पर्यटन एवं आध्यात्मिक विकास से समृद्ध हो रहा जनपद संत कबीर नगर
कबीर की धरती पर पर्यटन का नया सवेरा, विकास योजनाओं से निखर रहा जनपद
संत कबीर नगर, उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में बसा संत कबीर नगर स्वयं में समृद्ध इतिहास, आध्यात्मिक चेतना और सूफी-संत परंपरा की अनूठी विरासत समेटे है। महान संत कबीरदास से जुड़ी स्थली मगहर की पावन धरती ने इस जनपद को देश-दुनिया में विशिष्ट पहचान दिलाई है। सरयू और आमी जैसी नदियों के तटों, संतों की स्मृतियों और लोक आस्था से जुड़े स्थलों के बीच बसा यह जनपद आध्यात्मिक पर्यटन की अनूठी संभावनाएं भी अपने भीतर समेटे हुए है। सूफी-कबीर सर्किट का महत्वपूर्ण पड़ाव संत कबीर नगर आज अपनी सशक्त पहचान के साथ आगे बढ़ रहा है।
प्रदेश का पूर्वांचल अपने प्राचीन गौरव, समृद्ध परंपराओं और प्राकृतिक विरासत के कारण लंबे समय से पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। संत कबीर नगर स्थित कबीर चौरा (समाधि स्थल), बखिरा पक्षी अभ्यारण्य, समय माता मंदिर, तमेश्वरनाथ मंदिर और काजी खैली-उर-रहमान का किला जैसे स्थल पर्यटकों को खासा आकर्षित करते हैं। बावजूद जिले में अनेक ऐसी अल्पज्ञात धरोहरें और प्राकृतिक स्थल मौजूद हैं, जिन्हें उपयुक्त पर्यटक सुविधाओं के विकास के साथ एक सशक्त और आधुनिक पर्यटन केंद्र के रूप में रूपांतरित करने की दिशा में तेजी से प्रयास किए जा रहे हैं।
*स्वयं में विविधता समेटे संत कबीर नगर*
संत कबीर नगर जिला बस्ती मंडल का हिस्सा है। इसकी सीमाएं पूर्व में गोरखपुर, पश्चिम में बस्ती, उत्तर में सिद्धार्थनगर और दक्षिण में अंबेडकर नगर से मिलती हैं। 05 सितंबर 1997 को प्रशासनिक मानचित्र पर अस्तित्व में आए इस जनपद का गठन पूर्ववर्ती बस्ती जिले की खलीलाबाद तहसील, बस्ती तहसील के 131 गांवों तथा सिद्धार्थनगर जिले की बांसी तहसील के सांथा विकास खंड के सभी 161 गांवों को मिलाकर किया गया था। अलग-अलग भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों को अपने भीतर समेटकर बने संत कबीर नगर ने बीते करीब तीन दशकों में पर्यटन विकास की नई राह तय की है।
*संत कबीर ने मगहर को किया 'अमर'*
कबीर दास का जन्म वाराणसी में हुआ था। आदिकाल से काशी की पहचान मोक्षदायिनी नगरी के रूप में रही है। वहीं, मगहर को अपवित्र जगह माना जाता था। मान्यता थी कि मगहर में मरने वाला व्यक्ति अगले जन्म में गधा होता है या फिर नरक में जाता है। 16वीं सदी के महान संत कबीरदास ने लगभग पूरा जीवन वाराणसी में बिताया, लेकिन जीवन के आखिरी समय वो मगहर चले गए और 1518 में यहीं उनकी मृत्यु हुई। दरअसल, कबीर इसी किंवदंती या अंधविश्वास को तोड़ना चाहते थे, कि काशी में मोक्ष मिलता है और मगहर में नरक। स्थानीय निवासी कहते हैं, प्राचीन काल में मगहर को लेकर जो भी धारणा रही हो, कबीर ने उसे पवित्र बना दिया। कबीर दास अपने विचारों से हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्मों में समान रूप से प्रिय थे। कबीर के निधन के बाद दोनों धर्मों के लोगों ने मगहर में मजार और समाधि का निर्माण आस-पास करवाया।
*'बोधि यात्रा' के मार्ग से आस्था स्थलों के सन्मार्ग तक*
