कामनवेल्थ पीस मेडिएशन कॉन्फ्रेस: संस्थागत मध्यस्थता हमारी सनातन परंपरा का हिस्सा
आपसी सहमति से न्याय, मध्यस्थता की बढ़ती जरूरत
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सही ही कहा है कि हर विवाद का निस्तारण लंबी न्यायिक प्रक्रिया के ही तहत हो, यह जरुरी नहीं है। मध्यस्थता यानी की आपसी बातचीत-सहमति से भी विवादों का निपटारा किया जा सकता है। मध्यस्थता से विवादों का निपटारा हमारी सनातन परंपरा का हिस्सा रहा है।
जयपुर में राजस्थान स्टेट लीगल सर्विसेज अथारिटी द्वारा आयोजित कामनवेल्थ पीस मेडिएशन कॉन्फ्रेस इस मायने में महत्वपूर्ण हो जाती है कि विवादों के निस्तारण के लिए मध्यस्थता हमारी सनातन परंपरा रही है जिसे समय के साथ भुला दिया गया तो दूसरी और मध्यस्थता से विवादों के निस्तारण की आवष्यकता लंबे समय से महसूस की जाती रही है। एक और न्यायालयों में वादों का अंबार लगा हुआ है तो उनमें मध्यस्थता के दायरें में आने वाले वादों की अच्छी खासी संख्या है और आपसी समझाइश से इनमें से अधिकांश वादों का निस्तारण आसानी से हो सकता है।
संपत्ति को लेकर आपसी विवाद, पति-पत्नी के मनमुटाव, भरण-पोषण, पारिवारिक बंटवारें जैसे मामलों को मध्यस्थता के माध्यम से आसानी से निपटाया जा सकता है। इसके अलावा व्यापारिक विवाद खासतौर से लेन-देन, व्यापारिक समझौते के विवाद, कर्जें की वसूली, उपभोक्ता सेवाओं से संबंधित विवाद मोटर दुर्घटना, मोटर व्हीकल एक्ट आदि से संबंधित विवाद और नियोक्ताओं और कार्मिकों के बीच के विवाद और इसी तरह की श्रेणी के विवादों को आपसी समझौतों से आसानी से निपटाया जा सकता है। लोक अदालतों के माध्यम से यह प्रयास किये भी जा रहे हैं तो दूसरी और मध्यस्थता से विवादों के निपटारों पर पहले भी दिया जाता रहा है। करीब पांच साल पहले फिक्की के एक समारोह में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश शरद अरविन्द बोबड़े ने अदालतों में मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए संस्थागत मध्यस्थता की जरुरत जताई है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि मुकदमों के बोझ तले दबी न्यायिक व्यवस्था को लेकर न्यायालय, सरकार, गैरसरकारी संगठन और आमजन सभी गंभीर है। अनावश्यक पीएलआर दाखिल करने की प्रवृति पर सख्त संदेश देकर आए दिन लगने वाली पीएलआर पर कुछ हद तक अंकुश लगाने में सफल रहे हैं। लोक अदालतों के माध्यम से भी आपसी समझाइश से मुकदमों को कम करने के प्रयास जारी है। लोकअदालतों का आयोजन अब तो नियमित होने लगा है।
देश के न्यायालयों में लंबित मुकदमों के गणित को प्राप्त आंकड़ों से आसानी से समझा जा सकता है। एक मोटे अनुमान के अनुसार 4.9 करोड़ न्यायिक प्रकरण देश की निचली एवं जिला अदालतों में ही लंबित चल रहे हैं। एक जानकारी के अनुसार देश की सर्वोच्च अदालत में ही 93 हजार दीवानी एवं फौजदारी मामलें लंबित चल रहे हैं। राज्यों के उच्च न्यायालयों में करीब 64 लाख मामलें विचाराधीन है। इन आंकडों में कमी बेसी हो सकती है पर इसमें कोई दो राय नहीं कि न्यायालयों में विचाराधीन वादों की संख्या करोड़ों में है। सर्वोच्च न्यायालय देश में लंबित मुकदमों के प्रति काफी गंभीर है।
सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को पुराने मामलों को प्राथमिकता से निस्तारित करने के निर्देश दिए हैं तो पांच साल से पुराने मामलों की सूची तैयार कर इन्हें शीघ्र निस्तारित करने को कहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने तो यहां तक सुझाव दिया है कि मुकदमों के अंबार को कम करने के लिए बहुत ही इमरजेंसी को छोड़कर न्यायालय को कार्य दिवस को छुट्टी ना ले। सरकार और न्यायालयों द्वारा वादों के भार को कम करने के लिए समन्वित प्रयास किये जा रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय स्तर पर भी सुधार के प्रयास जारी है।
संस्थागत मध्यस्थता की जो आवश्यकता महसूस की है उसको इस मायने में भी समझा जा सकता है कि हमारी सनातन परंपरा और ग्रामीण व्यवस्था में पंच परमेश्वर की जो भूमिका थी आज उस भूमिका को पुनर्स्थापित किए जाने की आवश्यकता है। इसी तरह से मोटर व्हीकल एक्ट की पालना नहीं करने, यातायात नियमों की अवहेलना, मामूली कहासुनी, मामूली बातों के आपसी विवाद आदि इस तरह के प्रकरणों को चिन्हित कर लिया जाए और यह तय कर लिया जाए कि भले ही सख्ती कहा जाए पर फास्ट ट्र्ेक की तरह इन प्रकरणों की सुनवाई कर तत्काल निर्णय कर लिए जाये और अनावश्यक अपील की व्यवस्था ना हो तो पूरे देश में लाखों की संख्या में इस तरह के मुकदमों का अंबार कम किया जा सकता है। इसी तरह से राजस्व मामलें जो सर्वाधिक संख्या में आने लगे हैं उनकी भी पंच परमेश्वरों या अन्य दूसरी तरह का मैकेनिज्म बनाकर निस्तारण की ठोस रणनीति बन जाए तो मुकदमों का कुछ हद तक अंबार कम किया जा सकता है।
कुल मिलाकर जिस तरह से सर्वोच्च न्यायालय और हमारे न्यायाधीपतिगण और सरकार गंभीर होने लगी है उससे एक सोच विकसित होने लगा है और यह मानकर चला जाना चाहिए कि मुकदमों के अंबार में कमी आने के साथ ही जल्द न्याय की उम्मीद भी जगेगी।
सबसे खास बात यह है कि मध्यस्थता या आपसी सहमति से विवादों के निपटारें से केवल विवादों का निस्तारण ही नहीं होता अपितु आपसी सौहाद्रता भी बनी रहती है। मनमुटाव या मनभेद नहीं होता। सबसे खासबात यह है कि वादी और प्रतिवादी इस तरह के मामलों को निपटाने में विश्वास रखते हैं और कोई भी विवादों को लंबा नहीं खींचना चाहता ऐसे में मध्यस्थता से विवादों का निपटारा बेहतरीन विकल्प ही माना जाना चाहिए।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
