चातुर्मास सनातन परंपरा का महत्वपूर्ण अध्याय: आत्मपरिष्कार का अनुष्ठान -महेन्द्र तिवारी
चातुर्मास आत्मपरिष्कार और आध्यात्मिक जागरण का महापर्व
- सनातन परंपरा का वैज्ञानिक आधार वाला कालखंड
भारतीय धर्म और संस्कृति में समय को केवल घड़ी की सुइयों या कैलेंडर के पन्नों से नहीं मापा जाता, बल्कि इसे चेतना के निरंतर विकास और प्रकृति के चक्र के साथ जोड़कर देखा जाता है। चातुर्मास इसी सनातन परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक आधार वाला कालखंड है। आषाढ़ शुक्ल एकादशी अर्थात देवशयनी एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी अर्थात देवउठनी एकादशी तक के ये चार महीने केवल व्रत और उपवास के दिन नहीं हैं, बल्कि यह मनुष्य की आंतरिक यात्रा, आत्मपरिष्कार और आध्यात्मिक जागरण का एक वृहद पर्व है।
धार्मिक मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर चार मास के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। भगवान के योगनिद्रा में जाने का यह प्रतीकात्मक अर्थ यह है कि अब सृष्टि के पालन का कार्य कुछ समय के लिए विश्राम की अवस्था में है और यह समय बाहरी दौड़भाग को रोककर अपनी भीतर की दुनिया को संवारने का है। जिस तरह भगवान विष्णु अंतर्मुखी होकर योगनिद्रा का आश्रय लेते हैं, उसी तरह साधारण मनुष्य से लेकर साधु संतों तक को इस अवधि में अपनी इंद्रियों को समेटकर अंतर्मुखी होने का निर्देश दिया गया है। यह काल हमें बताता है कि जीवन में कर्म और गति जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक शांति और स्थिरता भी है।
चातुर्मास का आरंभ वर्षा ऋतु के साथ होता है। प्रकृति भी इस समय अपने पुराने आवरण को उतारकर नवसृजन की प्रक्रिया में मग्न होती है। ग्रीष्म ऋतु की चिलचिलाती धूप और ताप से झुलसी हुई धरती पर जब आषाढ़ और श्रावण की फुहारें पड़ती हैं, तो चारो ओर हरियाली और जीवन का नया संचार होने लगता है। प्राचीन काल में यातायात के साधन अत्यंत सीमित थे और वर्षा के कारण कच्ची पगडंडियां दुर्गम हो जाती थीं। इसलिए परिव्राजक, संन्यासी और भिक्षु जो वर्ष भर निरंतर भ्रमण करते रहते थे, वे इन चार महीनों में अपनी यात्राएं रोककर किसी एक स्थान पर ठहर जाते थे। इसी ठहराव को चातुर्मास कहा गया। एक स्थान पर रुकने का यह नियम केवल शारीरिक विश्राम के लिए नहीं था, बल्कि इसके पीछे अहिंसा का एक बहुत बड़ा दर्शन छिपा हुआ था। वर्षा ऋतु में भूमि पर अनेक प्रकार के सूक्ष्म जीव जंतु और कीड़े मकोड़े उत्पन्न हो जाते हैं। यात्रा करने से अनजाने में ही इन जीवों की हत्या होने का पाप लग सकता है। इसलिए संतों ने एक स्थान पर रुक कर मौन और तपस्या का मार्ग चुना। इस ठहराव का एक उद्देश्य यह भी था कि साधु संत समाज के बीच रहकर ज्ञान का प्रकाश फैलाएं और स्वयं की साधना को और अधिक गहरा करें।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण के साथ साथ चातुर्मास का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी गहरा महत्व है। आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु में मनुष्य की पाचन शक्ति बहुत कमजोर हो जाती है और जल तथा वायु में अनेक प्रकार के सूक्ष्म जीवाणुओं का संक्रमण बढ़ जाता है। ऐसे में आहार और विहार पर कठोर नियंत्रण रखना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। चातुर्मास के दौरान सात्विक भोजन ग्रहण करने, एक समय उपवास करने और कुछ विशेष पदार्थों के त्याग का नियम बनाया गया है। यह केवल एक अंधविश्वास नहीं है बल्कि शरीर को निरोगी रखने की एक विशुद्ध वैज्ञानिक प्रक्रिया है। जब हम अपने स्वाद और भोजन की आदतों पर नियंत्रण स्थापित करते हैं, तो हमारा मन भी धीरे धीरे हमारे वश में आने लगता है। उपवास और व्रत का वास्तविक अर्थ केवल भूखा रहना नहीं है, बल्कि अपनी वृत्तियों को उप अर्थात समीप और वास अर्थात निवास कराना है। इसका सीधा अर्थ अपनी आत्मा के समीप निवास करना है। जब शरीर हल्का रहता है तो मन में तामसिक और राजसिक विचार कम उत्पन्न होते हैं। यही कारण है कि चातुर्मास में स्वाध्याय, सत्संग और नाम जप का विशेष विधान है ताकि मन को सकारात्मक ऊर्जा मिलती रहे और वह भौतिक विकारों से मुक्त हो सके।
