आज का लेख: चाय की दुकान का आधा भरा कुल्हड़- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
छोटी सी दुकान के कोने में लकड़ी की एक पुरानी बेंच...
शहर के सबसे व्यस्त चौराहे पर मन्नू की चाय की दुकान केवल एक गुमटी नहीं थी बल्कि उस पूरे इलाके की धड़कन थी जहाँ रोज सुबह से देर रात तक लोगों का तांता लगा रहता था। उस छोटी सी दुकान के कोने में लकड़ी की एक पुरानी बेंच रखी थी जहाँ हर शाम रामनाथ जी आकर बैठते थे। सफेद कुर्ता-पायजामा पहने और चेहरे पर एक अजीब सी खामोशी लिए रामनाथ जी जब भी आते तो मन्नू बिना कुछ पूछे मिट्टी के कुल्हड़ में कड़क अदरक वाली चाय उनके सामने रख देता था।
रामनाथ जी चाय का केवल एक घूँट लेते और फिर उस आधे भरे कुल्हड़ को घंटे भर अपने हाथों में पकड़े टुकुर-टुकुर सामने की सड़क को निहारते रहते थे। मन्नू ने सालों से यह माजरा देखा था लेकिन उसने कभी उनसे इस बात का कारण पूछने की हिम्मत नहीं जुटाई थी। एक दिन जब दुकान पर ग्राहकों की भीड़ कुछ कम हुई तो मन्नू से रहा नहीं गया और वह हाथ में पोछा लिए उनके पास जाकर खड़ा हो गया।
मन्नू ने बहुत ही सहेज कर अपनी बात रखते हुए पूछा "बाबूजी आप रोज आते हैं और इतनी बढ़िया गरम चाय का बस एक घूँट पीकर छोड़ देते हैं, बाकी की पूरी चाय ठंडी होकर बेकार हो जाती है, क्या हमारी चाय का स्वाद आपको पसंद नहीं आता या फिर कोई और बात है?" रामनाथ जी ने एक गहरी सांस ली और अपने कांपते हाथों से उस कुल्हड़ को सहलाते हुए मुस्कुराए। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक तैर गई और उन्होंने धीमी आवाज में कहा "मन्नू भाई इस कुल्हड़ की मिठास तो मुझे उस राह पर ले जाती है जहाँ मेरा पूरा संसार बसा हुआ है।"
रामनाथ जी की बात सुनकर मन्नू की उत्सुकता और बढ़ गई क्योंकि उसे लगा कि शायद किसी पुराने प्यार या खोए हुए रिश्ते की कहानी अब बाहर आने वाली है। उन्होंने आगे बोलना शुरू किया "मन्नू तुम्हें शायद पता नहीं है कि यह आधा भरा कुल्हड़ मेरे लिए सिर्फ चाय का बर्तन नहीं बल्कि उम्मीद की वह आखिरी किरण है जो मुझे रोज जीने की वजह देती है।" तभी चौराहे पर तेज हॉर्न की आवाज हुई और रामनाथ जी ने अपनी निगाहें सड़क की ओर दौड़ा दीं जैसे वे किसी चमचमाती गाड़ी का इंतजार कर रहे हों।
मन्नू ने उत्सुक होकर पूछा "बाबूजी क्या आपका कोई अपना उस पार से आने वाला है जिसके लिए आप रोज यहाँ बैठकर राह तकते हैं?" रामनाथ जी ने चाय के कुल्हड़ को बेंच पर रखा और बड़े गर्व के साथ कहा "मेरा बेटा है मन्नू, बहुत बड़ा अफसर बन गया है और बड़े शहर में रहता है, जब वह छोटा था तो हम दोनों इसी दुकान पर आकर एक ही कुल्हड़ से चाय पिया करते थे, आधा कुल्हड़ वह पीता था और आधा मैं पीता था, तब से मुझे आधे कुल्हड़ की ही आदत पड़ गई है।"
मन्नू के चेहरे पर एक हमदर्दी भरी मुस्कान आ गई और उसने कहा "अच्छा तो बाबूजी आप यहाँ बैठकर अपने साहबजादे का इंतजार करते हैं कि वह किसी दिन आएगा और आपके साथ बैठकर यह आधी बची हुई चाय पूरे हक से पिएगा।" रामनाथ जी की आँखों में चमक आ गई और उन्होंने सिर हिलाकर हाँ में जवाब दिया।
पास के पान वाले ने जब यह बातचीत सुनी तो उसने दूर से ही चुटकी लेते हुए कहा "रामनाथ जी आप भी क्या कमाल करते हैं, चार साल हो गए आपको इस कोने में बैठकर सड़क नापते हुए, आपका साहबजादा अगर आने वाला होता तो कब का आ गया होता।" रामनाथ जी ने पान वाले की बात को अनसुना कर दिया और मुस्कुराते हुए मन्नू से बोले "मन्नू तुम इन लोगों की बातों पर ध्यान मत दो, औलाद जब बड़ी हो जाती है तो उस पर जिम्मेदारियों का बहुत बड़ा पहाड़ टूट पड़ता है, उसके पास वक्त नहीं होता लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि मेरा बेटा अपनी इस मिट्टी की खुशबू को कभी नहीं भूल सकता।"
