संपादकीय: जबरिया की मुहब्बत! लोकतंत्र में डर नहीं, विश्वास की जरूरत
जनता नफरत नहीं करती, नफरत पैदा करती हैं अधूरे वादे और खराब काम से
आज के लोकतंत्र में एक विडंबना यह है कि नेता और सरकारें जनता से तो प्यार की अपेक्षा रखती हैं, लेकिन उसे कमाने के बजाय जबरन हासिल करने की कोशिश करती हैं। हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करने पर केस दर्ज होने की घटनाएं बढ़ रही हैं।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जो संविधान का मूल अधिकार है, को दबाने की ये प्रवृत्ति न केवल चिंताजनक है बल्कि लोकतंत्र के लिए घातक भी। जनता किसी नेता या सरकार से नफरत नहीं करती, बल्कि नफरत तब पैदा होती है जब काम ठीक से न हों, वादे पूरे न हों और आलोचना को दमन का सामना करना पड़े। सच्ची लोकप्रियता कमाई का विषय है, जबरन थोपने का नहीं। इतिहास गवाह है कि जिन शासकों ने जनता की आवाज को दबाया, वे अंततः जनता द्वारा अस्वीकार कर दिए गए।
आज सोशल मीडिया ने जनता को एक मजबूत मंच दिया है जहां वह अपनी खुशी, गुस्सा और सुझाव खुलकर रख सकती है। लेकिन अगर सरकार हर आलोचना को ‘अपमान’ या ‘फेक न्यूज’ मानकर मुकदमा दायर करेगी, तो यह न सिर्फ असहिष्णुता का परिचय देगा बल्कि जनता में गुस्सा भी बढ़ाएगा। नेतृत्व का मूल कर्तव्य है कि काम ऐसा करना कि जनता खुद-ब-खुद प्यार करे।
सड़कें बनाना, रोजगार पैदा करना, महंगाई पर काबू, स्वास्थ्य और शिक्षा को मजबूत करना। ये वे काम हैं जो जनता के दिल जीतते हैं। जब किसान अपनी फसल का उचित मूल्य नहीं पाता, युवा बेरोजगारी से त्रस्त है, और आम आदमी महंगाई की मार झेल रहा है, तो सोशल मीडिया पर उसकी नाराजगी स्वाभाविक है। इसे दबाने के बजाय इसे सुनने और समाधान निकालने का रवैया अपनाया जाना चाहिए। जबरन प्रेम कराने की कोशिश, जैसे आलोचकों पर आईटी एक्ट की धाराएं लगाना या पुलिस का इस्तेमाल, केवल डर का माहौल पैदा करती है, विश्वास नहीं।
सोशल मीडिया पर आलोचना को लेकर दर्ज हो रहे केस लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचाते हैं। आलोचना बिना के किसी लोकतंत्र का विकास संभव नहीं। विपक्ष की आलोचना तो संसद में भी होती है, फिर आम नागरिक की टिप्पणी पर इतनी सख्ती क्यों? कई बार छोटी-मोटी पोस्ट या मीम पर भी एफआईआर दर्ज हो जाती है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है। इससे युवा वर्ग में सरकार के प्रति अविश्वास बढ़ता है। जो सरकार जनता की आवाज सुनने को तैयार नहीं, वह अंततः जनता से दूर हो जाती है। सच्चे नेता जानते हैं कि जनता की नफरत सबसे बड़ी सजा है और प्यार सबसे बड़ा पुरस्कार।
महात्मा गांधी ने कहा था कि सत्ता जनसेवा के लिए है, शासन के लिए नहीं। आज जरूरत है कि सरकारें आत्मचिंतन करें। सोशल मीडिया पर आलोचना को अवसर मानें, न कि खतरे के रूप में। पारदर्शिता बढ़ाएं, जवाबदेही तय करें और कामों से जनता का विश्वास जीतें। नेताओं को याद रखना चाहिए कि कोई भी सरकार स्थायी नहीं होती, लेकिन जनता स्थायी है।
जो नेता और सरकार जनता के हित में काम करेगी, उसकी लोकप्रियता स्वतः आएगी। जबरन प्रेम कराने की कोशिश न सिर्फ व्यर्थ है बल्कि उल्टा असर करती है। लोकतंत्र में जनता राजा है, उसे डराकर नहीं, उसके दिल जीतकर शासन करना चाहिए। समय आ गया है कि सत्ता पक्ष इस सच्चाई को स्वीकार करे। काम जनता के लिए, आलोचना को सम्मान के साथ सुनो और सुधारो। तभी जनता नफरत नहीं, सच्चा प्यार देगी।
संबंधित खबरें
लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
