सामान्य धरना-प्रदर्शन पर भी एस्मा लगाने का आरोप, संघर्ष समिति ने जताई नाराजगी
ऊर्जा निगमों में दो दशकों से लगातार लागू एस्मा के औचित्य पर संघर्ष समिति ने उठाए सवाल
लखनऊ। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने ऊर्जा निगमों के शीर्ष प्रबंधन पर आरोप लगाया है कि वह बिजली कर्मचारियों के सामान्य लोकतांत्रिक अधिकारों का भी दमन कर रहा है। संघर्ष समिति का कहना है कि कर्मचारियों द्वारा किए जाने वाले सामान्य धरना-प्रदर्शन, विरोध सभाओं तथा कार्यालय समय के बाद आयोजित बैठकों पर भी उत्तर प्रदेश आवश्यक सेवा अनुरक्षण अधिनियम, 1986 (एस्मा) लागू करने की धमकी दी जाती है, जिससे ऊर्जा निगमों में भय और असुरक्षा का वातावरण बना हुआ है। इसका प्रतिकूल प्रभाव बिजली व्यवस्था और कर्मचारियों के मनोबल पर पड़ना स्वाभाविक है।
संघर्ष समिति ने कहा कि एस्मा जैसे कानून का प्रयोग केवल अत्यंत आपातकालीन परिस्थितियों में किया जाना चाहिए। देश के अधिकांश राज्यों में इसका उपयोग आवश्यकता पड़ने पर सीमित अवधि के लिए किया जाता है, किंतु उत्तर प्रदेश के ऊर्जा निगमों में यह अत्यंत चिंताजनक स्थिति है कि पिछले लगभग दो दशकों से एस्मा लगातार लागू रखा गया है। प्रत्येक छह माह बाद इसे पुनः छह माह के लिए बढ़ा दिया जाता है, जिससे ऊर्जा निगमों में स्थायी रूप से आपातकाल जैसी स्थिति बनी हुई है।
संघर्ष समिति ने आरोप लगाया कि यदि बिजली कर्मचारी किसी समझौते के क्रियान्वयन, सेवा संबंधी समस्या या कर्मचारियों के हितों से जुड़े किसी मुद्दे पर शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन अथवा सामान्य सभा आयोजित करने की सूचना देते हैं, तो प्रबंधन तत्काल एस्मा का हवाला देकर उसे रोकने का प्रयास करता है। यह लोकतांत्रिक मूल्यों और कर्मचारियों के संवैधानिक अधिकारों के विरुद्ध है।
संघर्ष समिति ने स्पष्ट किया कि बिजली कर्मचारियों की कोई नई मांग नहीं है। कर्मचारी केवल 3 दिसम्बर, 2022 को माननीय ऊर्जा मंत्री के साथ हुए समझौते के क्रियान्वयन तथा 19 मार्च, 2023 को ऊर्जा मंत्री द्वारा पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन को दिए गए निर्देशों के पालन की मांग कर रहे हैं। उक्त निर्देशों में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि मार्च 2023 के आंदोलन के दौरान बिजली कर्मचारियों के विरुद्ध की गई सभी उत्पीड़नात्मक कार्यवाहियां एवं दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएं।
संघर्ष समिति ने कहा कि तीन वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद न तो समझौते का क्रियान्वयन हुआ है और न ही ऊर्जा मंत्री के निर्देशों का पालन किया गया है। ऐसी स्थिति में यदि कर्मचारी अपनी जायज मांगों के समर्थन में शांतिपूर्ण ढंग से धरना-प्रदर्शन करना चाहते हैं, तो उन पर भी एस्मा लागू करने की धमकी देना पूर्णतः अलोकतांत्रिक और दमनकारी कदम है।
संघर्ष समिति ने पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन के इस रवैये की कड़ी निंदा करते हुए मांग की है कि 3 दिसम्बर 2022 के समझौते को तत्काल लागू किया जाए तथा 19 मार्च, 2023 को ऊर्जा मंत्री द्वारा दिए गए निर्देश के अनुसार बिजली कर्मचारियों के विरुद्ध की गई सभी उत्पीड़नात्मक कार्यवाहियां एवं मुकदमे वापस लिए जाएं तथा हटाए गए संविदा कर्मियों को पुनः कार्य पर लिया जाए। संघर्ष समिति का कहना है कि यदि इन मुद्दों का समाधान कर दिया जाए तो किसी आंदोलन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और बिजली कर्मचारी भीषण गर्मी के इस दौर में विद्युत व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने में पूरी निष्ठा और सहयोग के साथ अपनी भूमिका निभाते रहेंगे।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
