संपादकीय; कुलगाम हमला: ‘हुआ या कराया गया’ सवालों के घेरे में सच
जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में ईंट-भट्ठे पर काम कर रहे दो मजदूरों की हत्या
जब भी कश्मीर अपनी राज्य का दर्जा मांगने की कोशिश करता है तब कोई ऐसी घटना हो जाती है कि पता चले कि सब कुछ ठीक नही है। अब की बहस जम्मू-कश्मीर के कुलगाम जिले के केल्लाम इलाके में 31 जुलाई 2026 की शाम को ईंट भट्ठे पर काम कर रहे दो प्रवासी मजदूरों, छत्तीसगढ़ के दीपक रात्रे और भोपिंदर की हत्या कर दी गई। आतंकवादियों ने उनसे धर्म पूछा निशाना बनाया, गोली चलाई और भाग निकले। एक की मौके पर या रास्ते में मौत हो गई, दूसरे की अस्पताल में।
द रेसिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ), जो लश्कर-ए-तैयबा का प्रॉक्सी माना जाता है, ने हमले की जिम्मेदारी ली। सुरक्षा बल इलाके में बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान चला रहे हैं। प्रारंभिक जांच में एक स्थानीय लश्कर आतंकी लतीफ का नाम सामने आया है।इस घटना के बाद एक पुरानी बहस फिर उठ खड़ी हुई कि ‘हमला हुआ या कराया गया?’ कुछ लोग हमेशा की तरह साजिश के सिद्धांत गढ़ने लगते हैं। वे पूछते हैं कि क्या यह वाकई आतंकियों का काम था या किसी गहरे षड्यंत्र का हिस्सा।
ऐसी शंकाएं अक्सर तब पैदा होती हैं जब हिंसा की कोई नई धटना धर्म के आधार पर घटना होती है। लेकिन तथ्यों को नजरअंदाज करके सिर्फ शक के आधार पर निष्कर्ष निकालना न तो न्यायसंगत है और न ही जिम्मेदाराना। जो तथ्य उपलब्ध हैं, वे साफ इशारा करते हैं कि यह एक लक्षित आतंकी हमला था। आतंकियों ने मजदूरों से नाम पूछे, पहचान की और फिर गोलियां दाग दीं। भट्ठे पर सैकड़ों प्रवासी मजदूर काम करते थे। हमलावर ने बातचीत करके विश्वास जगाया और फिर फायरिंग की। यह ‘शूट एंड स्कूट’ की पुरानी शैली है, जो दक्षिण कश्मीर में पहले भी देखी जा चुकी है।
टीआरएफ का दावा, सुरक्षा एजेंसियों के संदेह और स्थानीय खुफिया इनपुट है सब एक ही दिशा में इशारा करते हैं। ‘कराया गया’ वाली थ्योरी अक्सर उन लोगों द्वारा फैलाई जाती है जो आतंकवाद की जड़ को स्वीकार करने से कतराते हैं। वे भूल जाते हैं कि कश्मीर में प्रवासी मजदूरों, पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों पर हमले कोई नई बात नहीं। ऐसे हमलों का मकसद साफ है डर फैलाना, आर्थिक गतिविधियां ठप करना और घाटी को फिर से अशांत दिखाना। जब मजदूर छत्तीसगढ़ या अन्य राज्यों से आकर काम करते हैं तो आतंकवादी उन्हें निशाना बनाकर संदेश देते हैं कि कश्मीर अभी भी ‘असुरक्षित’ है।
सच्चाई यह है कि आतंकवाद न तो खुद-ब-खुद ‘होता’ है और न ही कोई जादुई शक्ति उसे ‘कराती’ है। इसे इंसान अंजाम देते हैं, हथियार उठाने वाले, विचारधारा से प्रेरित और सीमा पार से समर्थन पाने वाले। उन्हें संरक्षण देने वाले, सूचना देने वाले और वैचारिक समर्थन देने वाले भी उतने ही दोषी हैं। कुलगाम हमला इसी श्रृंखला की एक कड़ी है। फिर भी हम मान लेते है कि देश सुरक्षित हाथों में है। सरकार और सुरक्षा बलों को अब दो काम करने चाहिए। पहला, दोषियों को जल्द से जल्द पकड़ना या निष्क्रिय करना। दूसरा, प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाना। साथ ही, समाज को भी सतर्क रहना होगा।
शक की संस्कृति आतंकवादियों को ही फायदा पहुंचाती है। जब हम हर घटना को साजिश बताने लगते हैं तो असली अपराधियों का ध्यान भटक जाता है। कुलगाम के दो युवा मजदूर सिर्फ आजीविका कमाने आए थे। उन्होंने परिवार के लिए कुछ कमाने का सपना देखा था। उनकी हत्या न तो दुर्घटना थी और न ही कोई नाटकीय साजिश। यह आतंक का सीधा, नंगा और क्रूर चेहरा था। हमें इसे स्वीकार करना होगा। तभी हम सही जवाब दे पाएंगे, जब न सिर्फ बंदूक से, बल्कि सच्चाई और संकल्प से भी, कश्मीर को उनके हिसाब से जिन्दा रहने की आजादी दे सकेगें। क्यों कि आज तक पुलवामा का राज भी राज ही है।
लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