मन्नू ने देखा कि रामनाथ जी के चेहरे पर अपने बेटे को लेकर एक अटूट विश्वास था जिसे दुनिया की कोई भी कड़वी बात डिगा नहीं सकती थी। शाम ढलने लगी थी और चौराहे की बत्तियाँ एक-एक करके जलने लगी थीं लेकिन रामनाथ जी की नजरें अब भी चौराहे पर रुकने वाली हर बस और कार के दरवाजे पर टिक जाती थीं।
जब भी कोई गाड़ी रुकती तो उनके चेहरे पर एक हल्की सी उम्मीद जागती और जब वह गाड़ी आगे बढ़ जाती तो वे फिर से कुल्हड़ को हाथ में थामकर बैठ जाते थे। मन्नू मन ही मन सोचने लगा कि एक बाप का दिल भी कितना भोला होता है जो बरसों की बेरुखी को भी काम की व्यस्तता मानकर मुस्कुराता रहता है और हर कड़वे घूँट को मीठा समझकर पी जाता है।
अगले कुछ दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा और रामनाथ जी नियम से हर शाम आते और आधा कुल्हड़ चाय छोड़कर अंधेरा होने पर उदास कदमों से वापस लौट जाते। शहर में अब ठंड का मौसम दस्तक दे चुका था और शाम होते ही चौराहे पर धुंध की मोटी परत जमने लगती थी लेकिन रामनाथ जी का नियम कभी नहीं टूटता था। एक दिन मन्नू ने हिम्मत करके उनसे पूछ ही लिया "बाबूजी अगर आपको कभी अपने बेटे की बहुत याद आती है तो आप खुद उसके पास शहर क्यों नहीं चले जाते, आखिर बाप का हक तो बेटे पर सबसे ज्यादा होता है।"
रामनाथ जी ने अपनी कांपती उँगलियों से अपनी जेब से एक पुराना मुड़ा हुआ कागज निकाला और उसे मन्नू की तरफ बढ़ाते हुए कहा "यह उसके दफ्तर का पता है मन्नू, उसने मुझे खुद लिखा था कि जब भी मुझे उसकी याद आए तो मैं इस पते पर आ जाऊँ, लेकिन मैं सोचता हूँ कि अगर मैं वहाँ चला गया और पीछे से वह मुझे ढूँढता हुआ यहाँ आ गया तो हमारा मिलन छूट जाएगा।" मन्नू ने उस पुराने कागज को देखा जिस पर बहुत ही सुंदर अक्षरों में बड़े शहर का एक पता लिखा हुआ था और नीचे बेटे का नाम लिखा था। रामनाथ जी ने आगे कहा "इसीलिए मैं रोज यहाँ आता हूँ ताकि जब भी उसकी गाड़ी इस चौराहे पर रुके तो उसे अपने बूढ़े बाप को ढूँढने के लिए भटकना न पड़े, वह सीधे इस दुकान पर आए और हम दोनों फिर से एक कुल्हड़ चाय साथ मिलकर पिएं।"
ठंड बढ़ती जा रही थी और उस शाम हवा में अजीब सी कनकनी थी लेकिन रामनाथ जी अपनी पुरानी जगह पर बैठे हुए कुल्हड़ की गर्माहट से अपनी कांपती हथेलियों को सेंक रहे थे। तभी चौराहे पर एक बहुत बड़ी और महंगी गाड़ी आकर रुकी जिसके शीशे पूरी तरह काले थे और उस पर सरकारी महकमे का बोर्ड लगा हुआ था। गाड़ी का दरवाजा खुला और उसमें से एक सूट-बूट पहने हुए रोबदार इंसान बाहर निकला जिसने चारों तरफ अपनी नजरें दौड़ाईं। मन्नू ने जब उस बड़े अफसर को अपनी दुकान की तरफ आते देखा तो उसके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई और उसने तुरंत रामनाथ जी को हिलाते हुए कहा "बाबूजी देखिए आपकी तपस्या पूरी हो गई, शायद आपका बेटा साहब बनकर आपसे मिलने आ गया है।" रामनाथ जी की आँखों में आँसू आ गए और वे झटके से अपनी लाठी के सहारे खड़े हो गए और अपने कांपते हाथों से कुर्ते को ठीक करने लगे। वह अफसर सीधा मन्नू की दुकान के पास आया और उसने मन्नू की तरफ देखते हुए एक सख्त लहजे में पूछा "क्या इस दुकान के मालिक तुम ही हो मन्नू नाम है तुम्हारा?" मन्नू ने बहुत ही अदब से हाथ जोड़कर कहा "जी साहब मैं ही मन्नू हूँ, आप अपने पिताजी को पहचानिए ये रोज बरसों से आधा कुल्हड़ चाय थामे आपका ही रास्ता देखते हैं।"
वह अफसर एक पल के लिए रुका और फिर उसने अपनी जेब से एक सरकारी लाल फीते से बंधा हुआ लिफाफा निकाला और मन्नू की तरफ बढ़ाते हुए बेहद रूखे स्वर में बोलना शुरू किया "मैं नगर निगम का नया लैंड एक्विजिशन अफसर हूँ और मुझे यह दफ्तर से हुक्म मिला है कि इस अवैध चौराहे के चौड़ीकरण के लिए तुम्हारी इस चाय की दुकान को तुरंत तोड़ा जाए।" रामनाथ जी का कांपता हुआ हाथ हवा में ही जम गया और उनके हाथ से वह आधा भरा मिट्टी का कुल्हड़ छूटकर नीचे जमीन पर गिर पड़ा और छन से टूटकर मिट्टी में मिल गया।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
