लोकसभा 2024: डगमग है अबकी डुमरियागंज सीट की चुनावी डगरिया...!

बस्ती मंडल की यह सीट नेपाल-भारत के अन्तर्राष्ट्रीय रिश्ते बनाये रखने में निभाता है अहम भागीदारी

लोकसभा 2024: डगमग है अबकी डुमरियागंज सीट की चुनावी डगरिया...!

रवि गुप्ता

  • चौथी बार जगदम्बिका पाल चुनावी मैदान में, एक बार कांग्रेस तो तीसरी दफा भाजपा से दावेदारी
  • सपा-कांग्रेस गठबंधन से हैं कुशल तिवारी, गोरखपुर हाता वाले दिवंगत हरिशंकर तिवारी के हैं बेटे
  • बदहाल लिंक सड़कें, बेहतर शिक्षा-स्वास्थ्य का अभाव, इंडो-नेपाल बॉर्डर के गांवों में सामान्य सुरक्षा
  • काले नमक चावल का एकमात्र गढ़ है सिद्धार्थनगर क्षेत्र, इन्वेस्टर्स समिट में मोदी कर चुके जिक्र
  • पैदावार तो बढ़ी, नहीं बढ़ी किसानों की आय, देसी-देहाती कारोबार पर टिका काले नमक का कारोबार
लखनऊ। कहने को तो देश-प्रदेश में 2024 का आम लोकसभा चुनाव का दौर चल रहा है, जिसके सम्पन्न होने के बाद फिर चुने हुए जनप्रतिनिधियों के संख्या बल के आधार पर नई सरकार का गठन होगा, अब वो अल्पकालिक होगा या फिर पांच साल की स्थायी सरकार का गठन होगा, यह तो चुनावी परिणाम पर भी निर्भर करेगा। मतलब एक बात तय है कि, इस चुनाव का असर देश के हर एक खासोआम नागरिक पर पड़ता है, लेकिन यूपी के संदर्भ में बात करें तो एक ऐसी संसदीय सीट भी है जोकि सीधे तौर पर भारत-नेपाल के अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों को बेहतर रखने में काफी अहम भूमिका निभाता है, चंूकि इसके बॉर्डर पर बसे गांवों, तहसीलों और नगरों के लोगों का आपसी रहन-सहन और खानपान इस कदर मिलाजुला है, जिसमें कोई अंतर्राष्ट्रीय सीमा की रेखा खींचना काफी मुश्किल है।
 
जी हां, बात हो रही है बस्ती मंडल के अहम लोकसभा क्षेत्र डुमरियागंज सीट की, जहां से अबकी लगातार चौथी बार जगदम्बिका पाल चुनावी समर में हैं, जबकि उनके विपक्ष में सपा-कांग्रेस इंडिया गठबंधन से भीष्मशंकर तिवारी उर्फ कुशल तिवारी मैदान में जोकि गोरखपुर के हाता वाले दिवंगत हरिशंकर तिवारी के बेटे हैं। जगदम्बिका पाल के चुनावी फिज़ा को लेकर जब सिद्धार्थनगर जनपद के कुछ वरिष्ठजनों से बात की गई तो उनका यही कहना रहा कि भईया, वैसे तो पाल जी सर्वसुलभ नेता हैं मगर अभी तक पूरी तरह से भाजपाई नहीं बन पाये हैं...पहली बार कांग्रेस से सांसद बने और फिर पाला बदला और कमल के दम पर लगातार दो बार यहां से सांसद चुने गये और अब तीसरी बार इसी सिंबल से चुनाव लड़ रहे हैं।
 
मंडल के राजनीतिक जानकारों की माने तो पाल जी का संसदीय कद जिस प्रकार का था तो ऐसे में उन्हें मोदी मंत्रिमंडल का हिस्सा हो जाना चाहिये था, मगर संभवत: यह उनकी व्यक्तिगत कमी है जबकि क्षेत्रवासी तो अभी तक उनका हर प्रकार से सपोर्ट करते आये हैं...मगर अबकी उनकी डुमरियागंज सीट पर चुनावी डगरिया कुछ डगमग जैसी है, क्योंकि सूबे के पॉवर सेंटर यानी गोरखपुर के नजदीक होने के बावजूद वो संसदीय क्षेत्र में उस विकास की गंगा को नहीं ला पाये, जिसकी क्षेत्र वासियों को उम्मीद रही और जितनी उतनी राजनीतिक क्षमता थी। विपक्ष में कुशल तिवारी हैं, पहला चुनाव सपा से बलरामपुर से लड़े और हार गये, फिर बसपा सिंबल पर संत कबीरनगर से मैदान में उतरे और जीत गये और अब फिर पाला बदलते हुए इंडिया गठबंधन प्रत्याशी के तौर पर डुमरियागंज सीट पर चुनावी ताल ठोंक रहे हैं। स्थानीय जानकारों के अनुसार बदलते हुए चुनावी हवा में उनकी लहर अभी तक ठीक बह रही चूंकि क्षेत्र के ज्यादातर ब्र्राह्मण वर्ग उनसे जुड़ते जा रहे हैं, जबकि मुस्लिम-यादव का बड़ा बेल्ट उनकी ओर देख रहा।
 
