तपती धूप... उस पर पचास ग्राम का टुकड़ा: डॉ सुरेश कुमार मिश्रा
पचास ग्राम का प्लास्टिक का टुकड़ा... मानो छाती पर बैठा मुजरिम
उफ़! कितनी तपती धूप है आज, और उस पर यह पचास ग्राम का प्लास्टिक का टुकड़ा... यह सीने पर ऐसे चिपका है जैसे कोई मुजरिम छाती पर चढ़कर बैठ गया हो। इसे उतारकर जेब में रख लो तो मानो तुरंत दस डिग्री तापमान कम हो जाता है। हवा सीधे खाकी सूती कमीज़ के पार जाकर रीढ़ की हड्डी को सहलाने लगती है। नियम-कानून अपनी जगह हैं, पर इंसानी शरीर की भी तो कोई मर्यादा होती है या नहीं? आख़िर सिपाही भी तो इंसान ही है, कोई लोहे का खंभा थोड़े ही है जो हर मौसम में एक सा गड़ा रहे।
इधर नेमप्लेट जेब में गई, उधर अचानक शरीर के भीतर की पूरी थकान काफूर हो जाती है। जो हाथ दो मिनट पहले तक गर्मी के मारे ढीले पड़े थे, उनमें अचानक एक जादुई फुर्ती लौट आती है। सामने भीड़ है, शोर है, और हाथ में चिकनी, भारी नीम की लाठी। जैसे ही लाठी हवा में लहराती है, तो कोई यह नहीं देखता कि वो लाठी किसी बूढ़े की पीठ पर पड़ रही है या किसी नौजवान की पिंडली पर। लाठी का अपना कोई मज़हब नहीं होता, न ही उसकी कोई पहचान होती है। वह तो बस ऊपर से आए हुक्म का एक बेज़ुबान ज़रिया भर है, जो हवा को चीरती हुई सीधे गोश्त और हड्डियों के जोड़ पर जाकर टकराती है।
ज़मीन पर गिरकर कराहते हुए उस आदमी की आँखों में एक अजीब सा सन्नाटा तैर जाता है। वह फटी हुई आँखों से उस खाकी वर्दी के सीने को घूरता है, जहाँ एक आयताकार साफ़ निशान तो है, पर कोई नाम नहीं है। नाम होता, तो शायद वह अपने दर्द को एक नाम दे पाता। वह अदालत के दरवाज़े पर जाकर कह पाता कि मुझे फलां इंसान ने तोड़ा है। पर बिना नाम की खाकी तो बस एक अमूर्त सा साया बन जाती है। दर्द जब बेनाम हो जाए, तो वह और ज़्यादा जहरीला हो जाता है।
इंसान सोचता रह जाता है कि जिस हाथ ने उसकी पसलियाँ तोड़ी हैं, उस हाथ के मालिक के घर में भी क्या छोटे-छोटे बच्चे होंगे जो शाम को उसकी उंगलियाँ पकड़कर घूमते होंगे? सड़क के किनारे पड़े उस लहूलुहान इंसान के मुँह से निकली चीख दूर तक गूँजती है, पर वह खाकी के उस बेनाम सीने से टकराकर वापस लौट आती है। वर्दी के नियम भी बड़े दिलचस्प होते हैं, ज़रूरत पड़ने पर वे मोम की तरह पिघल जाते हैं और वक्त आने पर पत्थर से भी ज़्यादा सख्त हो जाते हैं। जब अपने बचाव की बात आए तो खाकी सिर्फ़ एक नौकरी बन जाती है, और जब सामने वाले को कुचलने की बात आए तो वही खाकी असीम अधिकार का रूप ले लेती है। कानून की किताबें तो मेज़ पर बंद पड़ी रह जाती हैं, और सड़क पर बहता हुआ लाल खून धीरे-धीरे उड़ती हुई धूल में जज़्ब होने लगता है।
शाम ढलते-ढलते जब मुआयने का वक्त आता है, तो वही प्लास्टिक के छोटे-छोटे टुकड़े जेबों से बाहर निकल आते हैं। सीने पर सुरक्षा मानकों के हिसाब से दोबारा सजा लिए जाते हैं। अब वे सब के सब फिर से वही कानून के रखवाले बन चुके हैं, जिनकी आँखों में एक अजीब सी मासूमियत तैर रही होती है। उनके चेहरों पर न तो दिन भर के खून के धब्बे दिखाई देते हैं और न ही किसी बेबस की हाय का कोई निशान। जो दर्द उस सड़क पर छूट गया, वह सिर्फ़ उस इंसान का था जिसकी हड्डियाँ चटकी थीं, और उस लाचार व्यवस्था का था जो हर बार अपनी सुविधा के हिसाब से अंधी और बहरी हो जाती है।
रात को जब वे अपने-अपने घर लौटेंगे, अपने बच्चों के माथे को सहलाएँगे और थपकी देकर सुलाएँगे, तब क्या उन्हें उस बेनाम मार का ज़रा सा भी अहसास होगा? शायद नहीं। क्योंकि जिस सिस्टम में इंसान का नाम ही उसकी वर्दी से अलग कर दिया जाए, वहाँ ज़मीर की गुंजाइश भी जेब के किसी कोने में ही दबा दी जाती है। सड़क पर पड़ा वह शख्स रात भर करवटें बदलता रहेगा, अपने टूटे हुए जिस्म को समेटने की कोशिश करेगा, और सोचता रहेगा कि उसकी सबसे बड़ी गलती शायद यही थी कि उसने उस बेनाम खाकी को इंसान समझ लिया था।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
