बुढ़ापे की लाठी 'पेंशन ' तक न देने की खाई है कसम 

उ0 प्र0 मत्स्य विभाग इतना बेरहम क्यों!!

बुढ़ापे की लाठी 'पेंशन ' तक न देने की खाई है कसम 

ब्रजेश त्रिपाठी

प्रतापगढ़/प्रयागराज। उत्तर प्रदेश मत्स्य विभाग के अंतर्गत प्रदेश के 19 जनपदों में मत्स्य पालक विकास अभिकरणों का संचालन 1982-83 से प्रारंभ हुआ। प्रदेश के राज्यपाल द्वारा 396 पद पर अभिकरणों में अनेक पदों के लिए स्वीकृत किया गया था जिनमें लगभग 114 कर्मी ही पदस्थ हुए थे। निदेशक मत्स्य द्वारा जनपदों में चयन कमेटी का गठन किया गया था जिसमें जिलाधिकारी को चयन कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया था।

अंततः जिला अधिकारी द्वारा कार्मिकों को नियुक्ति पत्र दिया गया जिसमें सेवा शर्तों में स्पष्ट उल्लेख किया गया था कि वेतन , भत्ते व अवकाश के संबंध में शासन के वर्तमान व समय-समय पर प्रसारित नियम लागू होंगे। सभी कर्मियों ने 35 से 37 वर्षों तक नियमित सेवा करते हुए राज्य कर्मियों को मिलने वाली सभी सुविधाओं की भांति वेतन, महंगाई भत्ता, वार्षिक वेतन वृद्धि, वित्तीय स्तरों नयन, एवं छठा वेतनमान प्राप्त किया।

 इसी क्रम में सातवां वेतनमान 1.1. 2016 से मत्स्य विभाग के स्थाई कर्मचारियों की भांति अभिकरण कर्मियों को दिया जाना चाहिए था परंतु सातवां वेतनमान अभिकरण के कार्मिकों को द्वेषपूर्ण भावना के कारण नहीं दिया गया जबकि सातवां वेतनमान 1.1. 2016 से दिए जाने हेतु उत्तर प्रदेश शासन वित्त (वेतन आयोग -अनुभाग 2 के पत्र संख्या 64 /2016 वे0आ0-2645 / 10 दास- 04 (एम) दिनांक 16. 12 .2016 संकल्प पत्र द्वारा अधिकरण कर्मियों को सामान लाभ दिए जाने की संस्तुति भी की गई थी,

इसके अनुरूप विभिन्न जनपदों में संचालित मत्स्य अभिकरण की गवर्निंग बॉडी द्वारा भी कार्यरत कर्मियों को सातवां वेतनमान दिए जाने की संस्तुति की जा चुकी है परंतु निदेशक मत्स्य शुरू से मत्स्य अभिकरण के कर्मियों के साथ सौतेला व्यवहार रखने के चलते कोई ठोस कार्यवाही नहीं की गई। हां, इतना जरूर है कि शासन द्वारा समय-समय पर इस प्रकरण पर मत्स्य विभाग से पत्राचार कर जानकारी ली जाती है तो उस पत्र के क्रम में जनपदों के अभिकरण के अधिकारियों को निदेशालय द्वारा पत्र जारी कर जानकारी के तौर पर सूचना मांगी जाती है कि सातवां वेतनमान दिए जाने पर कितना व्यय भार 1.1.2016 से आएगा अथवा तात्कालिक प्रभाव से दिए जाने की स्थिति में कितना व्यय भार आएगा और गवर्निंग बॉडी द्वारा प्रस्ताव अनुमोदित कराकर तत्काल मत्स्य निदेशालय को उपलब्ध करायें।

अजीब स्थिति यह है कि इस प्रकार मत्स्य विभाग के निदेशक को पत्राचार दिखावे के रूप में करते हुए लगभग 8 साल व्यतीत हो रहे हैं और शासन के उच्च अधिकारियों को अपनी गलत कार्यशैली से गुमराह करने से बाज नहीं आ रहे हैं।  ठीक यही स्थिति छठे वेतनमान को शासन द्वारा स्वीकृत कराने में मत्स्य निदेशालय ने 6 वर्ष लगा दिया था और दिनांक 1.1. 2006 से मिलने वाला छठा वेतनमान मत्स्य अभिकरण कर्मियों को 21.11.2012 से लाभ मिलना प्रारंभ हुआ। अब हालत यह है कि वर्तमान में 95% कर्मी 35 से 37 वर्षों की लंबी अवधि की नियमित सेवा करते हुए सेवानिवृत हो चुके हैं

