- बार एसोसिएशन का पदाधिकारी होने से अवैध निर्माण को संरक्षण देना गलत
लखनऊ। जिला न्यायालय के आसपास बने वकीलों के 12 अवैध चैंबरों को हटाने का रास्ता साफ हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि वकील या बार एसोसिएशन का पदाधिकारी होने के आधार पर किसी अवैध निर्माण को संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायालय परिसर और सार्वजनिक रास्ते अतिक्रमण से मुक्त होने चाहिए। हाईकोर्ट ने पहले करीब 72 कब्जेदारों को नोटिस देकर अपना पक्ष रखने का मौका देने का आदेश दिया था। मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने की।
सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि आखिर ये निर्माण कहां स्थित हैं और मुख्य सड़क पर ऐसे ढांचे कैसे खड़े कर दिए गए? उन्होंने कहा कि अवैध निर्माण को इस आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता कि संबंधित व्यक्ति बार एसोसिएशन का अध्यक्ष या पदाधिकारी है। कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी की कि पहले अवैध निर्माण किया जाए और फिर पद का हवाला देकर उसे बचाने की कोशिश की जाए, यह स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में वरिष्ठ न्यायाधीश रह चुके जस्टिस विक्रम नाथ ने सुनवाई के दौरान कहा कि उन्होंने स्वयं उस क्षेत्र की स्थिति देखी है। उन्होंने कहा कि सड़कें किस तरह घेर ली गई थीं और किस प्रकार यातायात बाधित हो रहा था, इसकी उन्हें पूरी जानकारी है। दरअसल, 6 अगस्त को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ जिला न्यायालय परिसर के आसपास सार्वजनिक रास्तों और उपयोगिता भूमि पर बने कथित अवैध निर्माणों को लेकर आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने लखनऊ नगर निगम को निर्देश दिया था कि करीब 72 कब्जेदारों को नोटिस जारी कर उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए।
हाईकोर्ट ने कहा था कि यदि संबंधित लोग जमीन और निर्माण पर वैध अधिकार साबित नहीं कर पाते हैं तो अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई की जाए। नगर निगम की ओर से ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की तैयारी शुरू होने और 30 अगस्त तक कार्रवाई प्रस्तावित होने के बाद कुछ वकील सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए थे। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता आदिश अग्रवाला ने प्रभावित वकीलों को वैकल्पिक स्थान देने और मामले को मध्यस्थता में भेजने का सुझाव दिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट इस दलील से सहमत नहीं हुआ।
जस्टिस विक्रम नाथ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि वकीलों द्वारा किए गए कथित अतिक्रमण के मामले को मध्यस्थता में भेजने का कोई औचित्य नजर नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि न्यायालय परिसरों को अतिक्रमण से मुक्त रखना जरूरी है। अदालत ने संकेत दिया कि सार्वजनिक भूमि और न्यायालय से जुड़े क्षेत्रों में अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई कानून के मुताबिक आगे बढ़नी चाहिए।