जंतर-मंतर : पेपर लीक से पथराव तक... छात्र आंदोलन की दिशा कैसे बदली?
एक महीने की शांति के बाद लगातार तीसरे दिन हिंसा...
- शांतिपूर्ण आंदोलन में हिंसा कैसे भड़की?
एक महीने की शांति के बाद लगातार तीसरे दिन हिंसा... सरकार ने समाधान का रास्ता खोला, आंदोलनकारी बोले—'बाहरी तत्वों ने बिगाड़ा माहौल', अब देश पूछ रहा है—सच क्या है? मतलब साफ है एक महीने तक शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा छात्र आंदोलन अचानक हिंसा, पथराव और टकराव की आग में कैसे झुलस गया? यह सवाल अब केवल दिल्ली का नहीं, बल्कि पूरे देश का है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस समय केंद्र सरकार पेपर लीक पर फास्ट ट्रैक कोर्ट, दोषियों को कठोर सजा और संसद में विस्तृत चर्चा का प्रस्ताव देकर समाधान का रास्ता खोल रही थी, उसी समय जंतर-मंतर और उसके आसपास लगातार तीसरे दिन हिंसा की खबरें सामने आने लगीं। इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि आंदोलन से जुड़े प्रमुख चेहरों ने स्वयं आरोप लगाया है कि शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम करने के लिए बाहरी तत्वों की घुसपैठ कराई गई। दूसरी ओर पुलिस अपने अधिकारियों पर हमले और पथराव का दावा कर रही है। ऐसे में सवाल केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आंदोलनों की विश्वसनीयता का भी है। क्या करोड़ों युवाओं के भविष्य की लड़ाई किसी और एजेंडे की भेंट चढ़ रही है? क्या आंदोलन की कमान अब छात्रों के हाथ में नहीं रही? या फिर यह राजनीतिक वर्चस्व की ऐसी लड़ाई बन चुकी है, जिसमें सबसे बड़ा नुकसान उसी युवा का हो रहा है जिसके भविष्य के नाम पर यह संघर्ष शुरू हुआ था? इन सवालों के जवाब अब पूरे देश को चाहिए।
ये खबर भी पढ़े : समरदोंग सुरंग हादसा: 27 लोगों के फंसे होने की आशंका, एनडीआरएफ का रेस्क्यू ऑपरेशन जारीयदि नहीं, तो फिर समाधान की पहल के बावजूद हिंसा क्यों नहीं थम रही? और यदि हां, तो आखिर इसका सबसे बड़ा लाभ किसे मिल रहा है? यही वे सवाल हैं जिनके जवाब अब केवल जांच एजेंसियों को ही नहीं, बल्कि देश की राजनीति को भी देने होंगे. देश आंदोलन से नहीं डरता, देश अराजकता से डरता है। देश सवालों से नहीं भागता, लेकिन सच छिपाए जाने से अवश्य बेचैन होता है। इसलिए अब समय आ गया है कि शोर नहीं, सच सामने आए। क्योंकि लोकतंत्र में अंततः सबसे बड़ी जीत किसी दल की नहीं, सत्य की होनी चाहिए
दिल्ली का जंतर-मंतर दशकों से लोकतांत्रिक विरोध का प्रतीक रहा है। यह वह मंच है जहां असहमति ने संविधान की मर्यादाओं के भीतर अपनी आवाज बुलंद की है। किसानों से लेकर कर्मचारियों तक, छात्रों से लेकर सामाजिक संगठनों तक—हर वर्ग ने यहां अपनी बात रखी है।
लेकिन पिछले कुछ दिनों में जो घटनाक्रम सामने आया है, उसने केवल एक आंदोलन को नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विरोध की पूरी संस्कृति को कठघरे में खड़ा कर दिया है। पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और युवाओं के भविष्य को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन लगभग एक महीने तक शांतिपूर्ण ढंग से चलता रहा। देश के लाखों युवाओं ने इसे अपना संघर्ष माना।
सोशल मीडिया से लेकर विश्वविद्यालय परिसरों तक इसकी गूंज सुनाई दी। यह आंदोलन सरकार से जवाब मांग रहा था, व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहा था और युवाओं के भविष्य की सुरक्षा चाहता था। लेकिन अचानक तस्वीर बदल गई। जंतर-मंतर से निकलकर टॉलस्टॉय मार्ग और राजधानी के अन्य हिस्सों तक तनाव फैलने लगा। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की खबरें आने लगीं। पथराव हुआ, पुलिस अधिकारियों के घायल होने की सूचना आई, डंडों से हमले के आरोप लगे और देर रात तक तनाव का माहौल बना रहा। देखते ही देखते चर्चा का केंद्र पेपर लीक नहीं, बल्कि हिंसा बन गई। यहीं से देश के सामने सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है—एक महीने तक शांतिपूर्ण रहा आंदोलन अचानक हिंसक कैसे हो गया?
