पंचायत चुनाव लटके, सरकार पर बढ़ा दबाव,26 मई को खत्म हो रहा कार्यकाल

डेडलाइन नजदीक, कानूनी बाधाओं में पूरी तरह फंसा चुनावी कार्यक्रम 

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विवेक श्रीवास्तव

  • मतदाता सूची,आरक्षण प्रक्रिया से चुनाव कार्यक्रम पीछे खिसका
  • कार्यकाल बढ़ाने बनाम प्रशासक नियुक्ति पर मंथन तेज

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर तस्वीर अब काफी हद तक साफ होती दिख रही है। मौजूदा हालात में तय माना जा रहा है कि निर्धारित समय यानि मई 2026 में चुनाव कराना संभव नहीं होगा। प्रशासनिक तैयारियों में देरी, मतदाता सूची के पुनरीक्षण की लंबी प्रक्रिया और आरक्षण से जुड़े लंबित मुद्दों ने पूरे कार्यक्रम को पीछे धकेल दिया है। ऐसे में सरकार पर समय रहते वैकल्पिक व्यवस्था तय करने का दबाव तेजी से बढ़ रहा है।

प्रदेश की ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा है। संवैधानिक व्यवस्था के तहत इससे पहले चुनाव कराना अनिवार्य है, लेकिन जमीनी स्थिति इसके अनुकूल नहीं दिख रही। सबसे बड़ी बाधा मतदाता सूची का पुनरीक्षण है, जिसका अंतिम प्रकाशन  जून के दूसरे सप्ताह तक प्रस्तावित है। इसके बाद ही आरक्षण निर्धारण, वार्ड गठन और अन्य औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी हो सकेंगी। यही वजह है कि चुनाव कार्यक्रम का आगे खिसकना लगभग तय माना जा रहा है। 

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प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, इन सभी चरणों को पूरा करने में अतिरिक्त समय लगेगा, जिससे चुनाव जून के बाद ही संभव हो पाएंगे। इस देरी ने शासन और राज्य निर्वाचन तंत्र के सामने अंतरिम व्यवस्था का सवाल खड़ा कर दिया है। अब फोकस इस बात पर है कि पंचायतों का संचालन कार्यकाल खत्म होने के बाद कैसे जारी रखा जाए, ताकि विकास कार्य और सरकारी योजनाएं प्रभावित न हों।

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इसी बीच यह मुद्दा राजनीतिक रूप भी लेता जा रहा है। लखनऊ में हुई ग्राम प्रधान संगठन की बैठक में प्रधानों ने खुलकर अपने कार्यकाल बढ़ाने की मांग उठाई है। उनका तर्क है कि अधूरे विकास कार्यों और योजनाओं की निरंतरता बनाए रखने के लिए निर्वाचित प्रतिनिधियों का पद पर बने रहना जरूरी है। हालांकि संगठन ने यह भी कहा है कि यदि समय पर चुनाव कराए जाते हैं तो वे उसका स्वागत करेंगे। दूसरी ओर, कानूनी और प्रशासनिक बाधाएं सरकार के लिए चुनौती बनी हुई हैं। 

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पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष निर्धारित है, ऐसे में इसे बढ़ाने के लिए संवैधानिक और न्यायिक अड़चनों का सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि प्रशासनिक हलकों में प्रशासक नियुक्त करने का विकल्प अधिक व्यावहारिक माना जा रहा है। पूर्व में भी ऐसी परिस्थितियों में एडीओ (पंचायत) या अन्य अधिकारियों को पंचायतों का प्रभार सौंपा जा चुका है।

इस पूरे मामले में न्यायिक पक्ष भी अहम हो गया है। हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान समय पर चुनाव कराने की व्यवहारिकता पर सवाल उठे हैं और आगे की प्रक्रिया अदालत की निगरानी में तय होने की संभावना है। ऐसे में सरकार कोई भी फैसला लेते समय कानूनी संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रही है। ग्रामीण स्तर पर इस अनिश्चितता का असर भी दिखने लगा है। विकास कार्यों की रफ्तार और योजनाओं के क्रियान्वयन पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। प्रधान संगठन ने मनरेगा भुगतान, जल जीवन मिशन, पेयजल संकट और सड़क जैसी समस्याओं को उठाते हुए स्थिर प्रशासनिक व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया है।

कुल मिलाकर, पंचायत चुनाव का तय समय पर होना मुश्किल नजर आ रहा है। अब नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार कार्यकाल बढ़ाने के दबाव और कानूनी सीमाओं के बीच किस विकल्प को चुनती है-मौजूदा प्रधानों को राहत या फिर प्रशासनिक व्यवस्था के जरिए पंचायतों का संचालन। आने वाले दिनों में लिया गया फैसला न केवल प्रशासनिक दिशा तय करेगा, बल्कि ग्रामीण राजनीति के समीकरणों पर भी सीधा असर डालेगा।

लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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