जगन्नाथ रथ यात्रा के अनसुने रहस्य, जिनके आगे विज्ञान भी है हैरान
जगन्नाथ रथ यात्रा : पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि रहस्यों, पौराणिक कथाओं और अनोखी परंपराओं से जुड़ी एक अद्भुत यात्रा है। जानिए इस यात्रा के पीछे छिपे मंदिर के रहस्य, रथों की खासियत और सदियों पुरानी मान्यताओं के बारे में।
आज चलते हैं देश के एक ऐसे मंदिर और उसकी यात्रा पर, जहां हवा के विपरीत झंडा लहराता है। इस मंदिर के ऊपर से कोई पक्षी नहीं उड़ता, हवा उल्टी चलती है। मानो प्रकृति भी इस पावन स्थल के आगे नतमस्तक है। वहां एक ऐसी रसोई है, जहां सात बर्तनों को एक के ऊपर एक रखकर खाना पकाया जाता है, लेकिन सबसे ऊपर का खाना पहले पकता है और सबसे नीचे के बर्तन का खाना सबसे आखिर में। एक ऐसा उत्सव, जहां साक्षात ब्रह्मांड के नाथ भगवान जगन्नाथ अपने गर्भगृह से बाहर निकलकर खुद अपने भक्तों से मिलने आते हैं।
जी हां, हम बात कर रहे हैं पुरी की विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा की। लेकिन क्या यह सिर्फ एक उत्सव है, या इसके पीछे छिपे हैं कुछ ऐसे गहरे रहस्य और पौराणिक कथाएं, जो आज के विज्ञान को भी सोचने पर मजबूर कर देती हैं। आइए चलते हैं महाप्रभु जगन्नाथ की एक ऐसी अनकही यात्रा पर, जो आपके रोंगटे खड़े कर देगी।
रथ यात्रा का इतिहास
शुरुआत करते हैं उस इतिहास से, जो सतयुग से जुड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मालवा के राजा इंद्रद्युम्न को भगवान विष्णु ने सपने में दर्शन देकर समुद्र तट पर तैरती हुई एक दिव्य लकड़ी, दारु के पेड़ से मूर्ति बनाने का आदेश दिया। मूर्ति बनाने के लिए खुद देवताओं के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा एक बूढ़े ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने एक शर्त रखी और कहा कि मैं 21 दिन तक बंद कमरे में मूर्ति बनाऊंगा और कोई भी दरवाजा नहीं खोलेगा। लेकिन रानी गुंडिचा की उत्सुकता के कारण राजा ने 14वें दिन ही दरवाजा खोल दिया।
अंदर मूर्तिकार गायब थे और मूर्तियां अधूरी थीं। उनके हाथ और पैर नहीं थे। राजा ग्लानि से भर गए। तब आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी रूप में धरती पर पूजे जाना चाहते हैं। यही कारण है कि आज भी जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की मूर्तियां अधूरी, लेकिन अत्यंत मनमोहक दिखाई देती हैं।
रथ यात्रा की शुरुआत
चलिए अब बात करते हैं भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा की, जो इस बार 16 जुलाई से शुरू होकर 24 जुलाई तक चलेगी। 16 जुलाई को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने भव्य रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करेंगे।
तीनों रथों की विशेषता
क्या आप जानते हैं कि इस यात्रा के दौरान रथ भी विशेष रूप से तैयार किए जाते हैं। सबसे पहले बात करते हैं नंदीघोष की, जो भगवान जगन्नाथ का रथ है। यह भगवान जगन्नाथ का मुख्य रथ है, जिसकी ऊंचाई सबसे ज्यादा होती है। इस रथ में कुल 16 पहिए होते हैं और इसका रंग पीला और लाल होता है।
दूसरा रथ तालध्वज, भगवान बलभद्र का रथ है। यह भगवान जगन्नाथ के बड़े भाई बलभद्र जी का रथ है। इस रथ में कुल 14 पहिए होते हैं और इसका रंग हरा और लाल होता है। तीसरा दर्पदलन, बहन सुभद्रा का रथ है। इसे पद्म रथ भी कहा जाता है, जो उनकी लाडली बहन सुभद्रा जी का रथ है। इस रथ में कुल 12 पहिए होते हैं और इसका रंग काला और लाल होता है।
हर साल ये रथ नए सिरे से बनाए जाते हैं और इन्हें बनाने में एक भी लोहे की कील या धातु का उपयोग नहीं होता। अक्षय तृतीया से इन रथों का निर्माण शुरू होता है।
