बंगाल चुनाव: झालमुड़ी, चाणक्य नीति व मजबूत बूथ की तिकड़ी ने खिलाया कमल!

मोदी ने लोकल खानपान, शाह ने निरंतर दौरे व बंसल ने बूथ ट्रेनिंग के जरिये पकड़ी बंगाल की नब्ज

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रवि गुप्ता

  • कोलकाता बंदरगाह से ही पहली बार ब्रिटिश कंपनी ने की थी इंट्री, फिर लेफ्ट व ममता का रहा दबदबा
  • आजादी के बाद पहली बार क्षेत्रवाद से जुडेÞ दलों का किला ढहा, बनेगी बीजेपी सरकार
  • यूपी, झारखंड के बाद असम व बंगाल में बीजेपी सरकार, पूर्वोत्तर राज्यों की घेराबंदी आसान

लखनऊ। कहते हैं कि राजनीति में कब कौन सा पैंतरा, कौन सी गोटी किसके पाले में बैठ जाये इसका सही आंकलन कर पाना एक तरह से पानी में तीर चलाने जैसा ही है, मगर यह तथ्य भी वास्तविकता के करीब है कि जिस पश्चिम बंगाल में आजादी के बाद अब तक केवल लेफट राजनीतिक दलों का या फिर उसके बाद ममता दीदी का वहां की सरकार पर दबदबा कायम रहा, वहां पर पूर्ण बहुमत के साथ कमल खिल जाने के पीछे जरूर बीजेपी टीम की कोई न कोई दीर्घकालिक रणनीति, जमीनी सर्वे और वहां के एक बड़े वर्ग के वोटरों की मानसिकता को पहचाने, उनकी बंगाली संस्कृति व सभ्यता से जुडी संवेदनाओं को समझने और साथ ही साथ आसपास के अपनी पार्टी के राज्य सरकारों के साथ तालमेल करते हुए उन्हें बंगाल के चुनाव में कब, कहां और कैसे उतारने की एक सोची समझी चाणक्य नीति के सफल क्रियान्वयन को माना सकता है।

बंगाल के सार्वजनिक चुनावी सभाओं या फिर पब्लिक फोरम के सतह पर तो मोदी फैक्टर का ही प्रभाव दिखता रहा, मगर इससे इतर अंदरूनी खाने में शाह का लगातार बंगाल दौरा और बंसल की वहां के संगठन टीम को बूथ प्रशिक्षण कराने की जमीनी पाठशाला ने हर एक चुनावी मुददे पर फोकस करना शुरू किया और उसी के हिसाब से चुनावी कैंपनिंग की जिसका नतीजा आखिरकार उनके हक में आ ही गया।

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बंगाल चुनाव से जुड़े राजनीतिक जानकारों की माने तो झालमुड़ी कहने को तो वहां के खानपान का एक बड़ा ही सस्ता लोकल भूजा, चुरमुरा या नाश्ता माना जाता है, लेकिन चुनावी माहौल के बीच अचानक वहां के किसी एक दुकान पर मोदी का जाना, बंगाली दुकानदार से बातचीत करना और झालमुड़ी खरीदना कोई चुनावी स्टंट या बेवजह की पब्लिसिटी नहीं थी, बल्कि इसके जरिये मोदी ने वहां के लोकल खानपान से अपने को जोड़ा और फिर देखते ही देखते एक आम सी झालमुडी, बंगाल की सीमाओं से बाहर निकलकर पूरे देश-दुनिया में मशहूर हो गयी। यही नहीं इससे जुड़ा वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल होता दिखा, जिसका असर यह रहा कि जो राज्य से बाहर बंगाली समुदाय के लोग थे उनका कनेक्शन इससे जुड़ता चला गया।

वहीं जब बंगाल की चुनावी गहमागहमी के बीच बीजेपी के राष्ट्रीय महामंत्री व मोदी-शाह के सबसे खास सिपेहसलार व संगठन रणनीतिकार सुनील बंसल ने कुछ दिनों पहले जब अपने सोशल मीडिया हैंडल पर यह संदेश डाला कि ‘बंगाल में बहुत कीचड़ हो गया, अब खिलेगा कमल’...तो इससे भी यह अंदाजा लग गया कि अबकी बार बंगाल में भाजपा की सरकार बनने की प्रबल संभावना है, जबकि चाहे सरकार हो या फिर संगठन बंसल सीधे तौर पर किसी प्रकार की दलगत बयानबाजी से परहेज करते हैं, पर बंगाल इलेक्शन के बीच उनका इस तरह से पब्लिक फोरम पर मैसेज देना एक अलग ही बंगला किस्सा बयां कर रहा था।

लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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