युवा असंतोष : देखना है ज़ोर कितना बाज़ु -ए-क़ातिल में है?

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निर्मल रानी

देश का भविष्य, युवा शक्ति इन दिनों दिल्ली से लेकर देश के और भी कई नगरों महानगरों में सड़कों पर उतर चुका है। भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में यह पहला अवसर है जबकि सरकार को इतने व्यापक स्तर पर जन विरोध का सामना करना पड़ रहा है। युवाओं व छात्रों में उपजे इस तरह के राष्ट्रव्यापी असंतोष का मुख्य कारण यह है कि उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय नज़र आ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में कथित रूप से 152 बार विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने की घटनायें हो चुकी हैं। इसके चलते लगभग 7.5 करोड़ छात्रों के भविष्य के लिये संकट खड़ा हो गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार वर्ष  2021 से 2026 के बीच नीट परीक्षा के दबाव,अनिश्चितताओं ,पेपर लीक मॉडल और व्यवस्था  की नाकामी के चलते मानसिक तनाव में आकर देश में 90 से अधिक छात्र आत्महत्या कर चुके हैं। देश का युवा केंद्रीय शिक्षा मंत्री से इस्तीफ़े की मांग कर रहा है। परंतु फ़िलहाल तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सरकार ने युवाओं की इस मांग को नकारने को ही अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है। यही वजह है कि पर्यावरणविद व सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के लंबे अनशन के बावजूद सरकार ने उनकी मांगों पर कोई ध्यान नहीं दिया। नतीजतन जंतर मंतर से युवाओं का सैलाब गत 20 जुलाई को सत्र शुरुआत के पहले ही दिन संसद की ओर निकल पड़ा। 

इस पूरे घटनाक्रम के कई अलग अलग पहलू हैं। इनमें एक महत्वपूर्ण पहलू है सरकार का इन प्रदर्शनकारी युवाओं,छात्रों व आंदोलन से निपटने का तरीक़ा। याद कीजिये जब तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध दिल्ली की सीमाओं पर 26 नवंबर 2020 से 9 दिसंबर 2021 तक ऐतिहासिक किसान आंदोलन 380 दिनों तक चला था उस समय भी इसी भाजपा सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिये तरह तरह के हथकंडे अपनाये थे। उसे भी पाकिस्तान, माओवादी,खालिस्तानी समर्थक आंदोलन बताया गया था। आंदोलन की फ़ंडिंग पर सवाल खड़ा किया गया था,किसान दिल्ली न पहुँचने पाएं इसके लिये सड़कों पर कीलें बिछाई गयी थीं,कई जगह पक्की दीवारें बनाकर आंदोलन को कमज़ोर करने की कोशिश हुई थी। परन्तु अन्नदाता कहाँ दबने वाले थे। आख़िरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 नवंबर 2021 को तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का आधिकारिक ऐलान किया। और किसानों ने तीनों काले कृषि क़ानूनों को वापस करवाकर ही दम लिया। इस तरह के किसान विरोधी प्रोपेगेंडा में तब भी मीडिया ने सत्ता के पक्ष में बड़ी भूमिका निभाई थी और आज भी वही सत्ता परस्त चाटुकार मीडिया छात्रों व युवा शक्ति के इस आंदोलन में ठीक वैसी ही भूमिका निभा रहा है।       

संपादकीय: घर का बजट! महंगाई की आग में सुलगती रसोई ये खबर भी पढ़े : संपादकीय: घर का बजट! महंगाई की आग में सुलगती रसोई

दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े और शिक्षा प्रणाली में सुधार को लेकर 28 जून 2026 से अनशन शुरू हुआ था। सोनम वांगचुक व छात्र संगठनों के नेतृत्व में चल रहा यह आंदोलन 34 दिन पूरे कर चुका है। एक तरफ़ तो देश की लगभग सभी विपक्षी पार्टियों का समर्थन इस आंदोलन को हासिल है तो दूसरी तरफ़ किसान आंदोलन की ही तरह इस आंदोलन को भी कमज़ोर व बदनाम करने की साज़िश बिकाऊ मीडिया,सत्ता संचालित आई टी सेल व अंधभक्त ट्रोलर्स द्वारा की जा रही है। उदाहरण के तौर पर सोनम वांगचुक जोकि भारत के एक सुप्रसिद्ध इंजीनियर, शिक्षा सुधारक, पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता हैं तथा अपने अनेक अनूठे आविष्कारों और ज़मीनी स्तर पर शिक्षा व पर्यावरण में क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए जाने जाते हैं, उनको चीनी एजेंट बताने की मुहिम छेड़ी गयी। वांगचुक को उनके कार्यों के लिए अब तक लगभग 15 से अधिक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं, जिनमें प्रमुख  रूप से  एशिया का नोबेल पुरस्कार समझा जाने वाला रेमन मैग्सेसे पुरस्कार भी 2018 में मिल चुका है। वे लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के तहत विशेष सुरक्षा प्रदान करने और पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए भी लेह में 21 दिनों का कड़ा अनशन कर चुके हैं और जेल भी जा चुके हैं। ऐसे प्रतिष्ठित समाजसेवी व्यक्ति को चीनी एजेंट के रूप में बदनाम करने का मक़सद छात्र आंदोलन को बदनाम करना है।

