संपादकीय: घर का बजट! महंगाई की आग में सुलगती रसोई
उपभोक्ता विभाग के अनुसार, 2016 से 2026 तक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भारी उछाल
- पाम ऑयल की औसत खुदरा कीमत में 116% की बढ़ोतरी
रविवार के दिन की सुबह घर में महीने का राशन बनाने की तैयारी चल रही है। सूची वही पुरानी आटा, चावल, दाल, दूध, तेल, प्याज, टमाटर, चीनी और एलपीजी। लेकिन दस साल पहले जो रकम इस सूची को पूरा करती थी, आज उसी के लिए जेब ढीली पड़ती है। महंगाई की सबसे मार रसोई पर पड़ती है, जहां हर दिन चूल्हा जलता है। पेट्रोल-डीजल या शेयर बाजार की चर्चा तो अखबारों में छाती है, लेकिन आम गृहिणी की चिंता तेल-प्याज-दूध की कीमतों को लेकर होती है।
उपभोक्ता मामले विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2016 से 2026 तक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भारी उछाल आया है। खाद्य तेलों ने रसोई का बजट सबसे ज्यादा बिगाड़ा। पाम ऑयल की औसत खुदरा कीमत 2016 में करीब ₹68.58 प्रति लीटर थी, जो 2026 में ₹148.08 तक पहुंच गई यानी 116% की बढ़ोतरी। सूरजमुखी तेल में 98% और सरसों तेल में 76% की वृद्धि हुई।
भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। कोविड, रूस-यूक्रेन युद्ध, वैश्विक सप्लाई चेन की रुकावटें और बढ़ता मालभाड़ा इन कीमतों का प्रमुख कारण बने। दूध, जो हर घर की रोज की जरूरत है, 2016 में औसतन ₹39.96 प्रति लीटर था, अब ₹70 यानी 59% महंगा। आटा में 48% (₹25.16 से ₹37.15) और चावल में 61% (₹27.32 से ₹43.94) की बढ़ोतरी हुई।
प्याज, जो भारतीय थाली का अभिन्न अंग है, 2016 में औसत ₹16.79 प्रति किलो से दोगुना होकर ₹32.84 पहुंच गया। चीनी में लगभग 22% की वृद्धि हुई, जो दूसरी चीजों की अपेक्षा में कम है, लेकिन कुल मिलाकर रसोई का बोझ बढ़ा ही है। एलपीजी सिलेंडर की बात करें तो 2016 में दिल्ली में गैर-सब्सिडी वाला 14.2 किलो सिलेंडर करीब ₹584 का था, जो 2026 में ₹913 तक पहुंच गया। लगभग 56% की बढ़ोतरी।
सब्सिडी वाले उपभोक्ताओं को राहत मिलती है, लेकिन मध्यम वर्ग और व्यवसायों पर इसका सीधा असर पड़ता है। वैश्विक ऊर्जा कीमतों, सब्सिडी नीति और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं से यह प्रभावित रहता है। एक औसत चार सदस्यीय परिवार की मासिक जरूरत मानें तो 30 लीटर दूध, 10 किलो आटा, 10 किलो चावल, 5 लीटर तेल, सब्जियां और दो एलपीजी सिलेंडर। दस साल पहले यह खर्च कुछ हजार रुपये में निपट जाता था, आज कई गुना बढ़ गया है। खाद्य मुद्रास्फीति की अस्थिरता से परिवारों का बजट बिगड़ता है।
कम आय वाले वर्ग तो और भी मुश्किल में हैं। सरकार ने सब्सिडी, बफर स्टॉक, निर्यात प्रतिबंध और आयात के जरिए नियंत्रण की कोशिश की है, लेकिन लंबे समय में उत्पादकता बढ़ाना, स्टोरेज सुविधाएं मजबूत करना और किसानों को बेहतर मूल्य दिलाना जरूरी है। जलवायु परिवर्तन, मानसून की अनिश्चितता और वैश्विक घटनाएं चुनौती बनी रहेंगी।
रसोई की महंगाई सिर्फ आंकड़ों का मुद्दा नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की रोजमर्रा की लड़ाई है। जब दाल-रोटी महंगी हो जाए, तो विकास के दावे भी फीके पड़ जाते हैं। वेतन या इनकम तो किसी भी दशा में डबल तो नही हुआ है नीति-निर्माताओं को इस वास्तविकता को समझना होगा कि अर्थव्यवस्था की सेहत रसोई की थाली से तय होती है। महंगाई पर काबू पाना और आम आदमी की पहुंच में जरूरी वस्तुएं रखना ही सच्ची प्रगति है।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
