संपादकीय: युवा-विरोधी प्रधानमंत्री? सवाल युवाओं के भविष्य का
पेपर लीक की गूंज संसद और सत्ता के गलियारों तक
- शिक्षा व्यवस्था की गहरी बीमारी का परिचायक
पूरे देश में हाल ही में राजधानी की सड़कों पर जो राजनीतिक और छात्र आंदोलन का उबाल देखने को मिला, वह देश की शिक्षा व्यवस्था की एक गहरी बीमारी का परिचायक है। नीट यूजी पेपर लीक मामले ने एक ऐसा जन-आक्रोश पैदा कर दिया है, जिसकी गूंज अब सीधे संसद और प्रधानमंत्री आवास तक पहुँच गई है।
इस पूरे घटनाक्रम में 'कॉकरोच जनता पार्टी' के नाम से हुआ छात्रों का मार्च, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आश्वासन और उस पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का तीखा पलटवार, हमारे लोकतांत्रिक विमर्श के नए और ज्वलंत बिंदु बन गए हैं। पिछले एक दशक में 152 से अधिक पेपर लीक और करीब 7.5 करोड़ छात्रों के प्रभावित होने के आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि हमारी परीक्षा प्रणाली अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है।
इसी व्यवस्थागत कुंठा का परिणाम था कि युवाओं ने एक प्रतीकात्मक और व्यंग्यात्मक नाम 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के तले संसद तक मार्च निकाला। उनकी मांग स्पष्ट थी कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और परीक्षा प्रणाली में आमूल-चूल बदलाव लाया जाये। लेकिन छात्रों के इस लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शन को जिस तरह से लाठीचार्ज और पुलिसिया बल प्रयोग से कुचलने का प्रयास किया गया, उसने इस पूरे मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया है। बढ़ते राजनीतिक और सामाजिक दबाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्थिति को संभालने का प्रयास किया।
उन्होंने आश्वासन दिया कि पेपर लीक मामलों में त्वरित और कड़ी सजा सुनिश्चित करने के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों का गठन किया जाएगा, जो सांसदों और विधायकों के लिए बनी अदालतों की तर्ज पर काम करेंगी। प्रधानमंत्री ने कड़े शब्दों में स्पष्ट किया कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। सरकार की ओर से यह एक सकारात्मक कदम प्रतीत होता है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ अदालतें बना देने से उस भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी, जिसकी जड़ें शिक्षा माफियाओं और तंत्र की मिलीभगत से जुड़ी हैं? प्रधानमंत्री के इस आश्वासन को विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी ने नाकाफी और महज एक छलावा करार दिया है।
राहुल गांधी ने तीखा प्रहार करते हुए पीएम मोदी को "भारत के इतिहास का सबसे युवा-विरोधी प्रधानमंत्री" करार दिया। अपनी हिरासत और लाठीचार्ज के बाद राहुल ने स्पष्ट किया कि वे "ऐसी चोटें खाने के आदी हैं" लेकिन देश के छात्रों की आवाज दबने नहीं देंगे। उन्होंने सीजेपी की मांगों का सीधा समर्थन करते हुए सरकार के सामने तीन टूक शर्तें रखीं: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को तुरंत बर्खास्त किया जाए, प्रधानमंत्री छात्रों पर हुए अत्याचार के लिए सार्वजनिक माफी मांगें, और शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर बर्बर लाठीचार्ज करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ सत्ता और विपक्ष के बीच की राजनीतिक रस्साकशी नहीं है; यह करोड़ों युवाओं के सपनों, उनके अथक संघर्ष और उनके भविष्य का सीधा सवाल है।
सीजेपी के बैनर तले उतरा युवा वर्ग यह बता रहा है कि अब वह खोखले आश्वासनों से संतुष्ट होने वाला नहीं है। प्रधानमंत्री द्वारा फास्ट-ट्रैक अदालतों का प्रस्ताव निस्संदेह एक उपचारात्मक कदम हो सकता है, लेकिन यह बीमारी का मूल इलाज नहीं है। दूसरी ओर, विपक्ष की आक्रामकता भी तभी सार्थक होगी जब वह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी के बजाय, सड़क से लेकर संसद तक सरकार को ठोस नीतिगत सुधारों के लिए विवश करे। समय की मांग है कि शिक्षा व्यवस्था को माफियाओं के चंगुल से मुक्त किया जाए।
जब तक जवाबदेही तय नहीं होती और शिक्षा मंत्री से लेकर शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों तक की जिम्मेदारी सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक न तो युवाओं का आक्रोश शांत होगा और न ही भारतीय शिक्षा प्रणाली का खोया हुआ सम्मान वापस लौटेगा। सियासत के इस शोरगुल में व्यवस्था की एकमात्र प्राथमिकता सिर्फ और सिर्फ छात्र हित होना चाहिए।
लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
