थाली में बचा हर दाना, किसी भूखे की अधूरी उम्मीद है

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प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

किसी भी भारतीय विवाह, पारिवारिक उत्सव या सामाजिक समारोह की सफलता का पैमाना आज भी व्यंजनों की विविधता और मेजबान की उदारता है। जितनी लंबी व्यंजन सूची, उतनी बड़ी प्रतिष्ठा; जितनी भरी थालियां, उतना अधिक सम्मान। पर इस चमक के पीछे एक खामोश सच है—कूड़ेदान में समाता अन्न। यह केवल बचा भोजन नहीं, बल्कि किसान का पसीना, प्रकृति के संसाधन, श्रमिक का श्रम और राष्ट्र की पूंजी का अपव्यय है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की 'खाद्य अपव्यय सूचकांक रिपोर्ट' के अनुसार भारत में हर वर्ष लगभग 68-78 मिलियन टन खाद्य पदार्थ घरेलू स्तर पर बर्बाद होते हैं, जबकि विवाह समारोहों में 10 से 20 प्रतिशत भोजन बिना स्वाद चखे ही फेंक दिया जाता है। यह केवल सामाजिक व्यवहार नहीं, आर्थिक, पर्यावरणीय और नैतिक संकट है। जिस देश में आज भी लाखों लोग भरपेट भोजन से वंचित हों, वहां अन्न का यह अपमान हमारी सामूहिक चेतना पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न है।

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इस समस्या की जड़ हमारी सामाजिक मानसिकता में है। विवाहों में आवश्यकता से अधिक भोजन बनाना और 'ज्यादा से ज्यादा परोसना' आज भी प्रतिष्ठा का प्रतीक है। मेजबान को भोजन कम पड़ने का भय रहता है, जबकि अतिथि संकोच या लालच में जरूरत से अधिक थाली भर लेते हैं। नतीजतन बड़ी मात्रा में भोजन कूड़ेदान में पहुंच जाता है। होटल और रेस्तरां का बुफे सिस्टम इस अपव्यय को और बढ़ाता है, जहां स्वाद की चाह भूख पर भारी पड़ती है। घरों में भी व्यस्त जीवनशैली, सही अनुमान की कमी और 'बचत' के बजाय 'नया खरीदो' की मानसिकता ने रसोई को अपव्यय का केंद्र बना दिया है। फल-सब्जियां सड़ जाती हैं, बचा भोजन फ्रिज में पड़ा रहकर अंततः कूड़े में चला जाता है। उपभोग की संस्कृति ने विवेक को पीछे धकेल दिया है; भोजन अब आवश्यकता नहीं, प्रदर्शन का माध्यम बन चुका है।

भोजन की बर्बादी केवल थाली तक सीमित नहीं, इसका सबसे गहरा प्रहार पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर होता है। अनुपयोगी भोजन कचरा भराव स्थलों में सड़कर मीथेन गैस छोड़ता है, जो भूमंडलीय तापवृद्धि की प्रमुख वजह है। वैश्विक स्तर पर खाद्य अपव्यय कुल हरितगृह गैस उत्सर्जन का 8 से 10 प्रतिशत हिस्सा है, जो विमानन उद्योग से भी अधिक है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में यह केवल अन्न नहीं, बल्कि पानी, बिजली, डीजल, उर्वरक, परिवहन, भंडारण और किसानों के श्रम का भी अपव्यय है। अनुमान है कि इससे भारत को हर वर्ष डेढ़ लाख करोड़ रुपये से अधिक का आर्थिक नुकसान होता है। इतनी राशि से हजारों विद्यालय, अस्पताल, सिंचाई और पोषण योजनाएं साकार हो सकती हैं। सच यह है कि हम भोजन नहीं, अपने भविष्य की संभावनाएं कूड़ेदान में फेंक रहे हैं।

