अमृतकाल: दुरुस्त हो पायेंगे परिवहन-रोडवेज के ढीले कलपुर्जे!
योगी सरकार यथासंभव दोनों संस्थाओं को करती रही वित्त पोषित, फिर भी किरकिरी
रवि गुप्ता
- कोरोनाकाल में संकट के साथी, महाकुंभ में रिकॉर्ड, सीएम के जनता दरबार में खुली कलई
- परिवहन मंत्री पूरा कर रहे कार्यकाल, बदलते गये प्रमुख सचिव-परिवहन आयुक्त
- एससीएस परिवहन अर्चना अग्रवाल 30 सितंबर को होतीं रिटायर, 10 दिन पूर्व हटा चार्ज
- एसीएस पर्यटन को परिवहन का अतिरिक्त प्रभार, मैडम छुट्टी पर, हैंडओवर नहीं हो सका चार्ज
- ऑनलाइन सेवाओं में अव्वल, पब्लिक से जुड़े डीएल सिस्टम में पनपे भ्रष्टाचार के तंत्र-मंत्र
- परिवहन महकमा को लेकर सवाल, सरकार की मंशानुरूप शासन-प्रशासन-प्रबंधन में तालमेल कम
लखनऊ। 2019 में कोरोनाकाल जैसी वैश्विक महामारी के बीच यूपी के जिस सरकारी विभागीय तंत्र को पुलिस, प्रशासन, मेडिकल की अग्रणी श्रेणी में खड़ा करते हुए सूबे के मुखिया सीएम योगी ने संकट के साथी की संज्ञा दी थी, वहां से लेकर अब तक यानी पूरा होते एक दशक के शासनकाल में जिस परिवहन विभाग की पब्लिक से जुड़ी 50 से अधिक सेवायें व सुविधायें ऑनलाइन कर दी गई हों, बाहरी तत्वों से विभागीय सिस्टम को बचाने के लिये पूरी प्रक्रिया को फेसलेस बना दिया गया हो...अब उसी परिवहन मंत्रालय में जब मौजूदा परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह तमाम ऊठापटक वाले दौर के बीच अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करते दिख रहे हों, जबकि उनके मातहत शासन में कार्यरत प्रमुख सचिव और विभागीय मुख्यालय पर विभागाध्यक्ष यानी परिवहन आयुक्त के बहुत ही छोटे-मोटे अंतराल पर स्थानांतरण होते रहें तो फिर इसे प्रशासनिक दृष्टि से क्या माना जायेगा।
शासन व्यवस्था से जुड़े कुछ खास जानकारों का यही मत है कि जब एक से डेढ़ साल के अंतराल में सरकार और विभाग के बीच सेतुबंध का अहम दायित्व निभाने वाले प्रमुख सचिव या अपर मुख्य सचिव परिवहन के पद पर सीनियर आईएएस रूटीन स्थानांतरण प्रक्रिया के तहत आते-जाते रहें तो फिर चाहे यूपी रोडवेज हो या फिर परिवहन विभाग इन दोनों को लेकर जो भी योजनायें, जनसुविधायें जमीनी स्तर पर मूर्तरूप लेना चाहती हों तो वो बिना शासन की हरी झंडी के कैसे परवान चढ़ पायेंगी। ऐसे में हर खासोआम पब्लिक को लेकर सरकार जो भी योजनायें बनाती है, या फिर ऐलान करती है वो सही समय पर क्रियान्वित नहीं हो पाती है, और अंतत: जिसका खामियाजा अमुक सरकार को चुनावी समर में झेलना पड़ता है। वहीं हैरानी की बात यह भी है कि आखिर यह भी एक तरीके का मजबूत सिस्टम ही है, शासन, प्रशासन और प्रबंधन स्तर पर चाहे जितनी भी असमानता हो, स्थानांतरण हो मगर बतौर परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह के पद और पोजीशन पर योगी सरकार की तरफ से कोई खास असहमति नहीं जाहिर की गयी।
हां, यह अलग बात है कि उनके विभागीय कार्यक्रमों में मंत्री जी की लेटलतीफी को लेकर अक्सर सीएम योगी उन्हें ईशारे में ही संदेश दे देते रहें। बहरहाल, विभागीय जानकारों की माने तो अभी तक तो प्रदेश के मुखिया की नजर में परिवहन निगम और विभाग दोनों की इमेज ठीकठाक ही थी, मगर जब से डीएल सिस्टम सेवा से जुड़ा मामला लगातार कई बार उनकी मौजूदगी में सीएम के जनता दरबार में पहुंच गया, कईजनपदीय परिवहन कार्यालयों में पुलिस प्रशासन छापे में अनियमिततायें सामने आई हों, उसको लेकर सीएम योगी ने काफी नाराजगी जाहिर की है।
यहां तक कि इस प्रकरण में अब तक कई पीड़ित लड़कों ने संबंधित के खिलाफ एफआइआर भी दर्ज करायी है, और यही नहीं उसमें विभाग से सेवानिवृत्त एक अधिकारी का भी नाम शामिल है जिसको लेकर सरकार और शासन स्तर पर विभाग की इमेज को काफी धक्का लगा। जिस परिवहन विभाग में अल्पकाल में ही ठीक सेवानिवृत्ति से गिने चुने दिन पहले परिवहन आयुक्त का तबादला कर दिया जाये, या फिर बीच कार्यकाल में दूसरे को हटा दिया जाये तो स्थानांतरित होकर आने वाले तीसरे एचओडी की मनोदशा को समझा जा सकता है, कि वो कैसे और किस तरह सिस्टम को दुरूस्त करे और उसी मुताबिक उससे सरकार, विभाग और आमजन की अपेक्षायें भी बढ़ जाती हैं।
कुछ ऐसे ही स्थितियां अब नवागत अपर मुख्य सचिव परिवहन का अतिरिक्त प्रभार संभालने जा रहे सीनियर आईएएस अमृत अभिजात के मामले में भी देखने को मिल सकता है, कि वो किस तरह कम समय में योगी सरकार के मंशानुरूप सबके साथ तालमेल बिठाते हुए परिवहन विभाग और यूपी रोडवेज के ढीले पड़े कलपुर्जों को दुरूस्त कर पायेंगे।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब 03 वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट एडिटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
