देश में घूम रहे लाखों दिमाग़ी नफ़रती 'स्वतंत्र': निर्मल रानी
इन दिनों स्वतंत्र भारद्वाज नामक एक 21 वर्षीय नवयुवक अपने कुछ अति नफ़रती पॉडकास्ट की वजह से चर्चा में है। मूल रूप से बिहार के दरभंगा के ग्रामीण परिवेश में पला बढ़ा यह नवयुवक दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र भी रहा है। वह खुद को कट्टर हिंदुत्ववादी विचारधारा से जुड़ा हुआ बताता है और कई हिंदू संगठनों और गोरक्षकों के साथ मिलकर सक्रिय रूप से काम भी करता रहा है। पिछले दिनों इसने एक यूट्यूब चैनल के पॉडकास्ट में अपना संगीन जुर्म क़ुबूल करते हुये जो ख़ुलासे किये और जिसतरह नफ़रत का ज़हर उगला वह देश के शांतिप्रिय समाज को हैरान करने वाले थे।
पॉडकास्ट में स्वतंत्र भारद्वाज ने बड़ी ही बेबाकी और गर्व के साथ हंसते हुए यह दावा किया कि उसने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन काक्रोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान निशु आज़ाद के पिता संजय कुमार का सिर फोड़ दिया था। उसने यह भी कहा कि पीड़ित को गंभीर चोट आई थी और लगभग 60 टांके लगे थे। उसने आगे कहा कि ऐसी चोट पर अमूमन धारा 307 (हाफ़ मर्डर/हत्या का प्रयास) लगती है।
फिर उसने बड़ी शान से कहा कि 'बंदा एम्बुलेंस से अस्पताल जा रहा था', लेकिन वह खुद अगले ही दिन बाहर आ गया और उसे एक रात भी जेल में नहीं बितानी पड़ी। इसी पॉडकास्ट में उसने यह दावा भी किया कि पीएम मोदी,बीजेपी नेता कपिल मिश्रा और केंद्रीय मंत्री चिराग़ पासवान आदि उसके "बड़े भाई" जैसे हैं। उसका कहना था कि इन बड़े नेताओं और रसूख़दारों के फ़ोन आने पर और उनकी पैरवी के दबाव में दिल्ली पुलिस ने उसे छोड़ दिया था। उसने पॉडकास्ट में छात्रा व एक्टिविस्ट निशु आज़ाद को भी धमकाते हुए कहा कि "अब निशु अगला टारगेट है और सारी फ़ील्डिंग सेट है"।
स्वतंत्र भारद्वाज ने इंटरव्यू के दौरान मुस्लिम समुदाय के प्रति अपनी गहरी नफ़रत भी ज़ाहिर की थी। उसने कहा कि वह मौक़ा खोजता है कि कोई मुस्लिम ग़लती करे तो वह उनका "इलाज" करे। उसने गोल टोपी और दाढ़ी वाले लोगों को लेकर बेहद आपत्तिजनक और विवादित बयान भी दिए थे। आज देश की धर्मनिरपेक्षता व संविधान का सम्मान करने वाला देश का एक बड़ा वर्ग भले ही 'स्वतंत्र' की बातों व उसके दुस्साहस का विरोध क्यों न कर रहा हो परन्तु इसके बावजूद भी चंद नफ़रती दक्षिणपंथी लोगों का समुह उसके समर्थन में भी नज़र आया।
इस नफ़रती ज़हरीले युवक को कांग्रेस,राहुल गाँधी,काक्रोच जनता पार्टी कार्यकर्ताओं व सांसद चंद्रशेखर आज़ाद जैसे लोगों के भारी दबाव व प्रदर्शन के बाद फ़िलहाल गिरफ़्तार किये जाने की ख़बर है। किसी दक्षिणपंथी व्यक्ति के नफ़रत और आपराधिक क़ुबूलनामे का यह पहला वीडिओ नहीं है। याद कीजिये गुजरात दंगों के बारे में साल 2007 में 'तहलका' पत्रिका के पत्रकार आशीष खेतान द्वारा किए गए 'ऑपरेशन कलंक' नामक स्टिंग ऑपरेशन में, बजरंग दल के तत्कालीन गुजरात प्रमुख बाबू बजरंगी उर्फ़ बाबूभाई पटेल ने कैमरे पर 2002 के नरोदा पाटिया नरसंहार में अपनी सीधी भूमिका और बेहद ख़ौफ़नाक अपराधों में अपनी संलिप्तता को इसी तरह क़ुबूल किया था।
बाबू बजरंगी ने बड़ी ही क्रूरता और गर्व के साथ हंसते हुए और छाती ठोककर स्वीकार किया था कि उसने नरोदा पाटिया में लोगों को बेरहमी से काटा और ज़िंदा जलाया था। उसने कहा था, "हमें मारने में बहुत मज़ा आया... ऐसा लगा जैसे हम महाराणा प्रताप हैं।" उसने कैमरे पर दावा किया था कि उसने कौसर बानो नामक एक नौ महीने की गर्भवती मुस्लिम महिला के पेट को तलवार से चीर दिया था। उसने बताया था कि कैसे दंगाइयों की भीड़ ने नरोदा पाटिया इलाक़े को चारों तरफ़ से घेर लिया था ताकि कोई भी मुस्लिम बचकर भाग न सके। उसने पूरे इलाक़े को आग के