समाज अक्सर दिव्यांगता को किसी व्यक्ति की कमजोरी मान लेता है, जबकि वास्तविकता यह है कि दिव्यांगता शरीर में होती है, मन में नहीं। इतिहास गवाह है कि जिन लोगों ने जीवन की कठिनतम परिस्थितियों को स्वीकार कर संघर्ष का मार्ग चुना, उन्होंने अपनी प्रतिभा और दृढ़ इच्छाशक्ति से असंभव को भी संभव कर दिखाया। आज जब समाज समान अवसर, समावेशी शिक्षा और आत्मनिर्भर भारत की बात करता है, तब डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ के दिव्यांग विद्यार्थियों ने अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन से यह सिद्ध कर दिया है कि यदि अवसर, मार्गदर्शन और विश्वास मिले तो कोई भी बाधा सफलता का रास्ता नहीं रोक सकती।
विश्वविद्यालय के 13वें दीक्षांत समारोह से पहले सामने आए आँकड़े केवल उपलब्धियों का विवरण नहीं हैं, बल्कि वे उन संघर्षों की कहानी कहते हैं जो हर दिन इन विद्यार्थियों ने अपने जीवन में जी है। इस वर्ष विश्वविद्यालय के 27 दिव्यांग विद्यार्थियों ने कुल 45 पदक अपने नाम किए हैं। इनमें 22 स्वर्ण, एक रजत और चार कांस्य पदक शामिल हैं। इन विद्यार्थियों में 13 छात्राएं और 14 छात्र हैं। यह उपलब्धि इसलिए भी विशेष है क्योंकि जिन परिस्थितियों में सामान्य विद्यार्थी सहज रूप से शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं, वहीं दिव्यांग विद्यार्थियों को प्रत्येक दिन नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कभी दृष्टिबाधा उनकी राह रोकती है, कभी श्रवण बाधा संवाद में कठिनाई पैदा करती है, तो कभी शारीरिक अक्षमता सामान्य गतिविधियों को भी कठिन बना देती है। इसके बावजूद इन विद्यार्थियों ने यह सिद्ध किया कि यदि आत्मविश्वास अडिग हो तो कोई भी बाधा सफलता के मार्ग में स्थायी अवरोध नहीं बन सकती।
दिव्यांग विद्यार्थियों की सबसे बड़ी लड़ाई केवल पाठ्यक्रम से नहीं होती, बल्कि सामाजिक सोच से भी होती है। अनेक बार समाज उन्हें दया की दृष्टि से देखता है, उनकी क्षमताओं पर संदेह करता है और उन्हें सामान्य जीवन से अलग मान लेता है। विद्यालयों और महाविद्यालयों तक पहुँचने, अध्ययन सामग्री प्राप्त करने, परीक्षा देने, रोजगार के अवसर पाने और सामाजिक स्वीकार्यता हासिल करने तक उन्हें अतिरिक्त संघर्ष करना पड़ता है। कई परिवार आर्थिक कठिनाइयों के कारण भी इन बच्चों की शिक्षा जारी नहीं रख पाते। लेकिन जब शिक्षा संस्थान उन्हें समान अवसर, सम्मान और आत्मविश्वास का वातावरण देते हैं, तब यही विद्यार्थी समाज के लिए प्रेरणा बन जाते हैं।
डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहाँ दिव्यांग और सामान्य विद्यार्थी एक ही कक्षा में अध्ययन करते हैं। यह केवल एक शैक्षणिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण है। कक्षा में जब किसी दृष्टिबाधित विद्यार्थी को नोट्स की आवश्यकता होती है, तो सामान्य विद्यार्थी उसकी सहायता करते हैं। जब किसी श्रवण बाधित छात्र को विषय समझने में कठिनाई होती है, तो उसके सहपाठी उसके साथ मिलकर पढ़ाई करते हैं। प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों और अन्य गतिविधियों में भी सामान्य विद्यार्थी अपने दिव्यांग साथियों का सहयोग करते हैं। यह सहयोग किसी दया का नहीं, बल्कि समानता और भाईचारे का प्रतीक है। यही वातावरण विद्यार्थियों के भीतर संवेदनशीलता, मानवीयता और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करता है।
इन उपलब्धियों के पीछे केवल विद्यार्थियों का संघर्ष ही नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासन की दूरदर्शी सोच और नेतृत्व भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कुलपति आचार्य संजय सिंह के नेतृत्व में विश्वविद्यालय ने पिछले दो वर्षों में समावेशी शिक्षा को नई दिशा दी है। उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी को उसकी क्षमता के अनुरूप आगे बढ़ने का अवसर देना है। उनके नेतृत्व में विश्वविद्यालय में समर्थ पोर्टल के माध्यम से ई-गवर्नेंस को मजबूत किया गया, जिससे शैक्षणिक और प्रशासनिक प्रक्रियाएँ अधिक पारदर्शी और सरल हुईं।
दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग भी इस विश्वविद्यालय की विशेष उपलब्धि है। दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के लिए स्क्राइब-फ्री (सह-लेखक विहीन) लैपटॉप आधारित परीक्षा प्रणाली लागू की गई, जिससे वे किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर हुए बिना स्वयं परीक्षा दे सकें। इसके साथ ही एआई आधारित "स्मार्ट विजन चश्मे" उपलब्ध कराए गए, जो दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के लिए शिक्षा को अधिक सुलभ बनाते हैं। यह केवल तकनीक का प्रयोग नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है।
विश्वविद्यालय की उपलब्धियाँ केवल शिक्षा तक सीमित नहीं हैं। इस वर्ष 175 विद्यार्थियों को 257 रोजगार प्रस्ताव प्राप्त हुए, जिनमें 16 दिव्यांग विद्यार्थी भी शामिल हैं। यह दर्शाता है कि विश्वविद्यालय दिव्यांग विद्यार्थियों को केवल शिक्षित ही नहीं कर रहा, बल्कि उन्हें रोजगार योग्य बनाकर आत्मनिर्भर जीवन की ओर भी अग्रसर कर रहा है। इसके अतिरिक्त सैनिकों के पुनर्वास के लिए मिलिट्री हॉस्पिटल मेरठ के साथ समझौता, उत्तर प्रदेश के पहले ब्रेल पुस्तकालय की स्थापना और असिस्टिव टेक्नोलॉजी पर निरंतर शोध जैसी पहलें विश्वविद्यालय की सामाजिक प्रतिबद्धता को और मजबूत करती हैं।
13वें दीक्षांत समारोह में कुल 1,919 विद्यार्थियों को उपाधियाँ प्रदान की जाएँगी, जिनमें 955 छात्राएँ और 964 छात्र शामिल हैं। साथ ही 17 शोधार्थियों को पीएचडी की उपाधि दी जाएगी। 130 मेधावी विद्यार्थियों को कुल 156 पदकों से सम्मानित किया जाएगा, जिनमें 76 स्वर्ण, 40 रजत और 40 कांस्य पदक शामिल हैं। यह आँकड़े विश्वविद्यालय की शैक्षणिक उत्कृष्टता का परिचय देते हैं, लेकिन इन सबमें सबसे अधिक प्रेरणादायक उपलब्धि दिव्यांग विद्यार्थियों की ही है, जिन्होंने संघर्ष को अपनी शक्ति बना लिया।
आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज दिव्यांगता को किसी कमी के रूप में नहीं, बल्कि विविधता के रूप में स्वीकार करे। हमें ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा जहाँ दिव्यांग बच्चों को सहानुभूति नहीं, बल्कि समान अवसर मिलें। विद्यालयों, महाविद्यालयों, सरकारी संस्थानों और निजी संगठनों को ऐसी व्यवस्थाएँ विकसित करनी होंगी, जिनसे प्रत्येक दिव्यांग विद्यार्थी अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ सके। जब समाज उनका हाथ पकड़ने के बजाय उनके साथ चलना सीख जाएगा, तभी वास्तविक समावेशी भारत का निर्माण होगा।
डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय ने यह साबित कर दिया है कि शिक्षा केवल ज्ञान अर्जित करने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी साधन भी है। यहाँ सामान्य और दिव्यांग विद्यार्थियों के बीच सहयोग, सम्मान और संवेदनशीलता का जो वातावरण विकसित हुआ है, वह पूरे देश के शिक्षा संस्थानों के लिए अनुकरणीय उदाहरण है। कुलपति आचार्य संजय सिंह के नेतृत्व में विश्वविद्यालय जिस समर्पण और संकल्प के साथ दिव्यांग विद्यार्थियों के भविष्य को उज्ज्वल बनाने की दिशा में कार्य कर रहा है, वह निश्चित रूप से समाज को नई सोच प्रदान करता है।
यह 45 पदक केवल धातु के टुकड़े नहीं हैं; यह उन असंख्य संघर्षों, अनगिनत आँसुओं, अथक परिश्रम, अडिग विश्वास और कभी हार न मानने वाले साहस के प्रतीक हैं। ये पदक बताते हैं कि यदि समाज अवसर दे, शिक्षक मार्गदर्शन दें और नेतृत्व संवेदनशील हो, तो दिव्यांगता किसी भी व्यक्ति की पहचान नहीं, बल्कि उसकी सफलता की प्रेरक कहानी बन सकती है।
"मंज़िल उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है,
पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।"
पियूष कुमार कश्यप