संपादकीय: विपक्ष का बहिष्कार! लोकतंत्र या राजनीतिक रणनीति?
सर्वदलीय बैठक: विभिन्न दलों के प्रतिनिधि राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर सरकार के साथ विचार-विमर्श
सर्वदलीय बैठक भारतीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण परंपरा है। इसमें विभिन्न दलों के प्रतिनिधि राष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार के साथ विचार-विमर्श करते हैं, खासकर विदेश नीति, सुरक्षा या आर्थिक संकट जैसे विषयों पर। हाल ही में पश्चिम एशिया (वेस्ट एशिया) संकट पर आयोजित सर्वदलीय बैठक से विपक्ष के प्रमुख दलों का किनारा करना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। लेकिन इसके पीछे बड़ा कारण भी है जो विपक्ष को बैठक छोड़ने पर मजबूर करता है।
विपक्ष जानता है कि उनके कोई भी राय पर कोई सरकार कोई काम नही कर रही, तो दनके होने का मतलब ही क्या है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई इस बैठक का उद्देश्य इरान-इजराइल-अमेरिका तनाव के भारत पर पड़ने वाले प्रभावों—खासकर ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता—से अवगत कराना था।
सरकार ने विपक्ष को ब्रिफिंग देने का प्रयास किया, ताकि एकजुट राष्ट्रीय रुख अपनाया जा सके। लेकिन तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने बैठक का बहिष्कार कर दिया, जबकि कांग्रेस के राहुल गांधी सहित अन्य नेताओं की अनुपस्थिति भी चर्चा में रही। यह घटना महज एक अनुपस्थिति नहीं, बल्कि संसदीय परंपराओं के प्रति उपेक्षा का प्रतीक बन गई है।विपक्ष का तर्क हो सकता है कि बैठक औपचारिकता भर है, या सरकार विपक्ष की मांगों (जैसे सदन में विस्तृत चर्चा) को नजरअंदाज कर रही है।
लेकिन बहिष्कार किसी समस्या का समाधान नहीं होता। जब देश की विदेश नीति और नागरिकों के हित प्रभावित हो रहे हों, तो विपक्ष की भूमिका सशक्त आलोचना की होनी चाहिए, न कि अनुपस्थिति की। ऐतिहासिक रूप से, सर्वदलीय बैठकें कश्मीर मुद्दे, आतंकवाद या आर्थिक सुधारों पर राष्ट्रीय सहमति बनाने में सफल रहीं हैं। 1962 के युद्ध या 1991 के आर्थिक संकट के समय दलों ने मतभेदों को एक तरफ रखकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी। आज का विपक्ष उसी परंपरा से क्यों मुंह मोड़ रहा है? इस बहिष्कार के कई नकारात्मक परिणाम हैं। सबसे पहले, यह विपक्ष की विश्वसनीयता को कमजोर करता है।
जनता विपक्ष से अपेक्षा करती है कि वह सरकार की नीतियों की जांच करे, लेकिन सदन के बाहर या सोशल मीडिया पर बयानबाजी से ज्यादा, बैठक में भाग लेकर ठोस सुझाव देना प्रभावी होता। दूसरा, अंतरराष्ट्रीय संकट के समय राष्ट्रीय एकता का संदेश कमजोर पड़ता है। पश्चिम एशिया में तेल की कीमतों में उछाल, शिपिंग मार्गों पर खतरा और भारतीय समुदाय की सुरक्षा जैसे मुद्दे किसी एक दल के नहीं, पूरे राष्ट्र के हैं। विपक्ष की अनुपस्थिति से दुश्मन देशों को गलत संकेत मिल सकता है कि भारत में राजनीतिक विभाजन है।तीसरा, यह संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है।
सर्वदलीय बैठकें सरकार की एकतरफा घोषणाओं का विकल्प नहीं, बल्कि संवाद का मंच हैं। यदि विपक्ष हर बैठक से किनारा करेगा, तो भविष्य में सरकार भी ऐसी बैठकों को अनावश्यक मान सकती है। इससे संसद की उपयोगिता घटेगी और जनता में राजनीति के प्रति निराशा बढ़ेगी। हालांकि, सरकार की भी जिम्मेदारी है। उसे विपक्ष की शिकायतों (जैसे प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति या सदन में चर्चा की मांग) को गंभीरता से लेना चाहिए। पारदर्शिता और समावेशी दृष्टिकोण ही विश्वास पैदा कर सकता है। लेकिन बहिष्कार को औचित्यपूर्ण ठहराना गलत है।
विपक्ष को याद रखना चाहिए कि चुनावी राजनीति राष्ट्रहित से ऊपर नहीं हो सकती। भारतीय लोकतंत्र की ताकत उसकी बहुलता में है, लेकिन संकट के समय एकता में भी। विपक्ष को चाहिए कि वह बैठक में शामिल होकर अपनी बात रखे, सवाल पूछे और वैकल्पिक रणनीति सुझाए। केवल विरोध के लिए विरोध करने की राजनीति देश को कमजोर करती है। आज जब विश्व अनिश्चितता से भरा है।
चीन की चुनौतियां, रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रभाव और आर्थिक मंदी की आशंका, तो भारतीय राजनीति को परिपक्वता दिखानी होगी। विपक्ष अगर सर्वदलीय मंचों से दूर रहता रहा, तो जनता उसे जिम्मेदार नहीं मानेगी। लोकतंत्र में भागीदारी अनिवार्य है, बहिष्कार विकल्प नहीं। दोनों पक्षों को संवाद का रास्ता चुनना चाहिए, ताकि भारत मजबूत और एकजुट दिखे।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
