संपादकीय: फिर बढ़ा टैरिफ! 'अमेरिका फर्स्ट' का नया दांव
बंधुआ मजदूरी के नाम पर 17 देशों पर 10% टैरिफ का प्रहार
- भारत के लिए 'राहत' और 'चिंता' का मिश्रित संकेत
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापारिक नीतियों ने एक बार फिर वैश्विक बाजार में हलचल मचा दी है। 'अमेरिका फर्स्ट' की अपनी चिर-परिचित आक्रामक नीति के तहत, अमेरिकी प्रशासन ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में 'बंधुआ मजदूरी' का तर्क देते हुए भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित 17 देशों से आयात होने वाले उत्पादों पर 10% का नया टैरिफ (आयात शुल्क) लगा दिया है।
यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब दुनिया पहले ही आर्थिक चुनौतियों और भू-राजनीतिक तनावों से जूझ रही है। यह भारत के लिए 'राहत' और 'चिंता' का मिश्रित संकेत है। व्यापारिक दृष्टिकोण से देखें तो भारत के लिए यह खबर एक 'राहत भरी निराशा' जैसी है। दरअसल, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने 1974 के ट्रेड एक्ट की 'धारा 301' के तहत शुरुआत में भारत पर 12.5% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन भारत सरकार की त्वरित कूटनीति और अपनी विदेश व्यापार नीति में बंधुआ मजदूरी से बने उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगाने जैसे हालिया सुधारों के चलते, अमेरिका ने भारत को 10% वाले निचले स्लैब में रखा।
यद्यपि प्रतिशत में 2.5% की यह कमी एक कूटनीतिक सफलता लग सकती है, लेकिन 10% का यह अतिरिक्त बोझ भारतीय निर्यातकों की कमर तोड़ने के लिए काफी है, विशेषकर तब जब द्विपक्षीय व्यापार 140 अरब डॉलर के आसपास है और अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है। इस फैसले का एक और दिलचस्प और चिंताजनक पहलू यह है कि अमेरिका ने भारत को पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों की कतार में खड़ा कर दिया है। बांग्लादेश, जो पहले से ही अपने कपड़ा उद्योग (टेक्सटाइल) के निर्यात पर भारी रूप से निर्भर है, उसके लिए यह टैरिफ एक बड़ा झटका साबित होगा।
पाकिस्तान की डगमगाती अर्थव्यवस्था के लिए भी यह एक कड़वी गोली है, जिसे निगलना आसान नहीं होगा। जब ये सभी देश 10% टैरिफ के समान दायरे में आ गए हैं, तो अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों को मिलने वाला कोई भी विशेष 'प्रतिस्पर्धी लाभ' फिलहाल धुंधला पड़ता दिख रहा है। वहीं, चीन, वियतनाम और कुछ अन्य देशों पर 12.5% का पूरा शुल्क लगाया गया है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि ट्रंप प्रशासन किस कदर कड़े संरक्षणवाद की ओर लौट चुका है। इसे मानवाधिकार की आड़ में व्यापारिक स्वार्थ के रुप में देखा जा सकता है।
अमेरिका ने इस कठोर कार्रवाई के पीछे 'मानवाधिकारों' की रक्षा का तर्क दिया है। लेकिन क्या वास्तव में यह केवल मानवाधिकार की चिंता है या महज अपने घरेलू उद्योगों को बचाने का एक नया मुखौटा? हाल ही में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप द्वारा 'आपातकालीन शक्तियों' का उपयोग करके लगाए गए मनमाने वैश्विक टैरिफ को गैर-कानूनी बताकर खारिज कर दिया था। इसके तुरंत बाद प्रशासन ने 'धारा 301' का सहारा लिया है, जो कानूनी और न्यायिक समीक्षा के लिहाज से अधिक सुरक्षित मानी जाती है।
यह साबित करता है कि मूल लक्ष्य अमेरिकी अर्थव्यवस्था को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाना है, और बंधुआ मजदूरी का तर्क केवल एक सुविधाजनक कूटनीतिक ढाल है। आगे की राह में यह नई व्यापारिक परिस्थिति भारत के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है। भारत और अमेरिका के बीच सामरिक संबंध अत्यंत मजबूत हैं, परंतु आर्थिक हितों को महज टैरिफ के झटकों पर नहीं छोड़ा जा सकता।
भारत सरकार को अब केवल बचाव की मुद्रा में रहने के बजाय, अमेरिका के साथ एक ठोस और व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में आक्रामक रूप से काम करना होगा। 12.5% के खतरे को 10% में बदलना कूटनीतिक मोर्चे पर एक अच्छी शुरुआत जरूर है, लेकिन दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लिए इन व्यापारिक बाधाओं को जड़ से उखाड़ना आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भावनाएं नहीं, बल्कि रणनीतियां काम आती हैं; और भारत को अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए अब उसी दृढ़ता से कदम उठाने होंगे।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
