इधर सुनो, मेरे शरीर को मेरी मर्जी के बगैर छूना मत, वरना…

ये मेरा शरीर है जनाब आपकी जायदाद नहीं।जब मन किया अपनी हवस को आकर शांत कर लिया। ये मेरा शरीर है यहां सिर्फ मेरी चलेगी…शादी के पहले सेक्स करना है या नहीं इस पर हर कोई अपनी राय थोप देता है क्योंकि एक लड़की की इज्जत पति महोदय के लिए सुरक्षित रहनी चाहिए। यही तो हर लड़की को बचपन से सिखाया जाता है। जहां एक लड़की जवानी की दहलीज पर कदम रख ही पाती है कि उसको ये ज्ञान कूट कूट के दे दिया जाता है कि बेटा अपनी इज्जत का ध्यान रखना शादी के पहले किसी को छूने न देना। शादी के पहले सेक्स मतलब पाप।

ऐसे में सवाल ये है कि जब हमें ये सिखाया जाता है कि किसी को अपनी मर्जी के बिना छूने न देना तो फिर शादी के बाद ये राय कहां चली जाती है। अगर शादी के पहले बिना मर्जी के सेक्स रेप है तो शादी के बाद क्यों नहीं? शादी के पहले बिना मर्जी के किसी को छूने न देना तो फिर शादी के बाद के लिए सही बात हमें क्यों नहीं सिखाई जाती हैं। लड़कियों को ये क्यों नहीं कहा जाता है कि बिस्तर पर पति का साथ तुम नहीं वो देगा तुम्हारा साथ, वो भी तुम्हारी शर्तों के साथ। सात फेरे लेने से एक लड़की के शरीर पर उसकी आवरू जिसको वो सबसे बचाती है किसी और का हक हो जाता है लेकिन क्यों?

समाज के कमोबेश हर वर्ग की महिलाओं को सरकार पति या पिता की संपत्ति समझती है। हर जगह पहले पति फिर आप सुबह की चाय से लेकर रात के बिस्तर तक। मिसाल के तौर पर ड्राइविंग लाइसेंस, में फलां की बेटी, बेटा या पत्नी का जिक्र होता है। वहीं आधार और पैन कार्ड में किसी महिला को नाबालिग के बराबर मानते हुए उसके पति या पिता के नाम का जिक्र होता है। यूं लगता है जैसे किसी महिला की अपनी आजाद जिंदगी और हस्ती ही नहीं होती।

हाल ही में वैवाहिक दुष्कर्म के मामले में जारी की गई दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिकाओं का केंद्र सरकार ने विरोध किया है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से विरोध करते हुए कहा गया कि इस मुद्दे पर एक सहमति व विचार विमर्श होना बेहद जरूरी हैं।
साथ ही केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि वैवाहिक दुष्कर्म का मामला अमेरिका इंग्लैंड, कनाडा व दक्षिण अफ्रीका जैसे कई देशों में प्रतिबंधित है, लेकिन इसके बावजूद भी इस पर आंख बंद कर के भरोसा नहीं किया जा सकता हैं। मतलब अब अगर आपकी मर्जी के बिना अगर अपके पति महोदय आपको छूते हैं तो उसको बलात्कार मना जाएगा।

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