‘मजिस्ट्रेट की हिम्मत कैसे हुई छात्र को नोटिस देने की? - सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा अधिकारी की कार्रवाई पर जताई नाराजगी
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा में एक छात्र को कथित तौर पर छात्र प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाने के आरोप में नोटिस जारी किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने सवाल किया कि जब उसने छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में छात्रों के खिलाफ आगे कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया था, तो कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने नोटिस कैसे जारी कर दिया।
यह मामला बुधवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने मौखिक रूप से उठाया गया। वकील ने अदालत को बताया कि गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के द्वितीय वर्ष के छात्र अक्षत त्रिपाठी को ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से नोटिस जारी किया गया था। नोटिस में छात्र से शांति बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपये का निजी मुचलका भरने को कहा गया था। वकील के अनुसार, बाद में यह नोटिस वापस ले लिया गया।
वकील ने अदालत के समक्ष कहा कि नोएडा पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर छात्र को नोटिस जारी किया गया और इसे छात्रों में भय पैदा करने की कोशिश बताया। उन्होंने कहा कि अधिकारियों की ऐसी कार्रवाई से छात्रों में ‘फियर साइकोसिस’ पैदा नहीं किया जा सकता।
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा, “मजिस्ट्रेट की हिम्मत कैसे हुई नोटिस जारी करने की? हमने स्पष्ट किया था कि किसी भी छात्र के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी। कोई मजिस्ट्रेट हमारे आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता।”
कोर्ट ने वकील से संबंधित नोटिस को याचिका के माध्यम से रिकॉर्ड पर लाने को कहा। अदालत ने संकेत दिया कि मामले में संबंधित अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा जाएगा।
क्या था नोटिस में?
4 सितंबर 2026 को जारी नोटिस में कार्यकारी मजिस्ट्रेट III, ग्रेटर नोएडा ने छात्र के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126/135 के तहत कार्यवाही शुरू की थी। पुलिस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि छात्र विश्वविद्यालय के अन्य छात्रों के बीच कथित तौर पर सरकार विरोधी और भ्रामक बातें फैला रहा था तथा उन्हें प्रस्तावित धरने में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहा था।
पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में यह भी दावा किया था कि छात्र की गतिविधियों से तनाव की स्थिति पैदा हुई और लड़ाई-झगड़े तथा शांति भंग होने की आशंका थी। इन्हीं आधारों पर कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने छात्र को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा था कि उससे 5 लाख रुपये का निजी मुचलका और 5 लाख रुपये की दो जमानतें क्यों न भरवाई जाएं।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से स्पष्ट है कि अदालत अपने पूर्व निर्देशों के बावजूद छात्रों के खिलाफ की गई किसी भी संभावित दंडात्मक कार्रवाई को गंभीरता से देख रही है।
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गर्गी विश्वकर्मा वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ से जुड़ी हैं और डिजिटल डिप्टी चीफ कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं। वह डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए स्पष्ट, तथ्यपरक और पाठक-केंद्रित कंटेंट तैयार करती हैं।