छेरा पहरा की परंपरा
रथ यात्रा के दौरान कुछ ऐसी रस्में होती हैं, जो इंसान को विनम्रता का पाठ पढ़ाती हैं। इसमें सबसे प्रमुख है छेरा पहरा। पुरी के गजपति राजा, जिन्हें साक्षात भगवान का प्रतिनिधि माना जाता है, वे एक साधारण सेवक की तरह सोने की झाड़ू से तीनों रथों के मंडप को साफ करते हैं। यह रस्म सिखाती है कि भगवान के सामने कोई राजा या रंक नहीं होता, सभी समान हैं।
अनासर काल की परंपरा
रथ यात्रा से ठीक पहले भगवान के बीमार होने की एक बेहद अनूठी परंपरा भी निभाई जाती है, जिसे अनासर या अनावसर काल कहा जाता है। ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को उनके गर्भगृह से बाहर लाकर स्नान वेदी पर 108 घड़ों के सुगंधित जल से स्नान कराया जाता है। इसे स्नान यात्रा कहते हैं। इतने ठंडे पानी से अत्यधिक स्नान करने के कारण महाप्रभु को तेज बुखार आ जाता है।
15 दिनों का एकांतवास
इसके बाद भगवान जगन्नाथ 15 दिनों तक एकांतवास में रहते हैं। स्नान यात्रा के अगले दिन से लेकर अगले 15 दिनों तक भगवान बीमार रहते हैं। इस दौरान मंदिर के कपाट आम भक्तों के लिए पूरी तरह बंद हो जाते हैं। भगवान को एक विशेष गुप्त कक्ष में रखा जाता है, जहां राजवैद्य उनका इलाज करते हैं। उन्हें दवा के रूप में काढ़ा और केवल फल-जूस का भोग लगाया जाता है। इस दौरान भगवान के दर्शन नहीं होते।
नवयौवन दर्शन
इसके बाद आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा यानी पहली तिथि को भगवान पूरी तरह स्वस्थ होकर दर्शन देते हैं, जिसे नवयौवन दर्शन कहा जाता है।
मुख्य रथ यात्रा
इसके ठीक अगले दिन यानी आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को महाप्रभु जगन्नाथ अपने भाई-बहन के साथ रथों पर सवार होकर अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर के लिए निकलते हैं। इसी दिन को मुख्य रथ यात्रा कहा जाता है। गुंडिचा मंदिर मुख्य मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर दूर है। यहां भगवान 9 दिनों तक विश्राम करते हैं।
बहुड़ा यात्रा
फिर दसवें दिन यानी आषाढ़ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को भगवान की वापसी की यात्रा शुरू होती है। भगवान के मुख्य मंदिर की ओर लौटने की इस उल्टी यात्रा को बहुड़ा यात्रा कहा जाता है।
सोने के आभूषणों से शृंगार
बहुड़ा यात्रा के अगले दिन तीनों भगवानों को रथों के ऊपर ही सैकड़ों किलो सोने के आभूषणों से सजाया जाता है। इसे देखना महापुण्य माना जाता है। इसके अगले दिन द्वादशी को भगवान को रथों पर एक विशेष मीठा शर्बत अर्पित किया जाता है, जिसे अधर पणा कहते हैं।
यात्रा का समापन
इसके बाद आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी को भगवान वापस अपने मुख्य गर्भगृह रत्न सिंहासन पर विराजमान हो जाते हैं।
आध्यात्मिक संदेश
इस यात्रा का एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी है। हमारा शरीर एक रथ है और इसमें बैठी आत्मा स्वयं भगवान का अंश है। जब हम श्रद्धा की रस्सी से इस रथ को खींचते हैं, तो हम अपनी इंद्रियों को ईश्वर की ओर ले जाते हैं। यही कारण है कि जाति, धर्म और ऊंच-नीच की दीवारों को तोड़कर हर साल लाखों भक्त यहां खिंचे चले आते हैं।
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लेखक के बारे में
सुभाष पांडेय एक सीनियर और अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें मीडिया क्षेत्र में 32 वर्षों का समृद्ध अनुभव है। अपने लंबे करियर के दौरान उन्होंने समाचार लेखन, संपादन और रिपोर्टिंग के विभिन्न आयामों में कार्य करते हुए पत्रकारिता को मजबूत दिशा दी है।
