फतेहपुर के अस्पताल में न सफाई न ही दवाई

फतेहपुर । उत्तर प्रदेश में जगह-जगह फैले भ्रष्ट्राचार, कामचोरी और काहिलपन के कीचड़ में कमल तो खिल गया, लेकिन कीचड़ से मुक्ति नहीं मिली। जी हां, चार माह बाद भी सरकारी दफ्तरों में भ्रष्ट्राचार ,काहिलपन का कीचड़ जस का तह है। अभी थोड़ी दिनों पहले कुछ ऐसी ही प्रशासनिक व्यवस्था की एक भयावह तस्वीर गोरखपुर में सामने आई थी, गुरुवार को एक बार फिर सामने आ गई है। अंतर सिर्फ यह कि तब सीएम के गृह जनपद का अस्पतला था, अब प्रदेश के जिला फतेहपुर का जिला अस्पताल है। ऐसा अस्पताल जिसमें फिलहाल न सफाई है और न ही दवाई।

हैरतअंगेज यह कि ऐसी तस्वीर तब है, जब यहां की व्यवस्था को देखने पहुंचे शासन के दूत आलोक सिन्हा, व्यवस्थापन एंव ओद्योगिक विभाग के प्रमुख सचिव भी यह मानते हैं, कि इमारतें खड़ी कर देने या हास्पिटल का नाम दे देने से अस्पताल नहीं बन जाता, अस्पताल में डॉक्टरों की जरूरत होती है, दवाईयों की जरूरत होती है, साफ-सफाई की जरूरत होती है। फतेहपुर के जिला अस्पताल में साफ-सफाई की स्थिति यकीनन पहले से थोड़ा बेहतर है, लेकिन दवाई के मामले में उसके भी ज्यादा गड़बड हालात हो गये हैं। जीवन रक्षक दावाओं की छोड़िये, दर्द और बुखार की दवाओं के भी लाले हैं। सवाल पूछने पर साहब कहते हैं, कि दवायें क्यों नहीं और साफ-सफाई क्यों नहीं इन्हीं सवालों को जवाब जानने के लिये ही उन्हें लखनऊ से फतेहपुर भेजा गया है। जिला अस्पतला का हाल जानने ऐसा नहीं कि श्री सिन्हा के पहले लखनऊ से कोई पहुंचा ही नहीं था। कई लोग पहुंचे थे, खामियां भी देखी थी, लेकिन उनकी रिपोर्ट लखनऊ की व्यवस्था के ब्लेक में एसी गायब हुई कि जैसी तस्वरी तब था, वैसी तस्वीर आज भी है। यह कहें कि पहले से और बद्तर हो गई है, तो कोई गलत नहीं। हां, एक फरक सबसे बड़ा यह दिखा कि पहले सरकार ने चापलुसों को भेजा था, इस बार हकीकत को स्वीकारने वाले अधिकारी को भेजा गया है। ऐसा अधिकारी जो यह मानते कि सिर्फ बतोलेबाजी नहीं करनी चाहियें बल्कि कीचड़ और साफ सुथरी व्यवस्था का फर्क दिखना चाहिये। बात सही भी है, चार माह बाद फरक सिर्फ चापलुसों को दिख रहा है। खरी-खरी कहने वालों को बिल्कुल ही नहीं। अब देखना यह है कि नये साहब की रिपोर्ट के बाद फतेहपुर के इस जिला अस्पताल में व्यवस्था में कैसा फर्क दिखने को मिलता है।

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