वार्ताकार कश्मीर को क्या दे सकते हैं?

-राजेश माहेश्वरी
कश्मीर में केंद्र सरकार के वार्ताकार एवं पूर्व आईबी प्रमुख दिनेश्वर शर्मा हुर्रियत नेताओं से भी बातचीत के पक्षधर हैं, लेकिन हुर्रियत में मीरवाइज उमर फारूक, सैयद अली शाह गिलानी, यासीन मलिक सरीखे बड़े नेताओं ने बातचीत से इनकार कर दिया है। उनका सवाल है कि वार्ताकार के अख्तियार क्या हैं कि उनसे बातचीत की जाए? हुर्रियत वाले दोहरा रहे हैं कि उन्होंने प्रधानमंत्री के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी और गृह मंत्री के तौर पर लालकृष्ण आडवाणी से बातचीत की थी।

पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के साथ भी तीन बार बातचीत हुई। क्या दिनेश्वर शर्मा उनसे बड़े और ज्यादा दानिशमंद शख्स हैं, जो उनसे बातचीत की जाए? वार्ताकार कश्मीर को क्या दे सकते हैं? पहले के वार्ताकार क्या कर पाए, यह एक इतिहास है, जिसका खुलासा देश के सामने किया जाना चाहिए। हुर्रियत से संवाद की इच्छा ने उसे नए सिरे से प्रासंगिक बना दिया है। जब से राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने हुर्रियत नेताओं पर छापों की बौछार की है और यह तथ्य भी सामने आया है कि आतंकी फंडिंग के तहत एनआईए ने 36 करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि पकड़ी है, तब से हुर्रियत बचाव की मुद्रा में थी। उनकी छवि हवालाबाज, दलाल, चोर-उचक्कों की बन गई थी। कई नेता हिरासत या जेल में भी हैं, लेकिन दिनेश्वर शर्मा ने बातचीत की इच्छा व्यक्त कर हुर्रियत को कश्मीर का चेहरा बना दिया है। खुद हुर्रियत प्रवक्ता ने बयान जारी कर कहा था कि सरकार के प्रतिनिधि ने शर्मा से बातचीत के लिए दबाव बनाते हुए दो बार सैयद अली शाह गिलानी से मुलाकात भी की। हालांकि जेकेएलएफ के चीफ यासीन मलिक तो कहते थे कि उन्हें वार्ता में शामिल न होने की सूरत में एनआईए के जरिए केसों में ‘फंसवा’ देने की धमकियां दी जा रही हैं।

याद रहे दिनेश्वर शर्मा की वार्ताकार के तौर पर नियुक्ति का कुछ ही हल्कों में स्वागत किया गया है। खास कर सरकार समर्थक हल्कों में। उनकी नियुक्ति के प्रति एक कड़वी सच्चाई इस बार यह है कि जम्मू तथा लद्दाख की जनता पहले के वार्ताकारों की नियुक्ति का हमेशा स्वागत करती रही है लेकिन वे भी इस बार इसलिए मायूस नजर आ रहे हैं क्योंकि उनका सवाल था कि पहले के वार्ताकारों की संस्तुतियों को लागू न कर नए वार्ताकार को क्यों नियुक्त किया गया है। यही सोच हुर्रियती नेताओं की है। वे कहते थे कि वार्ताकारों की नियुक्ति कश्मीर मसले को नहीं सुलझा सकती। शर्मा के राज्य के दौरे से दो दिन पहले ही सैयद अली शाह गिलानी ने बातचीत से समस्या का हल निकालने की बात कही थी लेकिन वे सीधे केंद्र सरकार के साथ बिना शर्त बातचीत के पक्ष में थे।

इतिहास के पन्ने पलटे तो कश्मीर की उलझी समस्या सुलझाने की पहली कोशिश वर्ष 1990 में उस समय आरंभ हुई थी जब एक साल पहले कश्मीर में आतंकवाद ने अपने पांव पसारे थे। तब कश्मीर में शांति लाने का प्रयास मार्च 1990 में श्री राजीव गांधी के नेतृत्व में कश्मीर आए एक प्रतिनिधिमंडल ने किया था। उसके बाद तो ऐसे प्रयासों का जो क्रम आरंभ हुआ वह अनवरत रूप से जारी है पर कोई भी प्रयास कामयाबी का मुंह नहीं देख पाया है। श्री राजीव गांधी के दौरे के तुरंत बाद केंद्र सरकार ने अलगाववादियों को वार्ता की मेज पर लाने के लिए बैक चैनल्स से मनाते हुए दो और प्रयास किए।

