मंजुल-सुधा हत्याकांड में फैसला, पूर्व एमएलसी कमलेश समेत 10 दोषियों को उम्रकैद

औरैया की एमपी-एमएलए कोर्ट ने अधिवक्ता मंजुल चौबे और उनकी शिक्षिका बहन सुधा चौबे की हत्या के मामले में सुनाई सजा

Published By Shishir Patel
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औरैया। उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के बहुचर्चित अधिवक्ता मंजुल चौबे और उनकी शिक्षिका बहन सुधा चौबे हत्याकांड में छह साल बाद बुधवार को अदालत ने फैसला सुनाया। दोपहर करीब दो बजे एमपी-एमएलए कोर्ट ने सपा के पूर्व एमएलसी कमलेश पाठक, उनके दो सगे भाइयों समेत 10 दाेषियाें को उम्रकैद की सजा सुनाई। अदालत के फैसले के बाद लंबे समय से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे पीड़ित परिवार को बड़ी राहत मिली।

15 मार्च 2020 को औरैया में अधिवक्ता मंजुल चौबे और उनकी बहन सुधा चौबे की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। घटना के पीछे पंचमुखी हनुमान मंदिर के पास स्थित करीब एक बीघा जमीन को लेकर चला आ रहा विवाद सामने आया था। बताया जाता है कि कभी कमलेश पाठक और मंजुल चौबे के बीच गहरी दोस्ती थी, लेकिन राजनीतिक वर्चस्व और जमीन विवाद के चलते दोनों के रिश्तों में खटास बढ़ती गई और दोस्ती दुश्मनी में बदल गई।

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पुलिस के मुताबिक, वारदात वाले दिन कमलेश पाठक विवादित जमीन पर कुर्सी डालकर बैठे थे। इसी दौरान मंजुल के पिता से कहासुनी हो गई। विवाद बढ़ने पर दोनों पक्षों के लोग मौके पर पहुंच गए। कमलेश के भाई संतोष और उनका गनर भी वहां पहुंच गया। आरोप है कि इसी दौरान फायरिंग हुई, जिसमें गोली लगने से मंजुल और उनकी बहन सुधा की मौके पर ही मौत हो गई। घटना के बाद पुलिस ने कमलेश पाठक, उनके भाइयों संतोष और राम समेत सात आरोपिताें को उसी दिन गिरफ्तार कर लिया था। अगले दिन चार अन्य आरोपिताें की गिरफ्तारी हुई।

पुलिस ने कुल 11 आरोपिताें के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। इनमें एक आरोपित नाबालिग था, जिसे जुबेनाइल कोर्ट भेज दिया गया। हत्या के मामले में सुनवाई करीब छह साल तक चली। इस दौरान अदालत में 900 से अधिक तारीखें पड़ीं और दोनों पक्षों की ओर से कुल 72 गवाह पेश किए गए। मंजुल के परिवार की ओर से 33, जबकि कमलेश पक्ष की ओर से 39 गवाहों ने बयान दर्ज कराए। 11 जुलाई 2020 को 10 आरोपिताें के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत भी कार्रवाई की गई थी। हालांकि गनर अवनीश प्रताप सिंह को गैंगस्टर एक्ट के मामले में बरी कर दिया गया था, जबकि हत्या का मुकदमा अलग से चलता रहा।

कभी बेहद करीबी थे कमलेश और मंजुल

भड़ारीपुर गांव निवासी कमलेश पाठक और मंजुल चौबे कभी बेहद करीबी दोस्त माने जाते थे। मंजुल के छात्रसंघ अध्यक्ष बनने के दौरान कमलेश उनके साथ मजबूती से खड़े रहे। दोनों की नजदीकी का अंदाजा इसी बात से लगाया जाता था कि लोग मंजुल को कमलेश की परछाई तक कहते थे। बताया जाता है कि मंजुल का मकान भी कमलेश ने बनवाया था। वर्ष 2006 के नगर पालिका चुनाव के दौरान दोनों के रिश्तों में दरार आनी शुरू हुई। इसके बाद राजनीतिक नजदीकियां भी अलग-अलग हो गईं। धीरे-धीरे दोनों के बीच दूरी बढ़ती गई और पंचमुखी हनुमान मंदिर के पास जमीन को लेकर विवाद ने रिश्तों में और कड़वाहट घोल दी। मंजुल ने जमीन पर कमलेश के दावे का विरोध किया था। यही विवाद आगे चलकर खूनी संघर्ष में बदल गया।

पाठक का राजनीति में भी रहा लंबा सफर

कमलेश पाठक कम उम्र में ही राजनीति में सक्रिय हो गए थे। वह समाजवादी पार्टी के प्रमुख नेताओं के करीबी रहे। उन्होंने विधायक और विधान परिषद सदस्य के साथ ही दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली। वर्ष 1990 में विधान परिषद सदस्य बनने के बाद 1991 में उन्हें दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री बनाया गया। वर्ष 2002 में वह डेरापुर से विधायक चुने गए। इसके बाद 2007 में दिबियापुर और 2012 में सिकंदरा से चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 2013 में सपा सरकार ने उन्हें रेशम विभाग का अध्यक्ष बनाकर राज्यमंत्री का दर्जा दिया। इसके बाद 17 मई 2015 को उन्हें दोबारा एमएलसी बनाया गया। छह साल तक चली लंबी कानूनी लड़ाई के बाद बुधवार को अदालत के फैसले के साथ जिले के इस चर्चित दोहरे हत्याकांड में एक अहम अध्याय पूरा हो गया। 10 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने से मंजुल और सुधा के परिवार को लंबे इंतजार के बाद न्याय की उम्मीद पूरी हुई।

लेखक के बारे में

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पत्रकारिता में 17 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले शिशिर पटेल वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ में पोर्टल इंचार्ज के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘स्वतंत्र भारत’ से की और इसके बाद हिंदुस्तान तथा दैनिक जागरण जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में ब्यूरो चीफ के रूप में काम किया। उत्तर प्रदेश में आधारित रहते हुए उन्हें समाचार संचालन, संपादन और डिजिटल मैनेजमेंट का व्यापक अनुभव है।

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