राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि सरकार का ये कदम विपक्ष के लिए संजीवनी बन गया। क्योंकि पिछले 2 महीने से विपक्ष के पास आक्रमक मुद्दा नहीं था। महंगाई और बेरोजगारी पर बोलने से सरकार लाभार्थी और विकास का जवाब दे देती थी। लेकिन राहुल- अखिलेश की हिरासत के बाद बहस का केंद्र बदल गया।
अखिलेश ने रिहाई के बाद कहा था ये सरकार सवालों से डर गई है। किसान की बात करेगा तो लाठी मिलेगी, युवा नौकरी मांगेगा तो केस होगा।
राहुल गांधी ने दिल्ली से वीडियो जारी कर कहा कि हम संविधान बचाने निकले हैं। जेल भेजोगे तो और जोर से बोलेंगे। दोनों के बयानों को कांग्रेस और सपा ने मिलकर प्रदेश भर में पोस्टर, रील और नुक्कड़ सभा में चलाया। नतीजा ये हुआ कि जो कार्यकर्ता बूथ पर सुस्त थे, उनमें फिर से ऊर्जा लौट आई। इसी ऊर्जा को भुनाने के लिए अब बड़े पैमाने पर सपा-कांग्रेस तैयारी कर रही है।
राजनीतिज्ञ कहते हैं कि बीजेपी का दिल्ली दरबार यह भली-भांति जानता है कि यूपी में विधान सभा चुनाव सन्निकट हैं। विपक्ष पीडीए पर जोर दे ही रहा है साथ ही साथ युवाओं को भी अपने पाले में करने की मुहिम चला रहा है। इसके मूल में परीक्षाओं की शुचिता है और मामला केन्द्रीय शिक्षा मंत्री के ईस्तीफे को लेकर बिगड़ रहा है। इसलिए विपक्ष की मुहिम को कुंद करने के लिए शिक्षा मंत्री का ईस्तीफा आवश्यक है। लेकिन जमीन पर फीडबैक अलग है। सोशल मीडिया में भाजपा के खिलाफ युवाओं का आक्रोश बरकरार है।
शनिवार को हजरतगंज में एक मशहूर चाय की दुकान पर चर्चा छिड़ी थी, नेता आएं जाएं, हमें क्या। पर पुलिस अगर किसी को ऐसे पकड़ेगी तो डर लगेगा। वहीं गोमती नगर की छात्रा प्रीति कहती हैं कि पेपर लीक का कुछ हुआ नहीं, अब नेताओं को भी पकड़ रहे हैं। यानी आम जनता इस घटना को दमन के तौर पर देख रही है और यही विपक्ष चाहता भी था।
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि जब किसी बड़े मुद्दे पर विपक्ष बड़ा आंदोलन करता है और उसके साथ बड़ी संख्या में लोग जुड़ते हैं इसके बाद सरकार उस मुद्दे पर बैकफुट में आती है तो इसे सहानुभूति की राजनीति कहते हैं। दरअसल बड़े मुद्दे पर जब सत्ता पक्ष एक्शन लेता है तो विपक्ष को मुद्दा मिल जाता है।