परिवहन विभाग पर ‘शनि दृष्टि’, पहले एसटीएफ और अब विजिलेंस...!
योगी सरकार की भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस नीति के तहत क्रमवार होती जा रही कार्रवाई
रवि गुप्ता
- एक तरफ हाईटेक सेवायें बन रहीं जनसुविधा, दूसरी ओर खुलते जा हरे भ्रष्टाचार की परत से गिरता इमेज
- पहले ओवरलोडिंग पर एसटीएफ, फिर डीएल प्रक्रियाओं पर सीएम दरबार, अब अकूत संपत्ति पर विजिलेंस
- विजिलेंस जांच में फंसा रिटायर्ड एआरटीओ, पहले यूपी रोडवेज में फोरमैन के पद पर कर चुका कार्य
- विभाग में चर्चा, परिवहन मंत्री कई बार कह चुके कर दूंगा ब्लैकलिस्टेड, पर जमीनी कार्रवाई अब तक नहीं
लखनऊ। लगता है कि प्रदेश के परिवहन विभाग पर कहीं न कहीं और किसी न किसी रूप में बीते कुछ समय से शनि दृष्टि का प्रकोप चल रहा...जगजाहिर है कि 2017 अपने शासनकाल के आगाज के साथ ही योगी सरकार ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया था कि भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस वाली नीति से उनका तंत्र कभी भी डगमगायेगा नहीं और संभवत: यही मंशा अब सूबे के अहम विभागों में गिने जाने वाले परिवहन विभाग में अलग-अलग तौर-तरीके से व्याप्त भ्रष्टता पर भारी पड़ती नजर आ रही।
इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पहले लखनऊ, रायबरेली, औरैया, उन्नाव आदि कई जनपदों में अवैध रूप से ओवरलोडिंग के मामला जब सिर से ऊपर निकल गया तो उसमें एसटीएफ टीम को आगे आना पड़ा। फिर परिणाम यह रहा कि ओवरलोडिंग से जुड़े भ्रष्टाचार के भारी-भरकम पोल खुलते गये, कहीं कोई गुप्त लाल डायरी मिली तो कहीं कुछ और फिर कई सारे एआरटीओ, पीटीओ और अन्य कर्मियों पर त्वरित गति से निलंबन की कार्रवाई हुई।
एक तो विभाग की छवि को धक्का लगा तो दूसरे इतने ही संख्या में विभागीय प्रवर्तन व प्रशासन करने वाले अधिकारियों व कर्मियों की कमी भी हो गई। इसके बाद फिर विभाग की सबसे बड़ी आम जनसुविधा से जुड़े डीएल सिस्टम को लेकर जो शासन और मुख्यालय स्तर पर तमाम प्रक्रियाओं के बाद जो तीन निजी कंपनियों को डीएल बनाने, प्रिंट करने, केएमएस करने और फिर पोस्ट करने का टेंडर दिया गया, वहां भी खेल शुरू हो गया।
इसी तबादला सत्र में नियमत: जहां एक ओर अधिकारियों व कर्मियों के तबादले की लिस्ट जारी हो रही थी तो उसी बीच यह खबर भी चर्चा में रही कि औने-पौने तरीके और अनियमित ढंग से उक्त निजी कंपनियों लखनऊ सहित पूरे प्रदेश के जनपदीय व संभागीय परिवहन कार्यालयों में डीएल सिस्टम के कामकाज को लेकर तैनात किये गये अपने ही प्राइवेट कर्मियों को बिना किसी पूर्व जानकारी व नोटिस के सीधे एक से दूसरे जगह कार्यालयों में कर दे रहे हैं...या फिर इनमें से जिनको कुछ ही समय बकायदा कंपनी के तहत तैनात किया उन्हें बिना किसी जानकारी के ही तैनाती से बाहर का रास्ता दिखा दिया। जिसको लेकर ऐसे तमाम युवा बेरोजगार कभी मुख्यालय पर एसी कमरों में बैठे इन कंपनियों के पदाधिकारियों के यहां गुहार लगाते तो कभी संबंधित परिवहन अधिकारियों के केबिन का चक्कर लगाते दिखे।
