संपादकीय: उदारता या राजनीतिक रणनीति? युवाओं को माफी का ऐलान
बिहार समेत कई जगहों पर भी आंदोलनकारियों पर दर्ज केस वापस लिए गए
कल देर शाम इंस्टाग्राम पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के दौरान उनके खिलाफ अपशब्द बोलने वाले युवाओं को माफ करने का ऐलान किया। उन्होंने इंस्टाग्राम पर संदेश जारी कर कहा कि गुमराह बच्चों को अदालतों के चक्कर कटवाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इस बयान के साथ ही संबंधित एफआईआर वापस लेने और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को बंद करने की प्रक्रिया शुरू हुई।
बिहार समेत कई जगहों पर भी आंदोलनकारियों पर दर्ज केस वापस लिए गए। यह घटनाक्रम देश में राजनीतिक उदारता, कानून के शासन और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल उठाता है। सटीक आंकड़ों के अभाव में यह कहना मुश्किल है कि मोदी के माफी वाले बयान के बाद ठीक कितने केस हटाए गए या किसी केस हटाने सम्बधित आदेश जारी हुये। उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार, प्रदर्शन से जुड़े कई एफआईआर और हिरासत के मामले वापस लेने का फैसला किया गया।
बिहार में सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को रिहा करने और केस वापस लेने के आदेश जारी हुए। दिल्ली में भी अपशब्द बोलने वाली छात्रा समेत कुछ आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई रोकने की बात सामने आई। यह कोई बड़े पैमाने पर हजारों मामलों की माफी नहीं थी, बल्कि एक विशिष्ट आंदोलन से जुड़े सीमित मामलों तक सीमित रही। फिर भी, प्रधानमंत्री स्तर पर व्यक्तिगत माफी का ऐलान इसे प्रतीकात्मक महत्व देता है। यह फैसला दो धार तलवार की तरह है। एक तरफ, यह नेता की उदारता और युवाओं के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाता है।
लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन का अधिकार मौलिक है। अगर युवा गुस्से में अपशब्द बोल भी दें, तो उन्हें आजीवन कानूनी उलझनों में फंसाना सही नहीं। मोदी का यह रुख विपक्षी दलों द्वारा लगाए गए आरोपों जैसे कि कि उनकी सरकार असहमति को बर्दाश्त नहीं करती, का जवाब लगता है। यह दिखाता है कि सत्ता पक्ष भी माफी मांगने या देने की क्षमता रखता है। विदेशों में कैद भारतीयों की रिहाई के लिए कूटनीतिक प्रयासों की तरह, घरेलू मोर्चे पर भी माफी का यह रुख सकारात्मक छवि बनाता है। दूसरी तरफ, आलोचक इसे राजनीतिक गणना बताते हैं। आंदोलन शिक्षा संबंधी मुद्दों पर था। मांगें मानने के बाद केस वापस लेना और माफी देना, दबाव कम करने की रणनीति लगती है।
विपक्ष का कहना है कि जब देश प्रधानमंत्री से माफी मांग रहा था, तब उन्होंने उल्टा देश को माफ कर दिया। यह सवाल भी उठता है कि क्या कानून सबके लिए समान है। अगर सामान्य नागरिक या विपक्षी कार्यकर्ता अपशब्द बोलें तो सख्ती, और अगर सत्ता पक्ष के लोग मंच से अभद्रता करें तो चुप्पी और आंदोलन राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो तो माफी।
यह दोहरा मापदंड लोकतंत्र को कमजोर करता है। सच तो यह है कि माफी व्यक्तिगत हो सकती है, लेकिन संस्थागत प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए। अदालतें और जांच एजेंसियां स्वतंत्र रहें। राजनीतिक दलों को युवाओं को भड़काने के बजाय रचनात्मक विरोध सिखाना चाहिए। मोदी का फैसला अगर सच्चे दिल से है तो स्वागत योग्य है। लेकिन राजनैतिक है तो इसे मिसाल बनाकर हर असहमति को माफ करने का चलन न बने।
देश को कानून के शासन की जरूरत है, न कि व्यक्तिगत उदारता पर निर्भर व्यवस्था की। यह घटना याद दिलाती है कि लोकतंत्र में माफी और जवाबदेही दोनों जरूरी हैं। कितने केस हटाए गए, यह संख्या से ज्यादा मायने रखता है कि भविष्य में ऐसे फैसले निष्पक्ष और सिद्धांत आधारित हों। तभी माफी सच्ची उदारता बनेगी, न कि राजनीतिक औजार।
लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
