संपादकीय: आंदोलन एक सीख अनेक, लोकतंत्र की मजबूती का बड़ा प्रमाण
जब सड़क पर उतरती है जनता, परखी जाती है लोकतंत्र की ताकत
भारतीय लोकतंत्र की गरिमा और मजबूती का सबसे बड़ा प्रमाण उसके आंदोलनों में छिपा है। चाहे स्वतंत्रता संग्राम हो या किसान आंदोलन, हर बार जनता की आवाज सड़क पर उतरती है तो लोकतंत्र की परीक्षा होती है। वर्तमान संदर्भ में उठे विभिन्न आंदोलनों से एक बार फिर यह स्पष्ट हो गया है कि आंदोलन केवल मांगों का माध्यम नहीं, बल्कि अनुशासन, संवाद और लोकतंत्र की परिपक्वता की कसौटी भी हैं। मांगें पूरी होनी चाहिए, लेकिन मर्यादा भी बनी रहनी चाहिए।
आंदोलन लोकतंत्र का अभिन्न अंग हैं। संविधान अनुच्छेद 19 के तहत शांतिपूर्ण सभा करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। जब संस्थागत रास्ते जैसे संसद, विधानसभाएं या प्रशासनिक तंत्र जन-समस्याओं का समाधान करने में विफल रहते हैं, तब जनता सड़क पर आती है। हाल के किसान आंदोलन, आरक्षण की मांगें, रोजगार संबंधी प्रदर्शन या महंगाई के विरुद्ध आवाजें इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं। ये आंदोलन सरकार को जन-भावनाओं की याद दिलाते हैं और नीति-निर्माण में सुधार लाते हैं। परंतु साथ ही ये लोकतंत्र की परिपक्वता की परीक्षा भी लेते हैं।सबसे बड़ी सीख अनुशासन की है।
आंदोलन की सफलता उसके शांतिपूर्ण और संगठित स्वरूप पर निर्भर करती है। जब आंदोलनकारी ट्रैक्टर-ट्रॉली मार्च निकालते हैं, दिल्ली की सीमाओं पर धरना देते हैं या रेल रोको, रोड रोको जैसे कार्यक्रम चलाते हैं, तो उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आम जन-जीवन बाधित न हो। हिंसा, संपत्ति का नुकसान या सरकारी मशीनरी पर हमला आंदोलन की वैधता को कमजोर करता है। इतिहास गवाह है कि महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन की सफलता उनके अहिंसक और अनुशासित स्वरूप में निहित थी।
आज भी आंदोलनकारी नेतृत्व को अपने कार्यकर्ताओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। बिना अनुशासन के आंदोलन अराजकता में बदल जाता है, जो लोकतंत्र के लिए घातक है। दूसरी महत्वपूर्ण सीख संवाद की है। सरकार और आंदोलनकारियों के बीच निरंतर बातचीत लोकतंत्र की आत्मा है। सरकार को आंदोलनों को दमन का माध्यम नहीं, बल्कि संवाद का अवसर मानना चाहिए। वहीं आंदोलनकारी भी अपनी मांगों को यथार्थवादी बनाकर रखें। अधिकतम मांग और न्यूनतम समझौते की मानसिकता से काम नहीं चलेगा।
केंद्र और राज्य सरकारें कई बार कृषि कानूनों, न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी, बेरोजगारी या आरक्षण जैसे मुद्दों पर गोलमेज सम्मेलन आयोजित कर चुकी हैं। सफल संवाद का उदाहरण 2021 के किसान आंदोलन में तीन कृषि कानूनों को वापस लेना है। संवाद में देरी या अड़ियल रवैया दोनों पक्षों की छवि खराब करता है।तीसरी बड़ी परीक्षा लोकतंत्र की है। आंदोलन में विपक्ष की भूमिका, मीडिया की निष्पक्षता, न्यायपालिका का हस्तक्षेप और नागरिकों की जिम्मेदारी सबकी परीक्षा होती है। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब आंदोलन सत्ता के विरुद्ध होने के साथ-साथ स्वयं की आंतरिक मर्यादा का पालन भी करें। मांगें जितनी न्यायोचित हों, उतनी ही मर्यादा बनाए रखनी चाहिए।
सड़क पर प्रदर्शन करते समय अस्पतालों, स्कूलों या आपात सेवाओं में बाधा नहीं डालनी चाहिए। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। आज की चुनौती यह है कि सोशल मीडिया के युग में आंदोलन तेजी से फैलते हैं, लेकिन अफवाहें और ध्रुवीकरण भी उतनी ही तेजी से बढ़ते हैं। इसलिए नेतृत्व को जिम्मेदारी से काम लेना होगा। सरकार को भी आंदोलनों को 'देश-विरोधी' करार देने के बजाय उनके कारणों पर गौर करना चाहिए।
आंदोलन एक सीख अनेक हैं। वे हमें सिखाते हैं कि लोकतंत्र में अधिकारों के साथ कर्तव्य भी जुड़े हैं। मांगें पूरी होनी चाहिए, लेकिन संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। अनुशासन, संवाद और सहिष्णुता के साथ आगे बढ़ने पर ही भारतीय लोकतंत्र अपनी परिपक्वता का परिचय देगा। जन-आंदोलन न केवल समस्याओं का समाधान हैं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया भी।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
