संपादकीय: 100 प्रतिशत टैरिफ का दांव, पांच देशों को नई चुनौती
अमेरिकी सीनेट का बड़ा कदम, रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ का खतरा
अमेरिकी सीनेट में हाल ही में पास हुए ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सेंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ ने वैश्विक भू-राजनीति और व्यापार संबंधों में एक नई हलचल पैदा कर दी है। यह विधेयक रूस से तेल और गैस खरीदने वाले शीर्ष पांच देशों-चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान-पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति को देता है।
विधेयक का उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय को सीमित कर यूक्रेन युद्ध में उसकी क्षमता को कमजोर करना बताया जा रहा है। लेकिन इस कदम के निहितार्थ केवल मास्को तक सीमित नहीं हैं। अब भारत जैसे देशों की ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक हितों और रणनीतिक स्वायत्तता को सीधे प्रभावित करते हैं। भारत लंबे समय से रूसी कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार रहा है। युद्ध के बाद रूस ने भारी छूट पर तेल उपलब्ध कराया, जिससे भारत की आयात लागत घटी, मुद्रास्फीति पर नियंत्रण बना रहा और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हुई।
जून 2026 में भारत का रूसी तेल आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। यह फैसला राष्ट्रीय हित पर आधारित था, न कि किसी गुट की पक्षधरता पर। भारत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि उसकी विदेश नीति स्वतंत्र है और वह सस्ती ऊर्जा की उपलब्धता को प्राथमिकता देता है। ऐसे में अमेरिका का यह विधेयक भारत की इस व्यावहारिक नीति को दंडित करने जैसा लगता है।
विधेयक में यूरोपीय देशों के लिए विशेष छूट का प्रावधान है। जो देश रूसी गैस का 15 प्रतिशत से कम आयात करते हैं और इसे कम करने के प्रयास कर रहे हैं, उन्हें राहत मिल सकती है। यह दोहरे मापदंड का स्पष्ट उदाहरण है। एक ओर अमेरिका अपने सहयोगियों को सुरक्षा देता है, दूसरी ओर विकासशील देशों पर दबाव डालता है। यदि भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू होता है, तो उसके अमेरिकी बाजार में निर्यात पर भारी असर पड़ेगा। इससे व्यापार घाटा बढ़ेगा, रोजगार प्रभावित होंगे और भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव आ सकता है।
साथ ही, वैकल्पिक तेल स्रोतों की तलाश महंगी साबित हो सकती है, जिससे घरेलू ईंधन कीमतें बढ़ने का खतरा है।यह विधेयक अभी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में जाना है और राष्ट्रपति की मंजूरी बाकी है। राष्ट्रपति को छूट देने का अधिकार भी है, इसलिए स्थिति पूरी तरह बंद नहीं है। भारत को कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय रहना होगा। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते की बातचीत चल रही है।
इस संवेदनशील मुद्दे पर संतुलित समाधान निकालना दोनों के हित में है। भारत को ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण पर जोर देना चाहिए, लेकिन दबाव में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता का त्याग नहीं करना चाहिए। अब तो वैश्विक व्यवस्था में शक्ति का असंतुलन साफ दिख रहा है।
रूस पर दबाव बनाने के नाम पर विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को निशाना बनाना न तो न्यायसंगत है और न ही दीर्घकाल में प्रभावी। भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मजबूत आवाज उठानी चाहिए। कूटनीति, आर्थिक विविधीकरण और आत्मनिर्भरता ही इस चुनौती का स्थायी समाधान हो सकते हैं। अमेरिका को भी यह समझना होगा कि सहयोगियों पर दबाव से नहीं, बल्कि आपसी समझ और साझा हितों से मजबूत साझेदारी बनती है।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
