पैरेलल डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंस निजीकरण स्वीकार नहीं, एआईपीईएफ ने जताया विरोध
प्रस्ताव लागू हुआ तो 27 लाख बिजली कर्मचारी करेंगे आंदोलन: एआईपीईएफ
लखनऊ। ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (एआईपीईएफ) ने विद्युत मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति (Consultative Committee) में विद्युत वितरण क्षेत्र में पैरेलल डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंस दिए जाने के प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते हुए इसे बिजली वितरण व्यवस्था का बैकडोर निजीकरण करार दिया है। फेडरेशन ने कहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र की वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) द्वारा स्थापित एवं विकसित किए गए वितरण नेटवर्क का उपयोग निजी कंपनियों को करने की अनुमति देना सार्वजनिक क्षेत्र के डिस्कॉम के साथ अन्याय होगा तथा इससे राज्य सरकारों के स्वामित्व वाले डिस्कॉम आर्थिक रूप से कमजोर होकर अंततः बर्बाद हो जाएंगे।
एआईपीईएफ के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने कहा कि परामर्शदात्री समिति की बैठक के बाद विद्युत मंत्रालय द्वारा जारी किए गए बयान भ्रामक हैं तथा उनका उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली वितरण कंपनियों और उपभोक्ताओं की कीमत पर निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाली नीति को उचित ठहराना है।
ये खबर भी पढ़े : महुली पुलिस एवं सोशल मीडिया सेल के समन्वित प्रयास से भटका हुआ बालक सकुशल परिजनों से मिलाविद्युत मंत्रालय का दावा है कि प्रस्तावित व्यवस्था से उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प मिलेंगे तथा बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता में सुधार होगा। जबकि स्वयं मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा सरकारी डिस्कॉम ही वितरण नेटवर्क का स्वामित्व रखेंगे तथा उसी के संचालन, रखरखाव और क्षमता विस्तार की पूरी जिम्मेदारी निभाएंगे।
शैलेन्द्र दुबे ने कहा, "जब वितरण नेटवर्क का स्वामित्व, संचालन, रखरखाव और उन्नयन पूरी तरह सरकारी डिस्कॉम के पास ही रहेगा, तब केवल एक निजी बिलिंग कंपनी के आने से बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता कैसे सुधरेगी? सेवा की गुणवत्ता पूरी तरह वितरण नेटवर्क की मजबूती और विश्वसनीयता पर निर्भर करती है, न कि बिजली का बिल कौन जारी कर रहा है। इसलिए बेहतर सेवा का दावा पूरी तरह भ्रामक है। वास्तविक उद्देश्य सार्वजनिक धन से निर्मित सरकारी नेटवर्क का उपयोग करके निजी कंपनियों को मुनाफा कमाने का अवसर देना है।"
एआईपीईएफ ने मुंबई को सफल पैरेलल डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंस का उदाहरण बताए जाने के विद्युत मंत्रालय के दावे को भी तथ्यात्मक रूप से गलत और भ्रामक बताया है।
दुबे ने स्पष्ट किया कि मुंबई वास्तविक अर्थों में पैरेलल डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंस का उदाहरण नहीं है। टाटा पावर को न्यायिक एवं नियामकीय व्यवस्था के तहत केवल एक सीमित एवं अधिसूचित क्षेत्र में कार्य करने की अनुमति दी गई है, जहां एक अन्य निजी कंपनी भी कार्य करती है। अडानी पावर, टाटा पावर के संपूर्ण लाइसेंस क्षेत्र में कार्य नहीं कर सकती, न ही महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (महावितरण) उन क्षेत्रों में कार्य कर सकती है। इसी प्रकार टाटा पावर भी अन्य लाइसेंसधारियों के पूरे क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकती।
उन्होंने कहा, "इसलिए मुंबई को ऐसा उदाहरण नहीं माना जा सकता जहां अनेक लाइसेंसधारी एक ही सरकारी वितरण नेटवर्क पर स्वतंत्र रूप से प्रतिस्पर्धा कर रहे हों, जैसा कि अब विद्युत मंत्रालय प्रस्तावित कर रहा है। पूरे देश में पैरेलल डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंस लागू करने के लिए मुंबई का उदाहरण देना कानूनी और तथ्यात्मक दोनों दृष्टियों से गलत है।"
दुबे ने कहा कि मंत्रालय के प्रस्ताव में अनेक महत्वपूर्ण प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दिया गया है। यदि वितरण नेटवर्क में किसी खराबी के कारण बिजली आपूर्ति बाधित होती है, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी उसी सरकारी डिस्कॉम की होगी जो नेटवर्क का स्वामी और संचालक है। क्या ऐसी स्थिति में निजी पैरेलल लाइसेंसधारी भी इस जिम्मेदारी और उससे उत्पन्न होने वाले दायित्वों को साझा करेगा? इस संबंध में मंत्रालय पूरी तरह मौन है।
इसी प्रकार मौजूदा डिस्कॉम ने अपने उपभोक्ताओं की मांग के अनुरूप 25-25 वर्षों तक के पावर परचेज एग्रीमेंट (पीपीए) कर रखे हैं। यदि लाभदायक उपभोक्ता निजी लाइसेंसधारियों के पास चले जाते हैं, तो इन दीर्घकालिक समझौतों का वित्तीय बोझ कौन वहन करेगा? इस अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न का भी प्रस्ताव में कोई उत्तर नहीं है।
सार्वजनिक क्षेत्र के डिस्कॉम प्रत्येक वर्ष वितरण प्रणाली के संचालन एवं रखरखाव, नेटवर्क विस्तार, ट्रांसफार्मर, स्विचगियर, कंडक्टर तथा अन्य अवसंरचना के विकास पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करते हैं। प्रस्ताव में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि सरकारी नेटवर्क का उपयोग करके लाभ कमाने वाली निजी कंपनियां इन भारी खर्चों में कोई भागीदारी करेंगी या नहीं।
एआईपीईएफ ने परामर्शदात्री समिति के इस प्रस्ताव को पूरी तरह अस्वीकार करते हुए मांग की है कि विद्युत मंत्रालय किसी भी प्रकार की आगे की कार्रवाई करने से पहले सभी संबंधित पक्षों से व्यापक विचार-विमर्श करे।
दुबे ने कहा, "बिजली क्षेत्र के सबसे बड़े हितधारक बिजली उपभोक्ता और बिजली कर्मचारी हैं। इसलिए कोई भी निर्णय लेने से पहले मंत्रालय को कर्मचारी एवं इंजीनियर संगठनों, उपभोक्ता संगठनों, राज्य विद्युत उपयोगिताओं तथा अन्य सभी हितधारकों से सार्थक संवाद करना चाहिए। बिजली वितरण व्यवस्था की मूल संरचना को प्रभावित करने वाला कोई भी निर्णय राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक परामर्श के बिना नहीं लिया जाना चाहिए।"
एआईपीईएफ ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार सरकारी डिस्कॉम के वितरण नेटवर्क का उपयोग निजी कंपनियों को व्यावसायिक लाभ के लिए करने की अनुमति देने संबंधी कोई आदेश जारी करती है, तो देश के 27 लाख बिजली कर्मचारी एवं इंजीनियर राष्ट्रव्यापी आंदोलन प्रारंभ करने के लिए बाध्य होंगे। फेडरेशन ने स्पष्ट किया कि ऐसे किसी भी एकतरफा निर्णय से उत्पन्न होने वाली औद्योगिक अशांति की संपूर्ण जिम्मेदारी विद्युत मंत्रालय की होगी।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
