दुष्कर्म से जन्मा बच्चा कलंक नहीं, उसे भी मिले सम्मान और बराबरी का अधिकार : इलाहाबाद हाईकोर्ट

Published By Shishir Patel
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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि दुष्कर्म से जन्मा बच्चा न तो कोई अपराधी है और न ही समाज के लिए कलंक का प्रतीक। ऐसे बच्चे को भी अन्य बच्चों की तरह सम्मान, संवैधानिक संरक्षण और समान अवसर प्राप्त होने चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे के जन्म की परिस्थितियां उसके मानवीय मूल्य और अधिकारों को कम नहीं करतीं। वास्तविक कलंक उस बच्चे पर नहीं, बल्कि उसके साथ हुई हिंसा, शोषण और अन्याय पर है।

यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ के न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने मेरठ निवासी एक नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। पीड़िता ने गर्भपात की अनुमति मांगी थी, लेकिन संबंधित अधिकारियों की लापरवाही के कारण समय पर कार्रवाई नहीं हो सकी और गर्भावस्था की अवधि इतनी बढ़ गई कि चिकित्सकीय रूप से गर्भपात संभव नहीं रह गया।

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नौकरशाही की लापरवाही से बढ़ी पीड़िता की मुश्किलें

कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ), पुलिस और बाल कल्याण समिति जैसे संबंधित विभागों की लापरवाही के कारण लगभग 54 दिन तक आवश्यक प्रक्रिया पूरी नहीं की गई। इसके चलते पीड़िता को अनावश्यक मानसिक और सामाजिक संघर्ष का सामना करना पड़ा।

हाईकोर्ट ने कहा कि कानून में गर्भपात की स्पष्ट व्यवस्था होने के बावजूद प्रशासनिक उदासीनता और समन्वय की कमी के कारण पीड़िता को न्याय पाने में कठिनाई हुई। अदालत ने इसे केवल व्यक्तिगत लापरवाही नहीं, बल्कि एक "व्यवस्थागत विफलता" करार दिया।

दुष्कर्म से जन्मे बच्चों के लिए विशेष कानून की जरूरत

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत में फिलहाल ऐसा कोई विशेष कानून नहीं है, जो दुष्कर्म से जन्मे बच्चों के स्वतंत्र अधिकारों, सम्मान और पुनर्वास को सुनिश्चित करता हो। अदालत ने ब्रिटेन, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका और न्यूजीलैंड जैसे देशों के कानूनों का उल्लेख करते हुए सुझाव दिया कि उत्तर प्रदेश सरकार इस विषय पर अलग कानून बनाने पर विचार करे।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे बच्चों को भी पीड़ित का दर्जा मिलना चाहिए ताकि वे मुआवजा, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और समुचित देखभाल प्राप्त कर सकें। साथ ही उनके पुनर्वास और गोद लेने की प्रक्रिया के लिए भी स्पष्ट नीति बनाई जानी चाहिए।

चंद्रगुप्त मौर्य का उदाहरण देकर समझाई बात

अपने आदेश में अदालत ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि कई महान व्यक्तित्वों का जन्म भी कठिन और विषम परिस्थितियों में हुआ था, लेकिन उन्होंने अपनी प्रतिभा और कर्म के बल पर इतिहास रच दिया। अदालत ने कहा कि किसी बच्चे का मूल्य उसके जन्म की परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उसकी मानवीय गरिमा और संभावनाओं से तय होता है।

तीन महीने में विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि इस विषय पर अध्ययन और सुझाव देने के लिए तीन महीने के भीतर एक विशेषज्ञ समिति गठित की जाए। साथ ही यह भी कहा कि जब तक इस संबंध में कोई विशेष कानून नहीं बनता, तब तक प्रत्येक जिले का जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) ऐसे बच्चों के हितों और अधिकारों की निगरानी करेगा।

मेडिकल बोर्ड के गठन में भारी लापरवाही उजागर

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रदेश के सभी 75 जिलों से मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) एक्ट के क्रियान्वयन संबंधी रिपोर्ट मांगी। रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। कई जिलों में एमटीपी एक्ट के तहत अनिवार्य मेडिकल बोर्ड का गठन वर्षों तक नहीं किया गया था।

रिपोर्ट के अनुसार, झांसी, गोंडा और प्रयागराज जैसे जिलों में मेडिकल बोर्ड का गठन वर्ष 2023 में किया गया, जबकि एमटीपी अधिनियम वर्ष 1971 से लागू है। अदालत ने इस गंभीर लापरवाही पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए राज्य सरकार को सभी जिलों में मेडिकल बोर्डों के प्रभावी गठन और संचालन के निर्देश दिए।

लेखक के बारे में

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पत्रकारिता में 17 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले शिशिर पटेल वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ में पोर्टल इंचार्ज के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘स्वतंत्र भारत’ से की और इसके बाद हिंदुस्तान तथा दैनिक जागरण जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में ब्यूरो चीफ के रूप में काम किया। उत्तर प्रदेश में आधारित रहते हुए उन्हें समाचार संचालन, संपादन और डिजिटल मैनेजमेंट का व्यापक अनुभव है।

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