बहरहाल जब सत्ता के यह हथकंडे कामयाब नहीं हुये तो छल,साज़िश और दमन की नीति अपनाकर इस आंदोलन को कुचलने की कोशिश की गयी। 19 /20 जुलाई की रात जंतर मंतर पर धरना स्थल के बिल्कुल क़रीब पत्थरों से भरा एक ट्रक चुपके से लाकर खड़ा कर दिया गया। उसी के साथ एक टूटी फूटी वैन खड़ी कर दी गयी। जिसे आंदोलनकारी समर्थक सोशल मीडिया ने देर रात चेक कर उसकी वीडिओ वायरल कर दी और युवाओं को चेतावनी दे दी कि यह साज़िश का हिस्सा है इससे सचेत रहें। उसके बाद जब युवाओं का जनसैलाब 20 जुलाई को अनियंत्रित होकर संसद की तरफ़ कूच करने लगा उसकी आड़ में जगह जगह पुलिस की जिस बर्बरता के भयावह दृश्य देखने को मिले उसने तो सत्ता की मंशा,क्रूरता व अहंकार को पूरी तरह से बेनक़ाब कर दिया। 100 से अधिक युवा पुलिस बर्बरता का शिकार हुये। पुलिस के साथ ही सादे लिबास में अनेक संदिग्ध लोग छात्रों,युवाओं यहां तक मासूम बच्चियां व बुज़ुर्गों पर भी बेरहमी से डंडे बरसाते दिखाई दिये। 

सिर्फ़ लाठी चार्ज ही नहीं किया गया बल्कि पानी की तेज़ धार और आंसू गैस के गोले भी दाग़े गये। इतना ही नहीं बल्कि संसद भवन के भीतर आधुनिक शस्त्रों से लैस कई पुलिस वाले प्रदर्शनकारियों की ओर निशाना साधे दिखाई दिये। गोया यदि प्रदर्शनकारी संसद भवन के भीतर आने की कोशिश करते तो उनका भारी नरसंहार संभव था। इस चित्र ने भी लोगों में भारी ग़ुस्सा पैदा कर दिया। सत्ता के अहंकार और पुलिस ज़ुल्म का नतीजा यह हुआ कि अपनी जायज़ मांगों को लेकर प्रदर्शन करने व इसके चलते शासन की यातना सहने वाले युवाओं के प्रति देश भर में समर्थन और बढ़ गया। देश भर से दिल्ली पहुंचे सैकड़ों ऐसे युवा व अभिभावक  जंतर मन्त्र पर नज़र आये जिन्होंने विमान अथवा ट्रेन से 20 जुलाई की शाम या रात का अपना घर वापसी का टिकट बुक करा रखा था उन्होंने युवाओं के समर्थन में व पुलिस व सत्ता के ज़ुल्म से क्रोधित होकर अपने टिकट कैंसिल करा दिये और आर पार की लड़ाई लड़ने के लिये दिल्ली में ही रुकने का फ़ैसला किया। अब जंतर मंतर पर युवाओं का सैलाब और बढ़ता जा रहा है।   

इस अहंकारी सत्ता ने रही सही कसर तब पूरी कर दी जब पुलिस ने नेता विपक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी,अखिलेश यादव सहित अनेक सांसदों व योगेंद्र यादव जैसे कई वरिष्ठ नेताओं को भी कुछ समय के लिये गिरफ़्तार कर लिया। बहरहाल छात्र युवा आंदोलन की यह चिंगारी अब शोला बन चुकी है। व्यवस्था से दुखी युवा अपने भविष्य की अनिश्चितताओं के चलते इस समय आर पार की लड़ाई लड़ने के लिये तैयार है और पूरे ग़ुस्से में है। जंतर मंतर  पर सत्ता के ज़ुल्म के शिकार युवाओं के मुंह से अब हर तरफ़ यही सुनाई दे रहा है - सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।  देखना है ज़ोर कितना बाज़ु -ए-क़ातिल में है ?  

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‘तरुणमित्र’ श्रम ही आधार, सिर्फ खबरों से सरोकार। के तर्ज पर प्रकाशित होने वाला ऐसा समचाार पत्र है जो वर्ष 1978 में पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जैसे सुविधाविहीन शहर से स्व0 समूह सम्पादक कैलाशनाथ के श्रम के बदौलत प्रकाशित होकर आज पांच प्रदेश (उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तराखण्ड) तक अपनी पहुंच बना चुका है। 

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