छह वर्ष बाद भी नहीं बनी वरिष्ठ नागरिकों के लिए कल्याण की नीति

आश्वासन समिति की रिपोर्ट पेश

नई दिल्ली। सरकार वादा करती है और भूल जाती है। बार- बार किए गए वादों के बाद भी करीब छह वर्ष का लंबा समय बीत जाने के बाद भी देश में वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक राष्ट्रीय रणनीति तैयार नहीं हो पाई है। हाल ही में संसद की सरकारी आश्वासन समिति के सभापति राजेंद्र अग्रवाल ने यह रिपोर्ट पेश की है। इस समिति ने देश की विभिन्न योजनाओं को लेकर सरकारी विभागों के आश्वासन के बाद किए गए कामकाज पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है।समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए नीति बनाने से अन्य मुद्दों पर केंद्र सरकार की एजंसियों ने तेजी से काम करने का आश्वासन दिया था। जैसे वरिष्ठ नागरिकों की नीति की बात करें तो इस मामले में सबसे पहला आश्वासन अगस्त 2017 में मतलब करीब छह वर्ष पहले दिया था।

इसके बाद बार- बार नीति बनाए जाने का आश्वासन समिति के समक्ष दिया गया, बावजूद इसके संबंधित एजंसियां आज तक यह नीति तैयार नहीं कर पाई हैं। इस मामले में समिति के समक्ष सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग के सचिव ने बताया था कि यह नीति राष्ट्रीय वृद्ध जन नीति 1999 और माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण पोषण और कल्याण विधेयक के स्थान पर लागू होंगे।इसके लिए संबंधित विशेषज्ञों, राज्य सरकारों व अन्य हितकारकों से विचार विमर्श किया जाना था। इस पर चर्चा के बाद एक मंत्रिमंडल का नोट भी तैयार किया गया है, जो कि विचाराधीन है। हालांकि, दावा किया गया है कि इसी बीच मंत्रालय ने वरिष्ठ नागरिकों की मदद के लिए अन्य कई कल्याण योजनाएं और उपाय लागू किए हैं।

इस मामले में समिति ने मंत्रालय को आदेश दिया है कि वह संबंधित नीति के मामले में जल्द से जल्द कार्य करे क्यों कि प्रस्तावित राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता पर जोर दिए बिना नहीं किया जा सकता।इस दिशा में मंत्रालय को इमानदारी से नीति को लागू करने की दिशा काम करने की आवश्यकता है। ज्ञात हो कि सरकारी आश्वासनों से संबंधी समिति मंत्रियों द्वारा सभा में समय-समय पर दिए गए आश्वासनों की जांच करती है और इस पर अपनी रपट तैयार करती है। माना जाता है कि समिति में आश्वासन के बाद करीब तीन माह की समय सीमा के भीतर आश्वासन का निपटारा किया जाना जरूरी होता है। इस रिपोर्ट में समिति ने सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय से संबंधित मामलों की समीक्षा की है।

इसमें सभापति के अतिरिक्त 15 सांसद और चार सचिवालय के सदस्य शामिल है। केंद्रीय विद्यालयों में भेदभाव करने की दिशा में नहीं हुआ कामसमिति के पास केंद्रीय विद्यालयों में ओबीसी प्रवेश के संबंध में भेदभाव करने का मामला भी सामने आया था। सरकारी आश्वासन समिति के समक्ष यह मामला फरवरी 2021 में सामने आया था। समिति ने इस बात पर चिंता जाहिर की है कि इतने लंबे समय के बाद भी यह मामला लटका हुआ है।आनलाइन व्यवस्था के युग में आंकड़ा एकत्र नहीं जुटा पाए हैं। समिति का मानना है कि यह एक वाजिब कारण नहीं है। भविष्य में इस स्थिति से बचने के लिए समिति ने मंत्रालय को आधुनिक तकनीक के प्रयोग की सिफारिश की है ताकि आश्वासनों को वक्त पर पूरा किया जा सके।

 
 
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