पहला औपचारिक प्रयास अप्रैल 2001 में पूर्व केंद्रीय मंत्री के.सी. पंत के नेतृत्व में उस समय हुआ जब उन्हें केंद्र सरकार ने पहला आधिकारिक वार्ताकार नियुक्त किया। हालांकि अलगाववादी नेताओं ने के.सी. पंत से मिलने से इंकार कर दिया था पर अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह ने जरूर उनसे कश्मीर मसले को सुलझाने की खातिर मुलाकात कर अपने सुझाव दिए थे। तब शब्बीर शाह हुर्रियत कांफ्रेंस में शामिल नहीं हुए थे। इन मुलाकातों और पहले वार्ताकार के प्रयास कोई नतीजा नहीं दे पाए तो वर्ष 2002 में उन्हें बंद कर दिया गया।

हालांकि जिस साल वर्ष 2002 में के.सी. पंत ने वार्ताकार के रूप में अपने प्रयास रोक दिए थे तब वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी के नेतृत्व में अगस्त 2002 में आठ सदस्यीय कश्मीर कमेटी ने जन्म लिया जिनका मकसद भी अलगाववादियों को वार्ता की मेज पर लाना था। इस कमेटी में तब सुप्रीम कोर्ट के वकील अशोक भान, पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण, पत्रकार दीलिप पडगांवकर व एम.जे. अकबर, पूर्व आईएफएस अधिकारी वी.के. ग्रोवर तथा जूरिस्ट फाली नारीमन भी शामिल थे। शायद यह कश्मीरियों की बदकिस्मती रही थी कि यह कमेटी भी संबंधों पर जमी हुई बर्फ को नहीं तोड़ पाई थी और कमेटी का स्थान राज्यपाल नरेंद्र नाथ वोहरा ने ले लिया। पूर्व गृह सचिव रहे एन.एन. वोहरा ने तब फरवरी 2003 में वार्ताकार का पद संभाला था। एन.एन. वोहरा भी कोई तीर नहीं मार पाए थे क्योंकि उनकी कोशिशों को उस समय धक्का लगा था जब अलगाववादी नेता प्रधानमंत्री के सिवाय किसी और से बात करने को राजी नहीं थे।

वोहरा की नाकामी के बाद भी कश्मीर में वार्ता के जरिए शांति लाने के प्रयासों का सिलसिला केंद्र सरकार द्वारा जारी रखा गया था। उनके बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता अरूण जेटली को वार्ताकार नियुक्त किया गया। रॉ के पूर्व चीफ ए.एस. दुल्लत को भी इसमें शामिल कर लिया गया था लेकिन नजीता फिर वही ढाक के तीन पात वाला ही था। कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की वर्ष 2002 में गोलमेज कांफ्रेंस में अलगाववादियों को शामिल करने की कोशिश के नाकाम रहने के बाद तो अलगाववादी जैसे अड़ियल हो गए थे जिन्होंने उसके बाद किसी भी वार्ताकार की कोशिशों को कामयाब ही नहीं होने दिया।

इतना जरूर था कि इन कोशिशों के कई साल बाद वर्ष 2010 में जब कई महीनों तक चले आंदोलन में 120 से अधिक आम नागरिक सुरक्षा बलों की गोलियों से मारे गए थे तो केंद्र सरकार ने दीलिप पडगांवकर, एम.एम. अंसारी और प्रो. राधा कुमार को वार्ताकार नियुक्त कर कश्मीर सुलझाने की ताजा कोशिश की थी। इस दल ने अपने दौरों और मुलाकातों के बाद अपनी रिपोर्ट तो केंद्र सरकार के पास जमा करवा दी थी लेकिन न ही कांग्रेस सरकार और न ही भाजपा सरकार ने उन रिपोर्टों को रोशनी दिखाने की कोशिश तक की। तो ऐसे में अब सवाल यही उठ रहा है कि ताजा वार्ताकार की नियुक्ति क्या वाकई संबंधों पर जमीं हुई बर्फ को तोड़ पाएगी और क्या वह कश्मीर मुद्दे को सुलझा पाएंगे।

