मॉक ड्रिल के दौरान अलार्म बजने से ट्रॉमा सेंटर में भर्ती मरीजो में मचा हड़कम्प

फिरोजाबाद, प्रदेश की राजधानी लखनऊ के कोचिंग सेंटर में हुए अग्निकांड के बाद जनपद के प्रशासन द्वारा स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय में अग्नि सुरक्षा व्यवस्थाओं की पड़ताल शुरू हुई तो ट्रॉमा सेंटर और सौ शैय्या अस्पताल की कई खामियां सामने आ गईं। बुधवार को ट्रॉमा सेंटर में हुई मॉक ड्रिल के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि दोनों अस्पतालों में आपात स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त निकासी मार्ग नहीं हैं। आग जैसी अप्रिय घटना होने पर मरीजों, तीमारदारों और कर्मचारियों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
लखनऊ में कोचिंग सेंटर में हुए अग्निकांड के बाद प्रशासन ने मंगलवार को जिले के सरकारी ट्रॉमा सेंटर, जिला अस्पताल और कोचिंग सेंटरों में अग्नि सुरक्षा व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया था। हालांकि निरीक्षण के दौरान ट्रॉमा सेंटर और सौ शैय्या अस्पताल में मौजूद कई गंभीर कमियों पर अधिकारियों की नजर नहीं पहुंच सकी। बुधवार दोपहर करीब दो बजे ट्रॉमा सेंटर में अग्नि सुरक्षा को लेकर मॉक ड्रिल का आयोजन किया गया। जैसे ही सायरन बजा, अस्पताल में भर्ती मरीजों और उनके तीमारदारों में हड़कम्प मच गया। लोग सायरन बजने का कारण जानने के लिए इधर-उधर जानकारी जुटाने लगे। बाद में उन्हें बताया गया कि यह अग्नि सुरक्षा को लेकर आयोजित मॉक ड्रिल थी।
मॉक ड्रिल के दौरान सबसे बड़ी कमी अस्पताल की निकासी व्यवस्था में सामने आई। ट्रॉमा सेंटर में लोगों के आने-जाने के लिए मुख्य रूप से केवल एक ही गेट है। आपात स्थिति में यही गेट मरीजों, तीमारदारों और कर्मचारियों के बाहर निकलने का एकमात्र साधन बनेगा। ऐसे में आग लगने या किसी अन्य हादसे की स्थिति में भगदड़ मचने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। अस्पताल परिसर चारों ओर से चार दिवारी से घिरा हुआ है। यदि मुख्य गेट पर भीड़ बढ़ती है। तो लोगों को जान बचाने के लिए चार से पांच फीट ऊंची दीवार फांदने को मजबूर होना पड़ सकता है। इससे घायल होने या अन्य दुर्घटनाओं का खतरा भी बना रहेगा। सौ शैय्या अस्पताल की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। यहां भी प्रवेश और निकास के लिए केवल एक ही गेट की व्यवस्था है। इतनी बड़ी इमारत में वैकल्पिक आपात निकासी मार्ग का अभाव सुरक्षा मानकों पर सवाल खड़े कर रहा है। करोड़ों रुपये की लागत से अस्पताल भवन तो तैयार कर दिये गये। लेकिन अग्नि सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के जरूरी मानकों की अनदेखी की गयी है। इतना ही नही सरकारी ट्रॉमा पर आग लगने पर उसे बुझाने के लिए पानी की फिटिंग भी अधूरी है। फिर कैसे उस पर काबू पाया जायेगा।
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लेखक के बारे में
रविंद्र वर्मा वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ के फिरोज़ाबाद ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं। क्षेत्रीय मुद्दों पर ज़मीनी पकड़ के साथ वह समाचार कवरेज और रिपोर्टिंग का कार्य कर रहे हैं।
