प्राइमरी शिक्षकों पर बढ़ता प्रशासनिक बोझ शिक्षा व्यवस्था पर सवाल

सिस्टम ने मास्टर साहब को समझ लिया ‘सुपरमैन’!

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विवेक श्रीवास्तव

  • जनगणना के बीच भूसा जुटाने का आदेश बना नया विवाद
  • शिक्षकों के विरोध के बाद विभाग को लेना पड़ा यू-टर्न
  • गैरशैक्षणिक ड्यूटी से प्रभावित हो रही सरकारी स्कूलों की पढ़ाई

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था इन दिनों एक बड़े सवाल से जूझ रही है-आखिर सरकारी शिक्षक पढ़ाएं कब? प्रदेशभर में पहले से जनगणना तैयारियों और प्रशिक्षण में जुटे शिक्षकों पर अब नए-नए गैरशैक्षणिक कार्यों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। ताजा मामला बरेली के नवाबगंज क्षेत्र का है, जहां विद्यालयों को निराश्रित गोवंशों के लिए भूसा एकत्र करने का आदेश जारी होने के बाद बड़ा विवाद खड़ा हो गया। विरोध बढ़ा तो शिक्षा विभाग को बैकफुट पर आकर आदेश बदलना पड़ा, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर सरकारी स्कूलों के शिक्षकों पर बढ़ते गैरशैक्षणिक दबाव को राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना दिया है।
दरअसल, बरेली के नवाबगंज में खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय से प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और कंपोजिट विद्यालयों को निर्देश जारी किया गया था कि प्रत्येक विद्यालय 46 किलो भूसा एकत्र कर ब्लॉक कार्यालय अथवा पशु चिकित्साधिकारी कार्यालय में जमा कराए।

आदेश में एक सप्ताह के भीतर कार्य पूरा करने, रसीद उपलब्ध कराने और लापरवाही पर कार्रवाई की चेतावनी तक दी गई थी। यह निर्देश ऐसे समय आया जब प्रदेश के हजारों शिक्षक पहले से जनगणना प्रशिक्षण, डेटा संकलन और प्रशासनिक तैयारियों में व्यस्त हैं।

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आदेश सामने आते ही शिक्षकों में भारी नाराजगी फैल गई। शिक्षक संगठनों ने इसे शिक्षा व्यवस्था का मजाक बताते हुए सवाल उठाया कि क्या अब शिक्षकों का काम पढ़ाना नहीं, बल्कि हर सरकारी अभियान को पूरा करना रह गया है। सोशल मीडिया से लेकर विभागीय स्तर तक मामला तेजी से उछला और कई जिलों के शिक्षकों ने खुलकर विरोध दर्ज कराया। शिक्षक संगठनों ने साफ संकेत दे दिए कि यदि इस तरह के आदेश वापस नहीं लिए गए तो आंदोलन तेज किया जाएगा।

विवाद बढ़ता देख शिक्षा विभाग ने तुरंत डैमेज कंट्रोल शुरू किया। विभाग की ओर से सफाई दी गई कि पहले जारी पत्र की भाषा में त्रुटि थी, जिसे गलत तरीके से समझ लिया गया। इसके बाद 25 मई को एक ‘आंशिक संशोधित पत्र’ जारी किया गया, जिसमें पूरी तरह यू-टर्न लेते हुए स्पष्ट किया गया कि गोवंशों के लिए भूसा दान करना पूरी तरह स्वैच्छिक होगा। किसी भी विद्यालय, शिक्षक या कर्मचारी पर कोई दबाव नहीं बनाया जाएगा और न ही किसी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई होगी।

इसके बाद ही शिक्षकों में कुछ राहत दिखाई दी। हालांकि, इस पूरे विवाद ने उस गहरी समस्या को उजागर कर दिया है जिसमें प्राथमिक शिक्षक प्रशासन के सबसे ‘सुलभ’ सरकारी कर्मचारी बन चुके हैं। गांव-गांव तक मौजूद होने, पढ़े-लिखे होने और विभागीय कार्रवाई के डर के कारण लगभग हर सरकारी अभियान में सबसे पहले शिक्षकों की ड्यूटी लगा दी जाती है। चुनाव, मतदाता सत्यापन, राशन कार्ड सर्वे, छात्रवृत्ति जांच, पोषण अभियान, मिड डे मील प्रबंधन, स्वास्थ्य सर्वे, आधार सत्यापन और जनगणना जैसे कार्य पहले से ही शिक्षकों के जिम्मे हैं। अब भूसा संग्रह प्रकरण ने इस सूची को और लंबा कर दिया।

शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इसका सबसे बड़ा नुकसान सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब और ग्रामीण बच्चों को उठाना पड़ रहा है। शिक्षक लगातार स्कूल से बाहर रहेंगे तो कक्षाएं प्रभावित होंगी ही। पहले से शिक्षक कमी झेल रहे विद्यालयों में पढ़ाई का स्तर गिरने लगा है। विडंबना यह है कि सुप्रीम कोर्ट और शिक्षा का अधिकार कानून स्पष्ट रूप से कहते हैं कि शिक्षकों से केवल सीमित परिस्थितियों-जैसे चुनाव, जनगणना और आपदा में ही गैरशैक्षणिक कार्य लिए जा सकते हैं। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर लगभग हर प्रशासनिक जिम्मेदारी शिक्षक के हिस्से डाल दी जाती है।

बरेली का भूसा विवाद अब सिर्फ एक आदेश का मामला नहीं रह गया है। यह उस मानसिकता की तस्वीर बन गया है जिसमें शिक्षक को शिक्षा व्यवस्था का आधार नहीं, बल्कि हर काम के लिए उपलब्ध सरकारी कर्मचारी मान लिया गया है। सवाल अब केवल शिक्षकों की नाराजगी का नहीं, बल्कि प्रदेश की पूरी शिक्षा व्यवस्था के भविष्य का है।

लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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