जिन्हें सेवानिवृत्ति पश्चात मिलने वाली सेवा निवृत्तिक लाभ तक निदेशक मत्स्य के अड़ियल रवैये और द्वेष भावना के चलते आजतक लाभ नहीं मिल पा रहा है।ऐसे सेवानिवृत्त कर्मी 65 से 70 साल की उम्र में चल रहे हैं। इस बुढ़ापे में उन्हें क्या पता कि निदेशक मत्स्य इतने बेरहम हो जाएंगे कि परिवार के भरण पोषण और अपनी दवा के लिए तरसना पड़ जाएगा।

अधिकांश सेवा निवृत्त कर्मी ने व्यक्तिगत रूप में अनेक उच्च/ उच्चतम न्यायालय की शरण में गए और न्यायालय के अनेक आदेशों के बावजूद मत्स्य निदेशालय द्वारा दो-तीन केसों का निस्तारण कर अन्य किसी कर्मी को कोई राहत नहीं दी गई जबकि न्यायालय ने अनेक केसेस में कर्मियों के पक्ष में निर्णय दिया है। अंततः लगभग दो वर्ष पूर्व मत्स्य अभिकरण के 34 सेवा निवृत कर्मियों ने संयुक्त रूप से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में राम किशोर लाल श्रीवास्तव एवं 33 अन्य बनाम राज्य सरकार एवं अन्य का मुकदमा कर निवेदन किया गया है कि उन्हें सभी सेवानिवृत्तिक लाभ दिया जाए।

 बताते चलें कि शासनादेश संख्या 312/ दिनांक 29 .5. 2000 के अनुसार मत्स्य अभिकरण के लिए सर्विस रूल बनाकर नियम उप नियम बनाए जाने का सुझाव/ निर्देश दिया गया है परंतु निदेशक मत्स्य ने उक्त शासनादेश की अनदेखी की और कोई कार्यवाही नहीं की। देखा जाए तो निदेशक मत्स्य अपने मनमर्जी से नए-नए आदेश खुद बनाते हैं। शासनादेशों और यहां तक की उच्च न्यायालय के आदेशों की अनदेखी करते आ रहे हैं।

उनके इस अड़ियलपन रवैये और द्वेषपूर्ण भावना से सभी अभिकरण के सेवानिवृत कर्मी आहत हैं। बुढ़ापे में पेंशन ही एक सहारा होता है जो उनके शेष जीवन के लिए जीवनदायिनी के रूप में होता है। इस पेंशन के सहारे परिवार का पालन और दवा आदि जरूरमंद वस्तुओं  की खरीद होती है। जहां  एक और उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार बुजुर्गों की बेहतरी के लिए वृद्धावस्था पेंशन एवं अन्य योजनाओं से लाभान्वित करने के लिए सोचती है, सभी बुजुर्गों के लिए पेंशन की नई स्कीम लाई जा सकती है ताकि वह अपनी दवा और रोज़मर्रा का खर्च निकाल सके,तो वहीं दूसरी ओर मत्स्य  निदेशालय ऐसा विभाग है

कि 35 से 37 साल तक अनवरत मत्स्य अभिकरण में सेवाएं देते हुए विभागीय कार्यों का निर्वहन बखूबी किया लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद बुढ़ापे में पेंशन तक के लाले पड़े हैं।शासन में बैठे उच्च अधिकारियों को चाहिए कि ऐसी अमानवीय व्यवहार करने वाले निदेशक मत्स्य के विरुद्ध उचित कार्रवाई करते हुए सेवानिवृत्त अभिकरण कर्मियों को सेवानिवृक्तिक लाभ दिलाए जाने हेतु ठोस कार्यवाही करें ताकि उन्हें भुखमरी से बचाया जा सके और उनका शेष जीवन सुखद हो सके।

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