संपादकीय: युवाओं का डिगा विश्वास ? शिक्षा व्यवस्था पर सवाल
क्या छात्र आंदोलन अब पूरे देश को आंदोलित कर रहा है?
- क्या छात्रों का आंदोलन विपक्ष का प्रमुख हथियार बन गया है?
भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर पिछले कुछ सालों से गहरा संकट मंडरा रहा है। नीट सहित, अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताएं और छात्रों के भविष्य को लेकर फैली बेचैनी ने दिल्ली के जंतर-मंतर को आंदोलन का केंद्र बना दिया है। जो अब पूरे देश को अपने आगोश में लेता जा रहा है। सीजेपी के नेतृत्व में शुरु हुआ प्रदर्शन अब छात्रों, युवाओं और विपक्षी दलों का प्रमुख हथियार हो चुका है। हजारों युवा संसद की ओर मार्च कर रहे हैं, लाठीचार्ज और आंसू गैस के बावजूद मांग एक ही है।
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। लेकिन अब यह आंदोलन सचमुच “पूरे देश” को आंदोलित कर रहा है? या यह दिल्ली-केंद्रित, विपक्ष-समर्थित आक्रोश है जो बड़े पैमाने पर फैलने की क्षमता रखता है? तथ्य स्पष्ट हैं। मई में नीट—यूजी परीक्षा में पेपर लीक के आरोपों के बाद परीक्षा दोबारा आयोजित करनी पड़ी। ग्रेस मार्किंग विवाद, एनटीए की कार्यप्रणाली पर सवाल और कई राज्यों में अन्य परीक्षाओं की धांधली ने युवाओं का विश्वास डिगा दिया है।
सीजेपी ने प्रधान जी के इस्तीफे को “नॉन-नेगोशिएबल” बताया है और मृतक बच्चों के परिपारों को ₹1 करोड़ मुआवजे की मांग भी की है। विपक्षी सांसदों ने मकर द्वार पर प्रदर्शन किया, सोनम वांगचुक जैसे कार्यकर्ताओं ने भूख हड़ताल शुरू की। दिल्ली पुलिस की कार्रवाई और सोशल मीडिया फैली जानकारियों को लेकर विवाद ने आग में घी डाला। फिर भी, “पूरे देश आंदोलित” वाली तस्वीर अतिरंजित लगने लगी है। प्रदर्शन मुख्य रूप से दिल्ली में केंद्रित था, जो अब हर जगह दिखाई देने लगा है। कुछ विश्वविद्यालयों ने छात्रों को जंतर-मंतर से दूर रहने की सलाह दी है।
देश के अन्य हिस्सों में सहानुभूति जरूर है, लेकिन बड़े पैमाने पर सड़क पर उतरने की खबरें आ रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे शहरों और दक्षिण भारत में मुद्दा चर्चा में है, पर उतना तीव्र आंदोलन नहीं दिख रहा जितना विपक्ष दावा कर रहा है। सोशल मीडिया इसकी तीव्रता बढ़ा रहा है। सरकार का रुख दृढ़ है। सूत्रों के अनुसार प्रधान का इस्तीफा “आसान फैसला” माना जा रहा है, जो समस्या से भागना होगा। मंत्रालय एनईपी 2020 के क्रियान्वयन, कौशल विकास और डिजिटल सुधारों पर जोर दे रहा है। प्रधान ने कांग्रेस पर छात्रों का राजनीतिक शोषण करने का आरोप लगाया है।
सरकार का तर्क है कि एक व्यक्ति को हटाने से परीक्षा माफिया, राज्य स्तर की मिलीभगत और सिस्टमिक कमियां नहीं जाएंगी। यह तर्क आंशिक रूप से सही है, लेकिन जवाबदेही से बचने का भी लगता है। जब लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर हो, तो सिर्फ “सुधार कर रहे हैं” कहना काफी नहीं। एनटीए को पूरी तरह पुनर्गठित करने, परीक्षा प्रक्रिया में ब्लॉकचेन और एआई का इस्तेमाल करने, दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई और स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग जायज है। आंदोलनकारी अगर सिर्फ इस्तीफे पर अटके रहेंगे तो व्यापक सुधार की संभावना कम हो जाएगी। यह आंदोलन युवा भारत की पीड़ा को दर्शाता है। आज का युवा प्रतियोगी परीक्षाओं के चक्रव्यूह में फंसा है। एक पेपर लीक न केवल उसके एक साल को बर्बाद करता है, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक और मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है। 20 से अधिक मामलों में आत्महत्याओं की खबरें आई हैं। ऐसे में सरकार को संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।
विपक्ष को भी इसे केवल राजनीतिक हथियार नहीं बनाना चाहिए। “पूरे देश आंदोलित” फिलहाल अतिशयोक्ति माना जा सकता है, लेकिन अगर सरकार ने बातचीत और ठोस कदमों से विश्वास नहीं बहाल किया तो यह देशव्यापी रूप ले सकता है। सीजेपी ने 7 दिन का अल्टीमेटम दिया है और बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है। लोकतंत्र में प्रदर्शन का अधिकार पवित्र है, लेकिन हिंसा और अराजकता स्वीकार्य नहीं।
समाधान का रास्ता मध्यमार्ग है। प्रधान का इस्तीफा या बर्खास्तगी ही जरूरी है, साथ ही सिस्टमिक बदलाव के साथ जवाबदेही भी तय हो। शिक्षा मंत्रालय युवाओं का भरोसा जीते बिना आगे नहीं बढ़ सकता। युवा वर्ग की नाराजगी नजरअंदाज करने लायक नहीं है। मोदी सरकार को अब सिर्फ बचाव नहीं, परिणाम दिखाने होंगे। छात्रों का भविष्य राष्ट्र का भविष्य है। इस पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
