार्य नहीं होने के कारण यह न्यायपालिका के लिए सफेद हाथी साबित हो रहा है।वरीय अधिवक्ता मिश्रा ने बताया कि सबसे अधिक सुलह के द्वारा सिविल मामलों का निष्पादन हो सकता है और पूर्व में ऐसा होता भी था लेकिन पता नहीं किस कारण से अब सिविल वादों का निष्पादन लोक अदालत से नहीं होता है और जो होता है वह सब केवल कागजी घोड़े जैसा होता है। लोक अदालत से निपटाए गये मामले में कोर्ट फीस की राशि वापस करने का प्रावधान है। परन्तु हमें नहीं लगता कि नीलाम पत्र वादों या अन्य किसी वाद में किसी को कोर्ट फीस की राशि लौटाई गयी है ।इसी वजह से लोक अदालत का कोई वास्तविक लाभ किसी को नहीं मिलता है।
 
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