आज का लेख: किताबों का अंतिम यात्रा; डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

लेखक की अलमारी का सच

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  • पन्नों की पुकार

किताब होना इस दौर में वैसा ही है, जैसे किसी कड़कती धूप में बिना छाते के खड़े रहना। जब मैं पहली बार चमचमाते कवर के साथ लेखक महाशय के घर आई थी, तो लगा था कि साक्षात सरस्वती के मायके आ गई हूँ। लेखक साहब मुझे उंगलियों से ऐसे सहलाते थे, मानो कोई नया-नया आशिक अपनी महबूबा का हाथ थाम रहा हो। पन्ने पलटने के लिए जब उनकी जुबान का थूक मेरी छाती पर लगता, तो घिन नहीं, एक अजीब सा अपनापन महसूस होता था। लगता था कि मेरा जन्म सफल हो गया। 

शुरुआती हफ़्ते मैंने ड्रॉइंग रूम की उस शीशे वाली अलमारी में गुज़ारे, जिसे देखकर मोहल्ले के लोग लेखक की विद्वत्ता का अंदाज़ा लगाते थे। वह अलमारी घर का वीआईपी लाउंज थी। पर अफ़सोस, यह मुग़ालता ज़्यादा दिन नहीं टिका। जैसे ही बाज़ार में कोई नई, चकाचौंध वाली किताब आई, मेरा प्रमोशन रुक गया और मुझे उस वीआईपी लाउंज से धक्के मारकर बाहर कर दिया गया। 

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ड्राइंग रूम की अलमारी से सीधे सेंटर टेबल पर आना वैसा ही था, जैसे किसी कॉर्पोरेट कंपनी में मैनेजर से सीधे इंटर्न बना दिया जाना। पर असली कहानी तो अभी शुरू होनी थी। जब आपकी ज़िंदगी में स्थायित्व खत्म हो जाता है, तो आप सिर्फ़ वजूद बचाने की जंग लड़ते हैं। मैं थोड़ी सी मोटी और भारी-भरकम थी और यही मेरा सबसे बड़ा गुनाह बन गया। लेखक की पत्नी और उनके मॉडर्न बच्चों ने मेरी उपयोगिता का एक नया और क्रांतिकारी आयाम खोज निकाला। चाय की केतली से लेकर गरम कॉफी के मग तक, सब मेरी पीठ पर सजने लगे। मेरी पीठ पर बने वो गोल-गोल काले-भूरे निशान मेरी रीढ़ की हड्डी के टूटने के गवाह हैं। कभी-कभी तो हद ही हो जाती थी।

जब रात को लेखक के कमरे में मच्छर या झींगुर आतंक मचाते, तो लेखक किसी हथियार की तरह मुझे उठाते और धड़ाम से दीवार पर दे मारते। मेरे पन्नों पर फैले उन बेगुनाह कीट-पतंगों के खून के धब्बे चीख-चीखकर कहते थे कि मैं कोई ज्ञान का सागर नहीं, बल्कि एक पढ़ा-लिखा मच्छरमार विज्ञापन बनकर रह गई हूँ। लेखक की पत्नी जब भी घर की सफ़ाई करतीं, उनकी नज़रें मुझे ऐसे घूरती थीं जैसे कोई कसाई बकरे को देखता है। वो तो भला हो लेखक का, जो साल में एक-दो बार मुझे उलट-पलट कर देख लेते और वापस स्टोर रूम के अंधेरे में ठूंस देते थे।

स्टोर रूम में जाना किसी काले पानी की सज़ा काटने जैसा था। वहाँ मेरे जैसी सैकड़ों अभागी किताबें धूल की चादर ओढ़े अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थीं। हम सब रात के सन्नाटे में एक-दूसरे के फटे पन्नों को सहलाते और रोते थे कि आखिर हमें उस काँच की अलमारी में जगह क्यों नहीं मिली? एक दिन हमारी क्लास की एक दुबली-पतली, फटी-पुरानी किताब ने इस रहस्य से परदा उठाया। 

उसने कांपती आवाज़ में बताया, "अरे तुम लोग किस भ्रम में जी रहे हो? एक दिन लेखक का कोई प्रशंसक आया था और पूछ रहा था कि आप इतनी किताबें लाते कहाँ से हैं? तो लेखक ने हंसकर कहा था, 'अरे भाई, कोई समीक्षा के नाम पर थमा जाता है तो कोई मुफ्त का सैंपल। किसी को ना कह नहीं पाता, इसलिए उठा लाता हूँ। घर में बीवी की गालियाँ सुनता हूँ सो अलग। इन किताबों ने घर को कबाड़खाना बना दिया है। अलमारी में तो सिर्फ़ मेरी अपनी लिखी किताबें और डिक्शनरी है, बाकी का यह कूड़ा-कचरा स्टोर रूम में सड़ने के लिए है।'" यह सुनना था कि हमारी आत्मा का शीशा तड़क कर टूट गया। हम जिसे प्रेम समझ रहे थे, वह तो महज एक लाचारी का बोझ था।