मान्यता है कि प्राचीन काल में बौद्ध भिक्षु वर्तमान संत कबीर नगर क्षेत्र से होकर कपिलवस्तु, लुंबिनी और कुशीनगर जैसे प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थस्थलों की यात्रा किया करते थे। यही कारण है कि यह क्षेत्र बौद्ध धर्म और उसकी सांस्कृतिक परंपराओं से भी जुड़ा रहा है। जनपद में प्रकृति और पक्षी प्रेमियों के लिए बखिरा पक्षी अभ्यारण्य एक प्रमुख आकर्षण है, जहां विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों की मौजूदगी पर्यटकों को प्रकृति के करीब ले जाती है। वहीं, लोक आस्था के प्रतीक समय माता मंदिर और तमेश्वरनाथ मंदिर जनपद की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को और समृद्ध बनाते हैं, जबकि काजी खैली-उर-रहमान का किला भी इतिहास की गवाही देता है।
*आगंतुकों की सुविधा, हमारी प्राथमिकता- मंत्री पर्यटन एवं संस्कृति, जयवीर सिंह जी*
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि ' मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में संत कबीर नगर की समृद्ध विरासत को पर्यटन मानचित्र पर विशिष्ट पहचान दिलाने का प्रयास किया जा रहा है। इसी क्रम में पर्यटन विभाग ने वित्त वर्ष 2025-26 में राज्य योजना के तहत जनपद में कुल 2864.22 लाख रुपए की पर्यटन विकास परियोजनाएं स्वीकृत की हैं। इन परियोजनाओं के माध्यम से जनपद के प्रमुख आस्था केंद्रों को आधुनिक पर्यटन सुविधाओं से जोड़ा जाएगा। उन्होंने बताया कि तामेश्वरनाथ मंदिर के पर्यटन विकास के लिए 2441.49 लाख रुपए, हनुमानगढ़ी एवं राम-जानकी मंदिर के लिए 86.80 लाख रुपए, ठाकुर जी मंदिर के लिए 143.46 लाख रुपए, बाबा बैजूनाथ धाम के लिए 91.55 लाख रुपए तथा सिद्धपीठ रामकोठ मंदिर के लिए 100.92 लाख रुपए स्वीकृत किए गए हैं। परियोजनाओं में श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सुविधा को प्राथमिकता देते हुए मूलभूत पर्यटन सुविधाओं के विकास पर विशेष ध्यान दिया गया है।
*पर्यटन नक्शे पर चमकता जनपद संत कबीर नगर*
सूफी-कबीर सर्किट अंतर्गत संत कबीर नगर पर्यटन में तेजी से अपनी पहचान बना रहा है। रहस्यवादी कवि, संत और समाज सुधारक कबीर दास की साधना स्थली से लेकर बौद्ध स्थलों की ओर जाने वाले मार्ग और आस्था से जुड़े प्रसिद्ध मंदिरों तक, जनपद स्वयं में आध्यात्मिकता, संस्कृति और विरासत पर्यटन की समृद्ध कहानी समेटे है। खास बात यह है कि यहां कई ऐसे अल्पज्ञात पर्यटन स्थल भी हैं, जिन्हें विकसित कर पर्यटकों की आवाजाही बढ़ाने के प्रयास लगातार जारी हैं। गोरखपुर, बस्ती, अंबेडकर नगर समेत आसपास के प्रमुख जिलों से सड़क मार्ग के जरिए आसान पहुंच और बेहतर रेल-सड़क कनेक्टिविटी ने संत कबीर नगर में पर्यटन की संभावनाओं को और विस्तार दिया है। इसका असर पर्यटकों के बढ़ते कदमों के रूप में भी दिखाई दे रहा है। वर्ष 2024 में जहां 13.68 लाख पर्यटक जनपद पहुंचे, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 14.21 लाख हो गई। पर्यटकों की बढ़ती आमद से स्थानीय कारोबार और जिले की अर्थव्यवस्था को गति मिली है।
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लेखक के बारे में
पत्रकारिता में पाँच वर्षों का अनुभव रखने वाले दयानिधि त्रिपाठी वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ के संत कबीर नगर ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं। क्षेत्रीय मुद्दों पर ज़मीनी पकड़ और तथ्यपरक कवरेज के साथ वह लगातार रिपोर्टिंग कर रहे हैं।