अंत में थक हारकर जब उनमें से कुछ पीड़ित युवाओं ने हिम्मत दिखाकर सीधे सीएम जनता दरबार की ओर रुख किया और लिखित तौर पर सीएम योगी के समक्ष शिकायत की तो उसके ठीक बाद मुख्यालय हरकत में आया। फिर विभागाध्यक्ष के निर्देश पर कुछ मुख्यालयों के अधिकारियों की टीम बनायी गयी और उनमें से अभी तक केवल एक पीड़ित बेरोजगार युवा को उसके पूर्व तैनाती स्थल कानपुर कार्यालय पर दोबारा रखने का लेटर संबंधित निजी कंपनी ने जारी की। जबकि यह मामला जब सीएम दरबार से होते हुआ परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह तक पहुंचा तो उनका यही कहना रहा कि हम ऐसे कंपनियों को ब्लैक लिस्ट कर देंगे।
वहीं विभाग में ही यह चर्चा रही कि यह बात तो माननीय जी काफी समय से कहते आ रहे हैं, यदि उन्होंने पहले ही कड़ाई से इन कंपनियों के कान खींचे होते तो सीएम के जनता दरबार तक मामला पहुंचने की नौबत ही नहीं आती। चलिये मामला अब ठंड हुआ था कि फिर सेवानिवृत्त एआरटीओ आगरा रहे के लखनऊ ठिकानों पर विजिलेंस की छापेमारी ने विभाग की और किरकिरी करा दी। जानकारी के तहत उक्त एआरटीओ जोकि पूर्व में आरआई पद से एआरटीओ प्रमोट हुआ, 1985 के करीब वो यूपी रोडवेज में फोरमैन के पद पर कार्यरत रहा और वहां से कमीशन एग्जाम देने के बाद आरआई पोस्ट पर परिवहन विभाग में भर्ती हुआ।
100 से अधिक शिकायत, रिटायर्ड अफसरों-कर्मियों की धड़कनें तेज!

विभागीय सूत्रों की माने तो अब तक परिवहन विभाग के मामले में विभिन्न संगठनों, संस्थाओं, प्रतिनिधियों या फिर व्यक्तिगत तौर पर परिवहन अफसरों व कर्मियों के भ्रष्टाचार की 100 से अधिक शिकायतें मुख्यालय के संबंधित विंग के आलमारियों में धूल फांक रही हैं।
इसको ऐसे समझा जा सकता है कि उक्त रिटायर्ड एआरटीओ जोकि विजिलेंस के रडार पर आया है, उसका भ्रष्टाचार का मामला साल 2020 का है और सूत्र कहते हैं कि उसके किसी खास परिजन ने उसकी आय से अधिक संपत्तियों की शिकायत की थी, जिस पर तत्कालीन परिवहन आयुक्त धीरज साहू ने गहन समीक्षा करने के बाद त्वरित गति से इसकी जांच के लिये अग्रसारित कर दिया था। उनके जाने के बाद फिर भी यह मामला खुलते खुलते कई साल लग गये और यह तब प्रकाश में आया जब उक्त भ्रष्ट अफसर सेवानिवृत्त हो गया।
विभागीय जानकारों का ऐसे में कहना है कि यानी कि अब तक सेवानिवृत्त हो चुके वो अफसर व कर्मी यह न समझें कि यदि उन्होंने सेवाकाल के दौरान कोई बड़ी गड़बड़ी की और उसकी लिखित शिकायत आगे ऊपर तक आ गयी है तो सेवानिवृत्ति के बाद भी उन तक भी जांच एजेंसियों के हाथ पहुंच सकते हैं, उनकी दबी पड़ी फाइलें खुल सकती हैं, नतीजतन इस श्रेणी में आने वाले अफसर व कर्मियों की धड़कनें बढ़ना लाजिमी ही है।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