यह हुर्रियत की खुशफहमी है कि वही कश्मीर के असली और सच्चे प्रतिनिधि हैं, जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं है। कश्मीर के साथ जम्मू और लद्दाख के क्षेत्र भी जुड़े हैं। जम्मू के डोगरा, कश्मीर के ही पंडित और लद्दाख के लद्दाखी लोग हुर्रियत के साथ नहीं हैं। हुर्रियत श्रीनगर में और आसपास सिर्फ एक ही तबके की बात करती रही है। हुर्रियत नेता कश्मीर पर तितरफा बातचीत के पक्षधर हैं-भारत, पाकिस्तान और हुर्रियत तितरफा बातचीत की व्यवस्था संयुक्त राष्ट्र से लेकर किसी भी समझौते में नहीं है। हुर्रियत वाले जिस संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव की दुहाई देते रहे हैं, उसमें भी भारत-पाक का ही जिक्र है। कोई तीसरा पक्ष नहीं! प्रस्ताव पर कार्रवाई से पहले यह प्रावधान है कि पाकिस्तान अपने कब्जे के भारतीय हिस्से को भारत को पहले लौटाएगा, उसके बाद कोई संवाद या कार्रवाई शुरू होगी। तो फिर हुर्रियत वाले बार-बार पाकिस्तान की पैरोकारी क्यों करते रहते हैं?

हुर्रियत से भी बातचीत की इच्छा वार्ताकार ने इसलिए जताई है कि वे कश्मीरी अवाम का हिस्सा हैं और भारतीय नागरिक भी हैं। यही नहीं अब तो वे प्रधानमंत्री से कम किसी से भी बात करने को राजी इसलिए भी नहीं हैं क्योंकि उनका मानना था कि पहले भी वार्ताकारों से बातचीत तो हुई पर नतीजा शून्य ही निकला है जिस कारण वार्ताकारों से बात करना बेमायने है और समय की बर्बादी है। ऐसा ही कथन नेशनल कांफ्रेंस के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला का भी है। उन्हें भी लगता है कि वार्ताकारों की नियुक्ति सिर्फ समय बर्बाद करने की कवायद है। हुर्रियत कश्मीर के एक कोने तक ही प्रासंगिक है, सियासी तौर पर वे ‘शून्य’ हैं। फिर भी एक नागरिक के तौर पर वे बातचीत में शामिल होना चाहते हैं, तो संवाद जरूर होना चाहिए।

यदि हुर्रियत वाले भारतीय संविधान के दायरे में और तिरंगे को सलाम करते हुए बातचीत करना चाहेंगे, तो उनका स्वागत किया जाना चाहिए। यदि अब भी वे पाकपरस्त मान रहे हैं, तो उनसे बातचीत के मायने क्या हैं? जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद अब्बासी ने कश्मीर की आजादी की मुहिम को बेमानी करार दे दिया, तो अब रोने को कौन सा कंधा रह गया है? भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि कोई आजादी नहीं, कोई स्वायत्तता नहीं, कश्मीर में अमन-चैन के मद्देनजर बातचीत के सिलसिले में शामिल होना है, तो स्वागत है। यदि हुर्रियत वाले वार्ताकार की नियुक्ति को भारत सरकार का हथकंडा मान रहे हैं, तो फिर उनसे बातचीत क्यों की जाए? दरअसल वार्ता के दौर को व्यापक बनाने के लिए वार्ताकार ने हुर्रियत नेताओं से बात करने की इच्छा जताई थी, लेकिन हुर्रियत ने खुशफहमी यह पाल ली कि भारत सरकार उनके नखरे उठाने को तैयार है, लिहाजा उन्होंने नखरे दिखाने शुरू कर दिए। वार्ताकार को भी ज्यादा ईमानदार साबित करने के लिए हुर्रियत का राग नहीं अलापना चाहिए।

वरिष्ठ टिप्पणीकार और उप्र राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।

 

 

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