सामान्यतः लोग चातुर्मास को केवल कुछ धार्मिक कर्मकांडों, पूजा पाठ और मंदिरों में होने वाले आयोजनों तक सीमित मान लेते हैं, किंतु इसकी परिधि इससे कहीं अधिक व्यापक है। सच्ची साधना केवल बंद कमरे या मंदिर के एकांत में नहीं होती, बल्कि वह मनुष्य के दैनिक आचरण और व्यवहार में झलकनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति महीनों तक व्रत करता है किंतु उसके व्यवहार में क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और कटुता बनी रहती है, तो उसकी सारी तपस्या निरर्थक हो जाती है।
चातुर्मास मनुष्य को यही सिखाता है कि उसे अपने भीतर के विकारों को पहचान कर उन्हें दूर करने का निरंतर प्रयास करना चाहिए। वाणी में मधुरता लाना, विचारों में पवित्रता रखना, दूसरों के प्रति करुणा और दया का भाव रखना तथा असहायों की निस्वार्थ सहायता करना ही इस काल की सबसे बड़ी पूजा है। इन चार महीनों में व्यक्ति को यह दृढ़ संकल्प लेना चाहिए कि वह किसी भी जीव को अपने मन, वचन या कर्म से तनिक भी कष्ट नहीं पहुंचाएगा। यही सच्चा आत्मपरिष्कार है जहाँ मनुष्य अपनी कमजोरियों पर विजय प्राप्त कर एक बेहतर और संवेदनशील इंसान बनने की ओर कदम बढ़ाता है।
आज के आधुनिक और तेजी से भागते हुए जीवन में चातुर्मास की प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ गई है। आज मनुष्य ने विज्ञान और तकनीक के बल पर अपार भौतिक सुख सुविधाएं तो जुटा ली हैं, लेकिन उसकी मानसिक शांति कहीं बहुत पीछे छूट गई है। हर व्यक्ति एक अंधी दौड़ में शामिल है जहां उसे बस दूसरों से आगे निकलना है। इस निरंतर प्रतिस्पर्धा, तनाव और प्रदर्शन की होड़ ने मनुष्य को भीतर से खोखला और अशांत कर दिया है।
मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया की आभासी दुनिया ने उसे अपने ही परिवार और स्वयं अपनी आत्मा से भी दूर कर दिया है। ऐसे समय में चातुर्मास हमें एक अमूल्य अवसर प्रदान करता है कि हम इस डिजिटल कोलाहल और मानसिक शोरगुल से खुद को कुछ समय के लिए पूरी तरह काट लें। यह एक प्रकार का मानसिक और आध्यात्मिक कायाकल्प है। कुछ समय एकांत में बैठकर स्वयं से संवाद करना, अपनी सफलताओं और विफलताओं का निष्पक्ष मूल्यांकन करना और यह गहराई से सोचना कि हम किस दिशा में जा रहे हैं, आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है। चातुर्मास हमें बार बार याद दिलाता है कि स्थायी सुख और आनंद बाहर के शोर में नहीं, बल्कि भीतर के मौन में छिपा है।
चातुर्मास को यदि सही अर्थों में जिया जाए तो यह जीवन की दिशा और दृष्टि दोनों को पूरी तरह से बदलने की क्षमता रखता है। यह कोई थोपा गया कठोर अनुशासन नहीं है, बल्कि स्वेच्छा से स्वीकार किया गया एक आनंदमयी तप है जो मनुष्य को सोने की तरह तपाकर कुंदन बनाता है। इन चार महीनों की अवधि में अर्जित की गई सकारात्मक ऊर्जा, संयम और अनुशासन व्यक्ति को शेष आठ महीनों के कठिन जीवन संग्राम में सफलतापूर्वक टिके रहने की असीम शक्ति प्रदान करते हैं।
जिस तरह एक छोटा सा बीज अंधकारमय मिट्टी के भीतर रहकर स्वयं को गलाता है और फिर वर्षा जल पाकर एक नए पौधे के रूप में फूटकर बाहर आता है, ठीक उसी प्रकार चातुर्मास की यह साधना मनुष्य के अहंकार और अज्ञान को पूरी तरह गलाकर उसमें से प्रज्ञा, विवेक और करुणा के नए अंकुर प्रस्फुटित करती है।
इसलिए इसे केवल पंचांग का एक सामान्य हिस्सा या पुरानी परंपरा मानकर नहीं छोड़ देना चाहिए, बल्कि इसे आत्मनिर्माण के एक महान महोत्सव के रूप में मनाना चाहिए। यह कालखंड हम सभी का आह्वान करता है कि हम अपनी चेतना के सोए हुए देव को जगाएं और जीवन को उसकी पूर्णता, सार्थकता और दिव्यता के साथ जीने का सच्चा प्रयास करें।
संबंधित खबरें
लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