विडंबना यह है कि यह संकट तकनीक का नहीं, मूल्यों के क्षरण का परिणाम है। जिस समाज ने अन्नपूर्णा को देवी माना, वहीं अन्न का अपमान सामान्य होता जा रहा है। एक ओर करोड़ों लोग दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, दूसरी ओर दावतों का भोजन कूड़ेदान में पहुंच रहा है। यह केवल आर्थिक असमानता नहीं, सामाजिक संवेदनहीनता का भी प्रमाण है। विकसित देशों में 'डॉग्गी बैग' जिम्मेदार नागरिकता का प्रतीक है, जबकि भारत में इसे आज भी संकोच से देखा जाता है। अनेक होटलों का बचा भोजन सुरक्षित व्यवस्था से जरूरतमंदों तक पहुंचाया जा सकता है। घरों में सही मात्रा में भोजन पकाना, बचे भोजन का पुनः उपयोग, बेहतर शीतक प्रबंधन और पहले से उपलब्ध सामग्री का उपयोग अपव्यय को काफी घटा सकता है। आखिर, संस्कारों की पहचान पूजा से नहीं, अन्न के सम्मान से होती है।

समस्या जितनी व्यापक है, समाधान भी उतने ही व्यावहारिक हैं। कई होटल और भोजन-व्यवस्थापक अब 'शून्य अपव्यय विवाह पैकेज' अपना रहे हैं, जिनमें अतिथियों की संख्या के अनुसार भोजन का वैज्ञानिक आकलन होता है। अनेक स्वयंसेवी संस्थाएं विवाह और होटलों का बचा सुरक्षित भोजन जरूरतमंदों तक पहुंचा रही हैं। यह केवल सेवा नहीं, संसाधनों के सम्मान की संस्कृति है। सरकार को बड़े आयोजनों में खाद्य अपव्यय रोकने के लिए जनजागरूकता, प्रभावी नियम और कर प्रोत्साहन जैसे कदम उठाने होंगे। विद्यालयों और महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में खाद्य अपव्यय, पोषण और संसाधन संरक्षण को शामिल करना समय की मांग है, ताकि नई पीढ़ी इसे व्यवहार में उतारे। जब समाज इसे आदत नहीं, राष्ट्रीय दायित्व मानेगा, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होगा।

आज प्रौद्योगिकी भी इस चुनौती का प्रभावी समाधान बन सकती है। स्मार्ट फ्रिज भोजन की उपयोग अवधि बताकर बर्बादी रोक सकते हैं, जबकि मोबाइल ऐप्स से बचा भोजन तुरंत डोनेशन नेटवर्क तक पहुंचाया जा सकता है। बिग डेटा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता विवाह, होटल और बड़े आयोजनों के लिए आवश्यकता के अनुरूप भोजन का सटीक आकलन संभव बना रहे हैं। नगर निकाय, होटल उद्योग, खाद्य कंपनियां और स्वयंसेवी संस्थाएं मिलकर खाद्य अपव्यय को काफी घटा सकती हैं। कई देशों ने ऐसे उपायों से सफलता पाई है। भारत के पास तकनीक के साथ संस्कारों की पूंजी भी है; आवश्यकता केवल दोनों के समन्वय की है। अन्न को संसाधन नहीं, संस्कार मानते ही समाधान व्यवहार बन जाएगा।

समाधान की शुरुआत किसी कानून से नहीं, हमारी थाली से होगी। हर परिवार, हर मेहमान और हर होटल मालिक को समझना होगा कि एक दाना भी बर्बाद करना राष्ट्र की संपत्ति को लुटाना है। जब तक 'ज्यादा परोसो' की संस्कृति 'जितना जरूरी, उतना ही' में नहीं बदलेगी, विकास के दावे अधूरे रहेंगे। खाद्य अपव्यय रोकना केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि आर्थिक विवेक, सामाजिक उत्तरदायित्व और भारतीय सभ्यता की पुनर्परिभाषा का संकल्प है। अन्न का सम्मान होगा, तो भूख घटेगी, प्रदूषण कम होगा, संसाधन बचेंगे और विकास अधिक मानवीय बनेगा। किसी राष्ट्र की समृद्धि थालियों की भव्यता से नहीं, उनमें परोसे हर दाने के सम्मान से मापी जाती है; भारत को अब यही कसौटी अपनानी होगी।

 

 

 

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‘तरुणमित्र’ श्रम ही आधार, सिर्फ खबरों से सरोकार। के तर्ज पर प्रकाशित होने वाला ऐसा समचाार पत्र है जो वर्ष 1978 में पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जैसे सुविधाविहीन शहर से स्व0 समूह सम्पादक कैलाशनाथ के श्रम के बदौलत प्रकाशित होकर आज पांच प्रदेश (उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तराखण्ड) तक अपनी पहुंच बना चुका है। 

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