कैथेटर से जुड़े मूत्र संक्रमण को रोकेगा आयुर्वेद : डॉ. संजीव

लखनऊ। अब कैथेटर से जुड़े मूत्र संक्रमण को आयुर्वेद भी रोक सकेगा। एक शोध के मुताबिक,रोगी को उसकी स्थिति के अनुसार आयुर्वेदिक औषधियों जैसे चंद्रप्रभा वटी, गोक्षुरादि गुग्गुलु, वरुण-शिग्रु क्वाथ आदि का प्रयोग करके
इस संक्रमण को रोका जा सकता है। ये जानकारी गुरुवार को डॉ. संजीव रस्तोगी ने दी।
उन्होंने बताया शोधकर्ताओं के अनुसार आयुर्वेद शरीर की आंतरिक प्रतिरोध क्षमता को बेहतर बनाने और संक्रमण की प्रवृत्ति को कम करने में सहायक हो सकता है। हालांकि यह एक केस रिपोर्ट है, इसलिए व्यापक निष्कर्षों के लिए बड़े स्तर पर नियंत्रित वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक हैं।

डॉ. संजीव रस्तोगी , पूर्व विभागाध्यक्ष , गठिया विभाग, राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय ने बताया अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका के अनुसार कैथेटर के कारण बार-बार होने वाले मूत्र मार्ग संक्रमण (कैथेटर एसोसिएटेड यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन ) की रोकथाम में आयुर्वेदिक चिकित्सा की संभावित उपयोगिता को दर्शाने वाला एक महत्वपूर्ण शोध पत्र इंटरनेशनल जर्नल ऑफ आयुर्वेद रिसर्च में प्रकाशित हुआ है। यह शोध “आयुर्वेदिक उपचार कैथेटर से जुड़े यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन को दोबारा होने से रोकता है ” डॉ. संजीव रस्तोगी ने बताया माइक्रोबायोलॉजी विभाग, राजकीय दून मेडिकल कालेज, देहरादून के सहयोग से किया गया। उन्होंने बताया कैथेटर से संबंधित मूत्र संक्रमण स्वास्थ्य सेवाओं में एक गंभीर समस्या है, विशेष रूप से उन रोगियों में उन्हें लंबे समय तक कैथेटर का उपयोग करना पड़ता है। एंटीबायोटिक प्रतिरोध बढ़ने के कारण ऐसे संक्रमणों का प्रबंधन लगातार चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। अध्ययन में 37 वर्षीय भारतीय मूल के एक पुरुष रोगी का विवरण प्रस्तुत किया गया है, जो ऑस्ट्रेलिया में रहते हैं और न्यूरोजेनिक ब्लैडर के कारण पिछले पांच वर्षों से दिन में छह बार क्लीन इंटरमिटेंट कैथेटराइजेशन कर रहे थे। इस दौरान उन्हें बार-बार मूत्र संक्रमण, पेट के निचले हिस्से में दर्द, मूत्र मार्ग में तकलीफ, अंडकोष में सूजन तथा कई बार एंटीबायोटिक उपचार और अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता हुई। आयुर्वेदिक उपचार प्रारंभ करने के बाद रोगी में पाँच महीने से अधिक समय तक मूत्र संक्रमण की पुनरावृत्ति नहीं हुई। फॉलोअप में की गई मूत्र जांच में बैक्टीरिया की वृद्धि नहीं पाई गई, जबकि रोगी की कैथेटराइजेशन प्रक्रिया पहले की तरह जारी रही। जिसमें रोगी को उसकी स्थिति के अनुसार आयुर्वेदिक औषधियों जैसे चंद्रप्रभा वटी, गोक्षुरादि गुग्गुलु, वरुण-शिग्रु क्वाथ आदि का प्रयोग कराया गया।
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लेखक के बारे में
शुभम कश्यप को पत्रकारिता और मीडिया क्षेत्र में 10 वर्षों का अनुभव है। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की शिक्षा प्राप्त की है और वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं। उनकी विशेषज्ञता चिकित्सा एवं स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी खबरों और अस्पताल आधारित रिपोर्टिंग में है, जहाँ वह विषयों को तथ्यपरक, सटीक और जिम्मेदार ढंग से प्रस्तुत करते हैं।
