लखनऊ में नवजात की अवैध अदला-बदली का खुलासा
फर्जी अस्पताल रिकॉर्ड बनाकर दत्तक प्रक्रिया को किया दरकिनार
सेंट मैरी पॉलीक्लिनिक पर गंभीर सवाल, दो महिलाएं नामजद, डॉक्टरों और अस्पताल प्रशासन की भूमिका भी जांच के घेरे में
लखनऊ। राजधानी लखनऊ में नवजात शिशु के अवैध हस्तांतरण और फर्जी चिकित्सीय अभिलेख तैयार कर कानूनी दत्तक ग्रहण प्रक्रिया को दरकिनार करने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। कमिश्नरेट पुलिस की एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग (AHT) यूनिट और गुडम्बा थाना पुलिस की संयुक्त टीम ने मामले का खुलासा करते हुए दो महिलाओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। वहीं, अस्पताल के चिकित्सकों और प्रशासन की भूमिका भी जांच के दायरे में है।
पुलिस आयुक्त तरुण गाबा के निर्देशन तथा संयुक्त पुलिस आयुक्त (अपराध एवं मुख्यालय) अपर्णा कुमार, पुलिस उपायुक्त (अपराध) अनिल कुमार यादव, अपर पुलिस उपायुक्त (अपराध) किरण यादव और सहायक पुलिस आयुक्त (अपराध) के पर्यवेक्षण में इस संवेदनशील मामले की जांच की जा रही है।
क्या है पूरा मामला?
पुलिस के मुताबिक 3 अगस्त 2026 को सूचना मिली कि गुडम्बा थाना क्षेत्र स्थित सेंट मैरी पॉलीक्लिनिक में जन्मे एक नवजात शिशु को जन्म के तुरंत बाद उसकी जैविक मां से अलग कर दूसरी महिला को सौंप दिया गया। आरोप है कि अस्पताल के रिकॉर्ड में वास्तविक प्रसूता की जगह दूसरी महिला का नाम दर्ज कर फर्जी चिकित्सीय दस्तावेज तैयार किए गए।
सूचना मिलते ही एएचटी और गुडम्बा पुलिस की संयुक्त टीम ने जांच शुरू की। जांच के दौरान नवजात शिशु रेनू शर्मा के पास मिला। पूछताछ में रेनू शर्मा ने स्वीकार किया कि बच्चा उसका जैविक पुत्र नहीं है, बल्कि उसे आरती देवी ने सौंपा था।
बाद में आरती देवी से पूछताछ में सामने आया कि उसके पहले से तीन बच्चे हैं और उसने अपनी इच्छा से नवजात को रेनू शर्मा को दे दिया था। हालांकि जांच में यह भी सामने आया कि इस पूरी प्रक्रिया को वैध दिखाने के लिए अस्पताल के रिकॉर्ड में दूसरी महिला का नाम दर्ज कर फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए।
गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज
प्रथम दृष्टया मिले साक्ष्यों के आधार पर गुडम्बा थाने में मुकदमा संख्या 306/2026 दर्ज किया गया है। इसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(2), 319(2), 336(3) तथा किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 80 और 81 के तहत मामला दर्ज किया गया है।
दोनों महिलाओं का मेडिकल परीक्षण कराया गया है। वहीं नवजात शिशु को बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee) के आदेश पर प्राग नारायण रोड स्थित राजकीय बाल गृह (शिशु) में सुरक्षित संरक्षण में रखा गया है।
वैज्ञानिक और डिजिटल साक्ष्यों से होगी जांच
पुलिस ने स्पष्ट किया है कि विवेचना केवल बयानों के आधार पर नहीं बल्कि वैज्ञानिक एवं डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर की जाएगी। इसके तहत—
अस्पताल के मूल जन्म एवं डिस्चार्ज रिकॉर्ड तथा डिजिटल डेटा की जांच की जा रही है।
संबंधित डॉक्टरों, अस्पताल प्रबंधन और कर्मचारियों से पूछताछ की जा रही है।
दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच कराई जाएगी।
इलेक्ट्रॉनिक और वित्तीय साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं।
आवश्यकता पड़ने पर नवजात और संबंधित व्यक्तियों का डीएनए परीक्षण कराया जाएगा ताकि जैविक मातृत्व और बच्चे की वास्तविक पहचान वैज्ञानिक रूप से स्थापित की जा सके।
पुलिस यह भी जांच कर रही है कि कहीं इस पूरे मामले में किसी संगठित गिरोह, अस्पताल कर्मी या बिचौलियों की भूमिका तो नहीं है।
अस्पताल प्रशासन भी जांच के घेरे में
पुलिस ने मामले में रेनू शर्मा और आरती देवी के अलावा डॉ. शालू, डॉ. विनोद तथा सेंट मैरी पॉलीक्लिनिक के अस्पताल प्रशासन की भूमिका की भी जांच शुरू कर दी है। यदि जांच में उनकी संलिप्तता सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
कानूनी प्रक्रिया से ही संभव है गोद लेना
पुलिस ने लोगों से अपील की है कि भारत में किसी भी बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया केवल किशोर न्याय अधिनियम, 2015 और CARA (Central Adoption Resource Authority) द्वारा निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया के तहत ही पूरी की जा सकती है। निजी समझौते, फर्जी दस्तावेज या अस्पताल अथवा बिचौलियों के माध्यम से नवजात का हस्तांतरण पूरी तरह अवैध और दंडनीय अपराध है।
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लेखक के बारे में
पत्रकारिता में 17 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले शिशिर पटेल वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ में पोर्टल इंचार्ज के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘स्वतंत्र भारत’ से की और इसके बाद हिंदुस्तान तथा दैनिक जागरण जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में ब्यूरो चीफ के रूप में काम किया। उत्तर प्रदेश में आधारित रहते हुए उन्हें समाचार संचालन, संपादन और डिजिटल मैनेजमेंट का व्यापक अनुभव है।
