संपादकीय: छात्रावास संकट! पढ़ाई से पहले आवास की चुनौती

70 हजार छात्रों के लिए सिर्फ 7 हजार बिस्तर पर्याप्त नहीं

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दिल्ली विश्वविद्यालय देश के सबसे प्रतिष्ठित उच्च शिक्षा संस्थानों में से एक है। हर वर्ष देश के कोने-कोने से मेधावी छात्र यहां दाखिला लेने आते हैं। परंतु शिक्षा का यह सफर आवास की विकराल समस्या से शुरू होता है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, डीयू से संबद्ध लगभग ७७ कॉलेजों में से करीब ५७ कॉलेजों में अपना छात्रावास ही नहीं है। 

कुल मिलाकर विश्वविद्यालय में मात्र सात हजार बिस्तर उपलब्ध हैं, जबकि हर साल सत्तर हजार से अधिक छात्र स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेते हैं। यह आंकड़ा न सिर्फ चौंकाने वाला है, बल्कि उच्च शिक्षा व्यवस्था की गंभीर विफलता को उजागर करता है। इस असमानता का सीधा असर उन हजारों छात्रों पर पड़ता है जो दिल्ली से बाहर से आते हैं। अनुमान है कि डीयू के आधे से अधिक छात्र बाहरी राज्यों के होते हैं। उनके लिए सुरक्षित, किफायती और सुविधाजनक आवास की व्यवस्था विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी होनी चाहिए थी। 

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लेकिन वास्तविकता यह है कि छात्रावासों में सीटों की भारी कमी के कारण अधिकांश छात्र महंगे पीजी, किराए के कमरों या असुरक्षित इमारतों में रहने को मजबूर हैं। हाल ही में सत्य निकेतन में इमारत गिरने की दुखद घटना ने इस समस्या को फिर से उजागर किया। सात युवा जिंदगियां इसलिए चली गईं क्योंकि विश्वविद्यालय अपने छात्रों को सुरक्षित छत नहीं दे सका। छात्रावास सिर्फ रहने की जगह नहीं है। यह छात्रों के समग्र विकास का केंद्र होता है। वहां अनुशासन, समय प्रबंधन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सुरक्षित वातावरण मिलता है। पीजी में रहने वाले छात्र अक्सर शोर, असुरक्षा, महंगे किराए और खराब भोजन से जूझते हैं। लड़कियों के लिए यह समस्या और भी गंभीर है। कई अभिभावक सुरक्षा की चिंता के कारण अपनी बेटियों को डीयू भेजने से हिचकते हैं। 

आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के छात्रों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। किराया, जमा राशि और अन्य खर्च शिक्षा की लागत को दोगुना-तिगुना कर देते हैं। यह संकट नया नहीं है। एक दशक पहले भी स्थिति लगभग वैसी ही थी। मोदी सरकार ओने के बाद भी किसी एक भी छात्रावास का निमार्ण नही हुआ, छात्रों की संख्या बढ़ी, नए कॉलेज जुड़े, पाठ्यक्रम बढ़े, लेकिन आवास की क्षमता लगभग जस की तस रही। कुछ कॉलेजों में छात्रावास हैं भी तो उनकी क्षमता नगण्य है। मिरांडा हाउस, हिंदू, हंसराज या एसआरसीसी जैसे प्रमुख कॉलेजों में भी छात्रों की संख्या हजारों में है, जबकि बिस्तर मात्र सैकड़ों में। 

कई छात्रावास मरम्मत के लिए बंद पड़े हैं। डीयू के पास भूमि की कमी तो कतई नही है, पुरानी इमारतें और प्रशासनिक देरी समस्या को और जटिल बनाती हैं। समाधान संभव है। विश्वविद्यालय प्रशासन, दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार को मिलकर ठोस कार्ययोजना बनानी चाहिए। जहां जगह उपलब्ध है, वहां नए छात्रावासों का निर्माण तेजी से हो। मौजूदा छात्रावासों का विस्तार और आधुनिकीकरण किया जाए। पीपीपी मॉडल अपनाकर निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है। विश्वविद्यालय परिसर के आसपास सुरक्षित और विनियमित छात्र आवास विकसित किए जाएं। किराया नियंत्रण और सुरक्षा मानकों को सख्ती से लागू किया जाए। 

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इस मुद्दे पर दिल्ली सरकार और यूजीसी से समयबद्ध योजना मांगी है। इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।उच्च शिक्षा सिर्फ डिग्री देने का नाम नहीं है। यह युवाओं को सशक्त बनाने का माध्यम है। जब छात्र आवास की चिंता में उलझे रहें तो वे पढ़ाई पर पूरा ध्यान कैसे केंद्रित कर सकते हैं? डीयू जैसे सभी संस्थान का कर्तव्य है कि वह न सिर्फ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे, बल्कि छात्रों के जीवन को भी सुरक्षित और सुविधाजनक बनाए। 

सात हजार बिस्तर सत्तर हजार छात्रों के लिए पर्याप्त नहीं हैं। यह आंकड़ा बदलना ही होगा। अन्यथा शिक्षा का सपना आधे अधूरे ही रह जाएगा। सरकार और प्रशासन को अब और विलंब नहीं करना चाहिए। छात्रों का भविष्य दांव पर है।

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लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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