बारात की चमक के पीछे छिपा बचपन, मासूम के कंधों पर मजबूरी का बोझ
जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें, कॉपियां और खिलौने होने चाहिए, उस उम्र में उनके कंधों पर रोज़ी-रोटी का बोझ
यह केवल गरीबी की कहानी नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल भी
बदायूं। शादी-ब्याह की बारात में जब बैंड-बाजे की धुन पर लोग खुशी से झूम रहे होते हैं, उसी भीड़ में कुछ मासूम बच्चे भी दिखाई देते हैं। उनके कंधों पर भारी झूमर या लाइट की ठेली होती है। चेहरे पर थकान, आंखों में नींद और कदमों में मजबूरी साफ दिखाई देती है। इन बच्चों को देखकर मन अनायास ही भावुक हो उठता है। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें, कॉपियां और खिलौने होने चाहिए, उस उम्र में उनके कंधों पर रोज़ी-रोटी का बोझ है। जब उनके हमउम्र बच्चे घरों में आराम से सो रहे होते हैं, तब ये मासूम रातभर सड़कों पर बारातों के साथ चलते हुए मेहनत कर रहे होते हैं। कई बार देर रात तक काम करने के बाद भी उन्हें बहुत कम मेहनताना मिलता है।
यह केवल गरीबी की कहानी नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल भी है। आखिर ऐसे हालात क्यों बनते हैं कि बचपन जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाए? शिक्षा, खेल और बेहतर भविष्य का अधिकार रखने वाले बच्चे आज मजदूरी करने को विवश हैं। सरकार ने बाल श्रम रोकने और प्रत्येक बच्चे को शिक्षा दिलाने के लिए कई कानून और योजनाएं बनाई हैं, लेकिन जब तक समाज भी अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगा, तब तक ऐसे दृश्य बदलना मुश्किल होगा। बारात की रोशनी कुछ घंटों की होती है, लेकिन इन मासूम बच्चों के जीवन में शिक्षा और अवसर की रोशनी हमेशा के लिए फैलनी चाहिए। ज़रूरत इस बात की है कि समाज, प्रशासन और हम सभी मिलकर ऐसे बच्चों के भविष्य के बारे में सोचें। यदि हर बच्चा स्कूल जाएगा, सुरक्षित वातावरण में रहेगा और उसे अपने सपने पूरे करने का अवसर मिलेगा। इस पर अपनी राय जरुर बताएं।
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लेखक के बारे में
पत्रकारिता में 10 वर्षों का अनुभव रखने वाले शारिक नसीर वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ के बदायूं ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं। क्षेत्रीय मुद्दों पर ज़मीनी पकड़ और तथ्यपरक कवरेज के साथ वह लगातार रिपोर्टिंग कर रहे हैं।