कहानी में ट्विस्ट तब आया जब एक दिन स्टोर रूम के कबाड़ के बीच लेखक का चमचमाता हुआ स्मार्टफोन आकर गिरा। हम सबने उत्सुकता से पूछा, "भैया, तुम इतने कीमती होकर इस नर्क में कैसे?" स्मार्टफोन ने बड़े घमंड से अपनी स्क्रीन चमकाई और हँसकर बोला, "अरे ओ रद्दी के टुकड़ों! मेरी औकात की बराबरी मत करो। लेखक की बेटी ने मज़ाक में मुझे यहाँ छिपा दिया है। 

लेखक तो मुझसे अपनी बीवी-बच्चों से भी ज़्यादा प्यार करते हैं। दिन भर की उंगलियों की मसाज और रात भर का साथ सिर्फ़ मेरे नसीब में है। आजकल उनका लिखना, पढ़ना, सोचना, रील्स देखना सब मुझी पर होता है। तुम लोगों की ज़रूरत अब गुज़रे ज़माने की बात हो चुकी है। और सुनो, अभी थोड़ी देर पहले लेखक मुझसे ही रद्दीवाले से बात कर रहे थे। वह बस आता ही होगा, तुम सबकी इस घर से हमेशा के लिए छुट्टी होने वाली है।" स्मार्टफोन की यह डिजिटल ज़हर बुझी बातें सुनकर हमारे पन्नों का खून सूख गया। हमें समझ आ गया कि नए ज़माने के इस छोटे से गैजेट ने हम जैसे कागज़ी शेरों को हमेशा के लिए बेघर कर दिया है।

रद्दीवाला हमारी दुनिया का यमराज होता है। जब वह अपनी बड़ी सी बोरी और तराज़ू लेकर आता है, तो स्टोर रूम की हवा में एक अजीब सी मौत की गंध तैरने लगती है। वह हमें किलोग्राम के भाव तौलता है, ठीक वैसे ही जैसे बूढ़े जानवरों को मंडियों में कसाई के हवाले किया जाता है। वह हमारी रीढ़ से जिल्द को अलग करेगा, हमारे पन्नों को फाड़ेगा और फिर हम किसी चाट वाले की दुकान पर समोसे का तेल सोखते हुए मिलेंगे या किसी पंसारी की दुकान पर दाल-चावल लपेटने के काम आएंगे। 

जो शब्द कभी किसी के दिल को छूने के लिए लिखे गए थे, वो अब किसी की ज़बान का स्वाद और तेल साफ़ करने के काम आएंगे। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि जिस काग़ज़ को कभी पवित्र माना जाता था, उसे आज चंद रुपयों के सिक्कों के लिए तौल दिया गया। यह हमारी अंतिम यात्रा की तैयारी थी, जहाँ कोई कफ़न भी नसीब नहीं होने वाला था, सिर्फ़ एक फटी हुई प्लास्टिक की बोरी थी, जिसमें हमें ठूंस-ठूंस कर भरा जाना था।

अब जब रद्दीवाले की साइकिल की घंटी बाहर गली में सुनाई दे रही है, हम स्टोर रूम की सारी किताबें हाथ जोड़कर ईश्वर से एक आखिरी गुज़ारिश कर रही हैं। हे विधाता! अगले जन्म में हमें चाहे नाली का कीड़ा बना देना, किसी राह का पत्थर बना देना, या किसी नेता का चुनावी वादा बना देना जिसे कोई याद नहीं रखता पर भूलकर भी किसी लेखक की अलमारी की शोभा या काग़ज़ की किताब मत बनाना। 

इस डिजिटल युग में किताबों का ज़िंदा रहना, दरअसल उनकी धीमी और दर्दनाक मौत मरने जैसा है। हमारे पन्नों की यह सिसकी शायद किसी पाठक के कानों तक न पहुँचे, क्योंकि वे सब तो स्मार्टफोन की स्क्रीन पर 'स्क्रॉल' करने में व्यस्त हैं। हमारी अंतिम यात्रा शुरू हो चुकी है, तराज़ू के पलड़े पर हमारा वजूद तौला जा रहा है और लेखक महोदय बड़ी संतुष्टि से रद्दीवाले से मिले नोटों को गिन रहे हैं। वाह रे साहित्य! और वाह रे साहित्यकार!

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लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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