यह प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं है। यह लोकतंत्र, कानून-व्यवस्था और जन आंदोलनों की विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न है। इसी बीच केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए पेपर लीक के मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट गठित करने की घोषणा की। संसद में इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा की पेशकश भी की गई। सरकार ने विपक्ष से यहां तक कहा कि चर्चा का समय और अवधि भी वही तय कर ले। यानी संवाद का रास्ता खुला रखा गया। ऐसी स्थिति में एक और प्रश्न सामने आता है—जब बातचीत और समाधान की दिशा खुल रही थी, तब भी टकराव क्यों जारी रहा? इसका उत्तर अभी किसी के पास नहीं है, लेकिन सवाल पूरी तरह जायज है। इसी बीच आंदोलन से जुड़े कुछ प्रमुख लोगों ने गंभीर आरोप लगाए।
उनका कहना है कि आंदोलन को बदनाम करने के लिए बाहरी तत्व भेजे गए। उनका दावा है कि जो लोग पथराव और हिंसा कर रहे थे, वे मूल आंदोलनकारी नहीं थे। ये आरोप बेहद गंभीर हैं। यदि इनमें सच्चाई है तो यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आंदोलनों की पवित्रता पर हमला है। यदि ऐसा नहीं है, तो जांच में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि वास्तविकता क्या थी। दूसरी ओर दिल्ली पुलिस का कहना है कि उसके कई अधिकारी घायल हुए, पथराव हुआ और सरकारी ड्यूटी में बाधा पहुंचाई गई। पुलिस का दावा है कि हमलावरों की पहचान की जा रही है। यानी एक ओर आंदोलनकारी बाहरी तत्वों की बात कर रहे हैं, दूसरी ओर पुलिस हिंसक हमले का आरोप लगा रही है।
इन दोनों दावों के बीच कहीं न कहीं वह सच मौजूद है, जिसे देश जानना चाहता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि कुछ वीडियो और रिपोर्टों में ऐसे लोगों की मौजूदगी की चर्चा भी सामने आई है जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि बताई जा रही है। यदि ऐसे लोग वास्तव में आंदोलन में मौजूद थे, तो यह जांच का गंभीर विषय है कि वे वहां किस उद्देश्य से आए थे। लेकिन केवल किसी की मौजूदगी से उसकी हिंसा में भूमिका स्वतः सिद्ध नहीं हो जाती। इसलिए जांच का निष्पक्ष और पारदर्शी होना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। इतिहास गवाह है कि दुनिया के अनेक जन आंदोलनों में समय-समय पर ऐसे तत्व घुसने की आशंका जताई जाती रही है जो मूल उद्देश्य को पीछे धकेलकर टकराव को आगे बढ़ा देते हैं।
इसलिए लोकतंत्र में हर बड़े आंदोलन के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल अपनी मांगों को लेकर नहीं होती, बल्कि अपनी विश्वसनीयता और अनुशासन को बनाए रखने की भी होती है। आज देश का युवा केवल पेपर लीक का समाधान नहीं चाहता, बल्कि यह भी जानना चाहता है कि उसकी आवाज के साथ आखिर हुआ क्या? यदि आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश हुई, तो किसने की? यदि हिंसा स्वतःस्फूर्त थी, तो क्यों हुई? यदि बाहरी तत्व सक्रिय थे, तो वे कौन थे? यदि राजनीतिक हित बीच में आ गए, तो उसका खामियाजा छात्रों को क्यों भुगतना पड़ा?
इन सवालों के जवाब केवल जांच एजेंसियों के लिए नहीं, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता के लिए भी आवश्यक हैं। क्योंकि जब किसी छात्र आंदोलन की पहचान उसके मूल मुद्दे से हटकर हिंसा से होने लगे, तब सबसे बड़ी हार किसी सरकार या विपक्ष की नहीं, बल्कि उस छात्र की होती है जिसने अपने भविष्य के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष शुरू किया था। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष केवल हिंसा नहीं है, बल्कि वह राजनीति है जो हिंसा की छाया में तेजी से आकार लेती दिखाई दे रही है। पेपर लीक का मुद्दा करोड़ों युवाओं के भविष्य से जुड़ा हुआ है। यह ऐसा विषय है जिस पर स्वाभाविक रूप से सत्ता और विपक्ष दोनों को एक मंच पर दिखाई देना चाहिए था।
सरकार को जवाब देना था, विपक्ष को सवाल पूछने थे और संसद को समाधान का रास्ता निकालना था। लेकिन घटनाक्रम ने जिस दिशा में मोड़ लिया, उसने कई नए प्रश्न खड़े कर दिए। एक ओर सरकार ने पेपर लीक पर फास्ट ट्रैक कोर्ट, कठोर कार्रवाई और संसद में चर्चा की बात कही। दूसरी ओर विपक्ष ने यह कहते हुए आंदोलन जारी रखने का निर्णय लिया कि केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं और जवाबदेही तय होनी चाहिए। लोकतंत्र में यह अधिकार विपक्ष को प्राप्त है। लेकिन इसी के साथ यह जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है कि आंदोलन अपनी मूल भावना से भटके नहीं।
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या छात्र आंदोलन का केंद्र छात्र रहे या राजनीति? जब किसी जन आंदोलन में अलग-अलग राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीति के साथ उतरते हैं, तब यह
लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