हवाले करने की बात भी स्वीकार की थी। बजरंगी ने क़बूल किया था कि गोधरा कांड का बदला लेने के लिए उसने ख़ुद रिवॉल्वर, तलवारें और हथियार बांटे थे। उसने अपनी एक गन फ़ैक्ट्री होने और वहां बड़ी मात्रा में डीज़ल बम तथा पाइप बम बनाकर हिंदुओं को सप्लाई करने की बात भी कही थी। उसने यह दावा भी किया था कि दंगों के दौरान राज्य की पुलिस मूकदर्शक बनी रही और उनका पूरा साथ दे रही थी। उसने यह भी दावा किया था कि दंगों के बाद जब उसकेख़िलाफ़ मामले दर्ज हुए, तो तत्कालीन मुख्यमंत्री (नरेंद्र मोदी ) ने उसे सुरक्षित जगहों पर छिपने और क़ानूनी राहत दिलाने में मदद की थी। इसी ऑन-कैमरा क़बूलनामे और अन्य चश्मदीदों के बयानों को मुख्य आधार बनाकर ही अदालत ने 2012 में बाबू बजरंगी को दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी, जिसे बाद में गुजरात हाई कोर्ट ने भी बरक़रार रखा। यह और बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने उसे मार्च 2019 में ख़राब स्वास्थ्य और मेडिकल ग्राउंड पर सशर्त ज़मानत दे दी थी। जेल प्रशासन और डॉक्टरों की रिपोर्ट के मुताबिक़ बाबू बजरंगी की आंखों की रोशनी लगभग 100 प्रतिशत ख़त्म हो चुकी है और वह पूरी तरह से दृष्टिहीन हो चुका है।
साथ ही उसकी बायपास सर्जरी भी हो चुकी है। इसी ख़राब शारीरिक स्थिति को आधार बनाते हुए अदालत ने उसे मानवीय आधार पर रिहा करने का आदेश दिया था। इसके अलावा साल 2023 में गुजरात दंगों से ही जुड़े नरोदा गाम नरसंहार मामला में भी कोर्ट ने बाबू बजरंगी सहित सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। नरोदा पाटिया मामले में उसकी दोष सिद्धि बरक़रार है, लेकिन वह जेल से बाहर अपनी ज़मानत की अवधि पर है।
आज देश की धर्मनिरपेक्षता व संविधान का सम्मान करने वाला देश का एक बड़ा वर्ग भले ही 'स्वतंत्र' की बातों व उसके दुस्साहस का विरोध क्यों न कर रहा हो पांच इसके बावजूद भी चंद लोगों का समुह उसके समर्थन में भी नज़र आया। इस 'नफ़रती गिरोह ' को आख़िर खाद पानी कहाँ से मिलता है ? यही वह 'दिमाग़ी नफ़रती ' के संरक्षक हैं जिन्होंने समय समय पर कभी माया कोडनानी को तो कभी बाबू बजरंगी को कभी जयदीप पटेल तो कभी प्रह्लाद गोसा व दयाभाई पटेल जैसे गुजरात दंगों के 67 प्रमुख आरोपी सत्ता के सहारे बचाए गए।
यही वह नफ़रती तंत्र है जिसकी वजह से एहसान जाफरी को ज़िंदा जला देने वाले बिपिन पटेल और पुलिस निरीक्षक के जी एर्दा आदि सब बाइज्जत बरी हो गए। इसी के द्वारा बेस्ट बेकरी काण्ड में 14 मासूमों को जलाकर खाक कर देने वाले सभी बरी हो गए थे। इसी नफ़रती तंत्र ने बिल्किस बानो के 11 सज़ायाफ़्ता बलात्कारी रिहा कर दिए थे जिसे भारी जनाक्रोश के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पुनः जेल भेजा।
दरअसल देश की सामाजिक एकता व सद्भाव को तहस नहस करने वाले सत्ता संरक्षित यही भारतीय दक्षिणपंथी हैं। ऐसे हिंसक एजेंडे वाले सभी संगठनों व समूहों को भंग करने और कानून के अनुसार उनपर मुकदमा चलाने की जरूरत है। यदि हम गाँधी के विचारों का भारत चाहते हैं तो हमें अपनी बहुलवादी समन्वयवादी परंपरा पर ऐसे हमलों को शांतिपूर्ण ढंग से नकारने के लिए बौद्धिक रूप से सुसज्जित और नैतिक रूप से तैयार एक नागरिक समाज की आवश्यकता है। और यह एक ऐसा काम है जिसे देश को एकजुट होकर पूरा करना पड़ेगा।
छात्रों और युवाओं को अपनी वैचारिक, राजनीतिक प्रवृत्तियों की परवाह किए बिना इस सार्थक अभियान का नेतृत्व करना होगा और वैमनस्यवादियों का जवाब देना होगा। क्योंकि दुर्भाग्यवश ऐसे और भी अनेक उदाहरण हैं जिनसे पता चलता है कि आज एक 'स्वतंत्र भारद्वाज' ही नहीं बल्कि देश में लाखों दिमाग़ी नफ़रती 'स्वतंत्र ' घूम रहे हैं।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
