ताइवान ने चीन के नए 'एथनिक यूनिटी' कानून का किया विरोध
ताइपे। ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से चीन के तथाकथित ‘एथनिक यूनिटी’ (जातीय एकता) कानून का विरोध करने की अपील की है।
उन्होंने कहा कि यह कानून न केवल ताइवान की संप्रभुता के लिए चुनौती है, बल्कि जातीय एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
ताइपे में आयोजित 10वें केटागालन फोरम–इंडो-पैसिफिक सिक्योरिटी डायलॉग के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति लाई ने कहा कि ताइवान लोकतंत्र, शांति और क्षेत्रीय सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखेगा।
ये खबर भी पढ़े : खैबर पख्तूनख्वा में आतंकी हमले में 14 सुरक्षाकर्मी समेत 15 की मौत, जवाबी कार्रवाई में 12 हमलावर ढेरउन्होंने आरोप लगाया कि चीन का नया कानून राजनीतिक सेंसरशिप और सीमा-पार दमन को बढ़ावा देने वाला है, इसलिए लोकतांत्रिक देशों को इसके प्रति सतर्क रहना चाहिए।
राष्ट्रपति लाई ने कहा कि ताइवान वैश्विक सहयोग के माध्यम से ऐसे किसी भी दबाव और दमनकारी गतिविधियों का मुकाबला करने के लिए अपने प्रयास मजबूत करेगा।
उन्होंने लोकतांत्रिक देशों से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति, स्थिरता और नियम-आधारित व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए सहयोग बढ़ाने का भी आह्वान किया।
चीन का कहना है कि यह कानून राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता को मजबूत करने के उद्देश्य से बनाया गया है। इस मुद्दे पर चीन और ताइवान के बीच पहले से मौजूद मतभेद एक बार फिर सामने आए हैं।
चीन में 'लॉ ऑन द प्रमोशन ऑफ एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस' एक जुलाई से प्रभावी हुआ है। इस कानून को लेकर विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और कई उइगर नागरिक संगठनों ने भी चिंता व्यक्त की है।
इन संगठनों का कहना है कि यह कानून सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर गंभीर सवाल खड़े करता है तथा इसके कुछ प्रावधानों के सीमा-पार प्रभावों पर भी चिंता जताई गई है।
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