राजनीति के धुरंधर दिलीप घोष की खड़गपुर में वापसी पर अटकलों से बढ़ी राजनीतिक हलचल

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खड़गपुर। बंगाल की राजनीति के धुरंधर कहे जाने वाले भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता दिलीप घोष एक बार फिर अपने परंपरागत क्षेत्र पश्चिम मेदिनीपुर में सक्रिय होते नजर आ रहे हैं। मेदिनीपुर से लेकर खड़गपुर तक लगातार जनसंपर्क अभियान और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से हालिया मुलाकात के बाद उनकी सक्रियता ने यह साफ कर दिया है कि ‘दादा’ अब अलग-थलग रहने के मूड में नहीं हैं। खड़गपुर को लेकर दिलीप घोष की खुली दावेदारी ने पार्टी के भीतर सियासी तापमान बढ़ा दिया है।

हाल ही में मीडिया से बातचीत में दिलीप घोष ने स्पष्ट शब्दों में कहा था,“मुझे बर्धमान से लड़ाने की क्या जरूरत थी? खड़गपुर की जनता ने मुझे दो बार जिताया है, सब कुछ समझा दिया है। पार्टी अगर कहेगी, तो मैं खड़गपुर से ही चुनाव लड़ूंगा।”

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इस बयान के बाद भाजपा के अंदरखाने हलचल तेज हो गई है। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल जोर पकड़ने लगा है कि क्या 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा एक बार फिर खड़गपुर में दिलीप घोष पर दांव लगाने जा रही है।

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इसी बीच रविवार शाम खड़गपुर के भाजपा विधायक हिरन चटर्जी का बयान सामने आया, जिसे दिलीप घोष की बढ़ती सक्रियता के सीधे जवाब के तौर पर देखा जा रहा है। बिना दिलीप का नाम लिए हिरन चटर्जी ने कहा,

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“भाजपा में टिकट देने का फैसला केंद्रीय चुनाव समिति करती है। उस समिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और पार्टी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा जैसे नेता होते हैं। वही तय करते हैं कि कौन कहां से चुनाव लड़ेगा।”

उन्होंने आगे कहा,“2021 में उसी समिति ने मुझे खड़गपुर सदर से उम्मीदवार बनाया, 2022 में खड़गपुर नगरपालिका और 2024 में घाटाल लोकसभा सीट से मैदान में उतारा। अगर 2026 में वही समिति मुझे फिर खड़गपुर से उम्मीदवार बनाती है, तो मैं चाहूंगा कि दिलीप बाबू आज की तरह भाजपा और मेरे लिए प्रचार करें।”यहीं नहीं, हिरन चटर्जी ने कुछ तल्ख लहजे में यह भी जोड़ा,

“दिलीप बाबू ने कहा है कि सिटिंग सांसद होते हुए उन्हें दूसरी सीट पर भेजना अन्याय था। तो फिर यही सवाल उनके सामने रखिए—मैं भी तो यहां का सिटिंग विधायक हूं।”राजनीतिक विश्लेषक इस बयान को पार्टी के भीतर बढ़ती बेचैनी और संभावित अंदरूनी खींचतान का संकेत मान रहे हैं।

जानकारों का कहना है कि दिलीप घोष की मौजूदा सक्रियता केवल टिकट की दावेदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पार्टी के भीतर अपना राजनीतिक वर्चस्व और जनाधार दोबारा स्थापित करने की रणनीति का हिस्सा है। उल्लेखनीय है कि 2016 में, जब पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाजपा कोई बड़ा कारक नहीं मानी जाती थी, तब दिलीप घोष ने खड़गपुर सदर सीट जीतकर पार्टी को मजबूत पहचान दिलाई थी। इसके बाद 2019 में उन्होंने मेदिनीपुर लोकसभा सीट से तृणमूल कांग्रेस के दिग्गज नेता मानस भुइयां को पराजित कर बड़ा राजनीतिक उलटफेर किया था।

इस बीच रविवार को दिलीप घोष ने पश्चिम मेदिनीपुर जिले के विभिन्न इलाकों में व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाया। सुबह से ही वे अलग-अलग स्थानों पर पार्टी कार्यकर्ताओं और आम लोगों से सीधे संवाद करते नजर आए। दिनभर की राजनीतिक व्यस्तता के बाद रात करीब नौ बजे वे खड़गपुर स्थित अपने बंगले पहुंचे, जहां सरस्वती पूजा को केंद्र में रखते हुए भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ एक अहम संगठनात्मक बैठक की। बैठक में आगामी राजनीतिक रणनीति और संगठन की मजबूती पर चर्चा हुई।

इसके बाद रात करीब 9.30 बजे दिलीप घोष स्व. प्रेम चंद्र झा जी के मृत्यु भोज में पहुंचे, जहां उन्होंने अपनी ऊर्जावान और प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई। लगातार जनसंपर्क, संगठनात्मक बैठकों और सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी के जरिए दिलीप घोष ने साफ संकेत दे दिया है कि वे न केवल राजनीतिक मैदान में लौट चुके हैं, बल्कि खड़गपुर और पश्चिम मेदिनीपुर की राजनीति में अपनी भूमिका को फिर से निर्णायक बनाने की पूरी तैयारी में हैं।

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‘तरुणमित्र’ श्रम ही आधार, सिर्फ खबरों से सरोकार। के तर्ज पर प्रकाशित होने वाला ऐसा समचाार पत्र है जो वर्ष 1978 में पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जैसे सुविधाविहीन शहर से स्व0 समूह सम्पादक कैलाशनाथ के श्रम के बदौलत प्रकाशित होकर आज पांच प्रदेश (उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तराखण्ड) तक अपनी पहुंच बना चुका है। 

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