क्षेत्र में चुनावी मुद्दों की बात करें तो पता चला कि यहां जनपद मुख्यालय पर ही एक जिला अस्पताल है जबकि अन्य कहीं पर भी ढंग से अस्पताल नहीं हैं, यानी इमरजेंसी में गोरखपुर या फिर लखनऊ जाइये। लड़कियों के लिये कोई डिग्री कॉलेज नहीं और बड़े पैमाने पर यहां के युवाजन कामकाज को लेकर पलायन करने को मजबूर हैं क्योंकि यहां पर कोई इंडस्ट्री नहीं है जबकि आये दिन एक जिला-एक उत्पाद का ढींढोरा पीटा जाता है। रेल नेटवर्क की बात करें तो गोरखपुर-गोेंडा-लखनऊ लाइन पर यह बसा है, मगर डुमरियागंज क्षेत्र की अधिकांश जनता अभी भी रेल सेवा से पूरी तरह नहीं जुड़ पायी है। सार्वजनिक परिवहन के तौर पर यहां के बढ़नी नगर पंचायत की बात करें तो बॉर्डर एरिया होने के बावजूद कोई रोडवेज बस अड्डा तक नहीं है। वहीं बॉर्डर पर सुरक्षा की बात करें तो यहां पर बसे गांवो, तहसीलों और नगरों में अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा औपचारिक मात्र की लगती है, जैसा कि स्थानीयजन बताते हैं, ऐसे में कोई भी अराजक तत्व सुरक्षा तंत्र को भेदकर आमजन को क्षति पहुंचा सकता है।
 
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मलिहाबादी आम की तरह काले नमक की ख़ुश्बू विदेशों तक पहुंचे...!

राजधानी लखनऊ के मलिहाबादी आम की मिठास देश-प्रदेश में नहीं बल्कि अब तो विदेशों में भी फैली रहती है, मगर डुमरियागंज सीट के सिद्धार्थनगर क्षेत्र की काली-दोमट मिट्टी में रचे-बसे काले नमक की बात करें तो उसकी महक दशकों बाद आज भी उस तराई वाले क्षेत्र से बाहर नहीं निकल पायी। यहां पर इसकी खेती-बाड़ी करने वाले कुछ किसानों से बात की गई तो उनका कहना रहा कि भाई जी, योगी सरकार ने एक जिला-एक उत्पाद कार्यक्रम शुरू किया, लेकिन बढ़िया तब होता जब हमारे यहां के सांसद जी हमारे काले नमक की खेती व उपज को मोदी जी के किसी योजना से जोड़ने का करते तो मलिहाबादी आम की तरह हमारे क्षेत्र के काले नमक की पैदावार को भी पूरे देश-विदेश में जगह मिलती।
 
स्थानीय जानकारों के मुताबिक अभी पैदावार में तो इजाफा हुआ है, मगर लागत के तर्ज पर किसानों को मुनाफा नहीं मिल पाता क्योंकि आज भी लोग यहां की लोकल मंडियों में देसी-देहाती स्टाइल में अढ़तियों को औनेै-पौने दामों में काले नमक चावल बेचने को मजबूर हैं, जबकि अभी कुछ ही दिन पहले लखनऊ में आयोजित इन्वेस्टर्स समिट में पीएम मोदी ने वोकल फॉर लोकल के तर्ज पर काले नमक को प्रमोट करने पर बल दिया था। मांग यही है कि काले नमक चावल की यदि जनपद में बेहतर ब्रांडिंग और पैकेजिंग की सुविधा हो तो यह किसानों के लिये काफी फायदेमंद साबित हो सकता है।
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